वो छोटा सा पोस्टकार्ड
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
छोटा सा, नन्हा सा
वो पोस्टकार्ड…
ना जाने कहाँ खो गया,
या फिर बच्चों की भाँति
बड़ा होकर कहीं निकल गया।
बड़ी नीली चिट्ठी की तरह ही,
वह भी कुशलता की
कामना करता था,
अपनों के चरणों को स्पर्श भी करता था;
वह भी बहुत बातें करता था,
मगर थोड़े से ही शब्दों में;
जैसे उसके पास शब्द नहीं होते,
जैसे ज़िंदगी के अनुभव नहीं होते!
मगर वह कभी-कभी—
माई की तबियत का हाल बताता,
कभी वह बापू की फसलों का
आनंद मनाता,
कभी वह बचपन की
सखी की याद दिलाता,
कभी पत्नी की
विवशताओं को दर्शाता।
कितना कुछ लिखा होता था,
इस छोटे से कार्ड में…
जिसे प्रेमिका कभी सीने से लगाए,
छुप-छुपकर आँसू बहाया करती थी;
वह कभी मुन्ने के जन्म की
खुशियाँ लाता, तो
कभी दादा के गुज़रने का
पहाड़ गिराता।
पोस्टकार्ड हर घर में
एक बच्चे की तरह ही तो था…
मां की आँखों का तारा, तो
बापू के बुढ़ापे का सहारा था;
वह जब आता, तो
मुनिया चहकती—जैसे
उसका भैया आ गया हो!
मगर आज… हर हाथ में
मोबाइल है, फिर भी
ना तो भैया को
उसकी याद आती है,
ना उसकी कोई खबर
अब उसे चहकाती है।