🔱 श्री दुर्गा चालीसा (हिन्दी में) 🔱
आदि शक्ति माँ दुर्गा संपूर्ण ब्रह्मांड की जननी और रक्षक हैं। उनकी महिमा अनंत है और वे भक्तों के सभी कष्टों को हरने वाली हैं। माँ दुर्गा के दिव्य स्वरूप और शक्ति का गुणगान करने वाला यह दुर्गा चालीसा अत्यंत शक्तिशाली और कल्याणकारी माना जाता है, जिसके नियमित पाठ से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
श्री दुर्गा चालीसा पाठ एवं भावार्थ
॥ दोहा ॥
नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥ १
भावार्थ: हे माँ दुर्गे, आपको नमस्कार है, आप सुख प्रदान करने वाली हैं। हे माँ अम्बे, आपको नमस्कार है, आप सब दुःखों को हरने वाली हैं।
निराकार है ज्योति तुम्हारी ।
तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥ २
भावार्थ: आपकी शक्ति की ज्योति निराकार है और उसका प्रकाश तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) में फैला हुआ है।
शशि ललाट मुख महाविशाला ।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥ ३
भावार्थ: आपका माथा चंद्रमा जैसा, मुख विशाल है। आपकी आँखें लाल (उग्र) हैं और भौंहें (भृकुटि) भयंकर हैं।
रूप मातु को अधिक सुहावे ।
दरश करत जन अति सुख पावे ॥ ४
भावार्थ: हे माता, आपका रूप अत्यंत मनमोहक है। आपके दर्शन करने से भक्तों को अपार सुख की प्राप्ति होती है।
तुम संसार शक्ति लय कीना ।
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥ ५
भावार्थ: आपने ही संसार की शक्ति को धारण किया है और इसके पालन के लिए अन्न और धन प्रदान किया है।
अन्नपूर्णा हुई जग पाला ।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥ ६
भावार्थ: आप अन्नपूर्णा के रूप में जगत का पालन करती हैं, और आप ही सबसे पहली सुंदरी शक्ति हैं।
प्रलयकाल सब नाशन हारी ।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥ ७
भावार्थ: प्रलय के समय आप ही सब कुछ नष्ट करने वाली होती हैं, और आप ही भगवान शिव को प्रिय गौरी हैं।
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें ।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥ ८
भावार्थ: भगवान शिव और योगी भी आपके गुणों का गान करते हैं। ब्रह्मा और विष्णु भी आपको प्रतिदिन ध्यान करते हैं।
रूप सरस्वती को तुम धारा ।
दे सुबुद्धि ऋषि-मुनिन उबारा ॥ ९
भावार्थ: आपने ही ज्ञान की देवी सरस्वती का रूप धारण किया और अच्छी बुद्धि देकर ऋषि-मुनियों को संकटों से बचाया।
धरा रूप नरसिंह को अम्बा ।
प्रगट भईं फाड़कर खम्बा ॥ १०
भावार्थ: हे अम्बा, आपने ही नरसिंह का उग्र रूप धारण किया था और खंभे को फाड़कर प्रकट हुईं।
रक्षा कर प्रह्लाद बचायो ।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥ ११
भावार्थ: आपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और दैत्य हिरण्याक्ष (हिरण्यकशिपु) का संहार करके उसे मोक्ष (स्वर्ग) पहुँचाया।
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं ।
श्री नारायण अंग समाहीं ॥ १२
भावार्थ: आपने ही इस जगत में लक्ष्मी का रूप धारण किया है और श्री नारायण (विष्णु) के अंग में समाई हुई हैं।
क्षीरसिन्धु में करत विलासा ।
दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥ १३
भावार्थ: आप क्षीरसागर (दूध के सागर) में निवास करती हैं। हे दया के सागर (माँ), हमारी मनोकामना पूरी करें।
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
महिमा अमित न जात बखानी ॥ १४
भावार्थ: हिंगलाज (शक्तिपीठ) में आप ही भवानी के रूप में हैं, आपकी महिमा असीम है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
मातंगी अरु धूमावति माता ।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता ॥ १५
भावार्थ: आप ही मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी और बगलामुखी माता के रूप हैं, जो भक्तों को सुख प्रदान करती हैं।
श्री भैरव तारा जग तारिणी ।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥ १६
भावार्थ: श्री भैरवी (भैरव), तारा और छिन्नमस्ता के रूप में आप जगत को तारती हैं और संसार के दुःखों का निवारण करती हैं।
केहरि वाहन सोह भवानी ।
लांगुर वीर चलत अगवानी ॥ १७
भावार्थ: हे भवानी! आपका सिंह (केहरि) वाहन बहुत शोभा देता है और वीर हनुमान आपकी अगवानी (आगे-आगे) करते हैं।
कर में खप्पर-खड्ग विराजै ।
जाको देख काल डर भाजे ॥ १८
भावार्थ: आपके हाथों में खप्पर और तलवार सुशोभित हैं, जिन्हें देखकर काल (मृत्यु) भी डरकर भाग जाता है।
सोहै अस्त्र और त्रिशूला ।
जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥ १९
भावार्थ: आपके हाथों में अन्य अस्त्र और त्रिशूल शोभायमान हैं, जिनके प्रहार से शत्रुओं के हृदय में भय (शूल) उत्पन्न हो जाता है।
नगर कोटि में तुम्हीं विराजत ।
तिहुंलोक में डंका बाजत ॥ २०
भावार्थ: नगरकोट (कांगड़ा देवी) में आप ही विराजमान हैं, और तीनों लोकों में आपका यश (डंका) बजता है।
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे ।
रक्तबीज शंखन संहारे ॥ २१
भावार्थ: आपने ही शुम्भ, निशुम्भ जैसे दानवों का संहार किया और रक्तबीज सहित लाखों (शंखन) राक्षसों का नाश किया।
महिषासुर नृप अति अभिमानी ।
जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥ २२
भावार्थ: महिषासुर नाम का राजा (दैत्य) बहुत अभिमानी था, जिसके पापों के भार से धरती व्याकुल हो उठी थी।
रूप कराल कालिका धारा ।
सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥ २३
भावार्थ: आपने भयंकर (कराल) कालिका का रूप धारण किया और उसकी पूरी सेना के साथ उसका संहार कर दिया।
परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब ।
भई सहाय मातु तुम तब तब ॥ २४
भावार्थ: जब-जब भक्तों (सन्तों) पर कोई कठिन संकट आया है, हे माता, तब-तब आपने उनकी सहायता की है।
अमरपुरी अरु बासव लोका ।
तब महिमा सब रहें अशोका ॥ २५
भावार्थ: आपकी महिमा से ही देवलोक और इन्द्रलोक (बासव लोक) शोक रहित (दुःख मुक्त) रहते हैं।
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी ॥ २६
भावार्थ: ज्वालाजी (शक्तिपीठ) में आपकी ही ज्योति जल रही है, जिसकी पूजा पुरुष और स्त्री सदा करते हैं।
प्रेम भक्ति से जो यश गावै ।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें ॥ २७
भावार्थ: जो कोई प्रेम और भक्ति से आपका यश (गुणगान) गाता है, दुःख और गरीबी (दारिद्र) उसके पास नहीं आते।
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई ।
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई ॥ २८
भावार्थ: जो मनुष्य मन लगाकर आपका ध्यान करता है, उसे जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥ २९
भावार्थ: योगी, देवता और मुनि पुकार-पुकार कर कहते हैं कि आपकी शक्ति के बिना कोई भी योग (तपस्या) सफल नहीं हो सकता।
शंकर आचारज तप कीनो ।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥ ३०
भावार्थ: (आदि शंकराचार्य ने) बहुत तपस्या की और काम तथा क्रोध आदि सब विकारों को जीत लिया।
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥ ३१
भावार्थ: उन्होंने दिन-रात केवल भगवान शंकर का ही ध्यान किया और किसी भी समय आपको याद नहीं किया।
शक्ति रूप को मरम न पायो ।
शक्ति गई तब मन पछितायो ॥ ३२
भावार्थ: वे आपके शक्ति रूप का रहस्य नहीं जान पाए, और जब उनकी शक्ति चली गई, तब उन्हें बहुत पछतावा हुआ।
शरणागत हुई कीर्ति बखानी ।
जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥ ३३
भावार्थ: तब वे आपकी शरण में आए और आपके यश का बखान करते हुए बोले: हे जगदम्बा भवानी! आपकी जय हो!
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा ।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥ ३४
भावार्थ: तब आदि जगदम्बा (माँ दुर्गा) उन पर प्रसन्न हुईं और बिना देर किए उन्हें (पुनः) शक्ति प्रदान कर दी।
मोको मातु कष्ट अति घेरो ।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥ ३५
भावार्थ: हे माता! मुझे भी कष्टों ने बहुत घेर रखा है। आपके बिना मेरे दुःख को और कौन हर सकता है?
आशा तृष्णा निपट सतावे ।
मोह मदादिक सब विनशावै ॥ ३६
भावार्थ: आशा (लालच) और तृष्णा मुझे बहुत परेशान करती हैं। आप मेरे मोह और अहंकार (मद) आदि को नष्ट कर दें।
शत्रु नाश कीजै महारानी ।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥ ३७
भावार्थ: हे महारानी! मेरे शत्रुओं (विकारों) का नाश करें। हे भवानी! मैं एकाग्र मन से आपका ही स्मरण करता हूँ।
करो कृपा हे मातु दयाला ।
ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला ॥ ३८
भावार्थ: हे दयालु माता! मुझ पर कृपा कीजिए और मुझे ऋद्धि (समृद्धि) तथा सिद्धि (अलौकिक शक्ति) देकर कृतार्थ करें।
जब लगि जियउं दया फल पाऊं ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं ॥ ३९
भावार्थ: जब तक मैं जीवित रहूँ, आपकी दया का फल पाता रहूँ, और मैं हमेशा आपका ही यश (गुणगान) करता रहूँ।
दुर्गा चालीसा जो नित गावै ।
सब सुख भोग परमपद पावै ॥ ४०
भावार्थ: जो कोई इस दुर्गा चालीसा का प्रतिदिन पाठ करता है, वह सभी सुखों का भोग कर अंत में मोक्ष (परमपद) प्राप्त करता है।
॥ दोहा ॥
देवीदास शरण निज जानी ।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥
भावार्थ: चालीसा के रचयिता देवीदास आपको अपनी शरण जानकर विनती करते हैं कि, हे जगदम्ब भवानी! मुझ पर कृपा कीजिए।
॥ इति श्री दुर्गा चालीसा संपूर्ण ॥
🙏 दुर्गा चालीसा पाठ का महत्व और लाभ
श्री दुर्गा चालीसा का नियमित पाठ सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह जीवन में सकारात्मकता और सुरक्षा का कवच प्रदान करता है। इसे प्रतिदिन पढ़ने के कुछ मुख्य लाभ इस प्रकार हैं:
१. नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा
भय और शत्रु नाश: चालीसा की चौपाइयों में माँ दुर्गा के विकराल रूप (जैसे कालिका) का वर्णन है, जो भक्तों के भीतर से भय को समाप्त करता है। यह शत्रु बाधाओं और नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करने में अत्यंत प्रभावी मानी जाती है।
संकट निवारण: चौपाई संख्या २४(परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥) यह सुनिश्चित करती है कि माता अपने भक्तों पर आए हर गंभीर संकट (गाढ़) के समय उनकी सहायता करती हैं।
२. मानसिक और आध्यात्मिक लाभ
ज्ञान और बुद्धि की प्राप्ति: माँ सरस्वती के रूप का स्मरण (रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि-मुनिन उबारा॥) करने से पाठकों को सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) और ज्ञान की प्राप्ति होती है, जो छात्रों और निर्णय लेने वालों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।
जन्म-मरण से मुक्ति: चालीसा का ध्यानपूर्वक पाठ करने से आत्मा को मोक्ष (परमपद) की ओर बढ़ने में मदद मिलती है, जैसा कि चौपाई २८ और ४० में बताया गया है।
३. भौतिक सुख और समृद्धि
धन और समृद्धि: माँ लक्ष्मी के स्वरूप का वर्णन (लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।) होने के कारण, चालीसा का पाठ धन-धान्य और समृद्धि लाता है।
इच्छा पूर्ति: सच्चे मन से पाठ करने पर माता भक्तों की सभी आशा और इच्छाओं (मन आसा) को पूरा करती हैं।
पाठ करने का सही समय
दुर्गा चालीसा का पाठ करने का सबसे शुभ समय ब्रह्म मुहूर्त (सुबह ४ बजे से ६ बजे के बीच) और शाम की पूजा (संध्याकाल) है। नवरात्रि के दौरान इसका पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है।