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लाला देशबंधु गुप्ता: दिल्ली की राजनीतिक चेतना और प्रेस स्वतंत्रता के पुरोधा

​भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में लाला देशबंधु गुप्ता एक ऐसा नाम है, जिन्होंने अपनी लेखनी और राजनीतिक दूरदर्शिता से राष्ट्र के नवनिर्माण में अभूतपूर्व योगदान दिया। पानीपत की मिट्टी में जन्मे और दिल्ली को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले लालाजी केवल एक सेनानी नहीं, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता के सजग प्रहरी और एक दूरद्रष्टा राजनेता थे।

 

​जन्म एवं प्रारंभिक जीवन

​लालाजी का जन्म 14 जून, 1901 को पानीपत के ‘बड़ी पहाड़’ क्षेत्र में हुआ था। उनके बचपन का नाम रतिराम गुप्ता था। उनके पिता श्री शादीराम जी एक वैदिक विद्वान और उर्दू के कुशल लेखक थे, जिनसे रतिराम को साहित्य और राष्ट्रवाद के संस्कार विरासत में मिले। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पानीपत के मदरसे में हुई और उच्च शिक्षा के लिए वे दिल्ली के प्रसिद्ध सेंट स्टीफन कॉलेज आए।

 

​क्रांतिकारी राह का चुनाव

​सेंट स्टीफन में पढ़ाई के दौरान जलियांवाला बाग हत्याकांड की वीभत्स घटना ने युवा रतिराम के अंतर्मन को झकझोर दिया। 22 अक्टूबर, 1920 को भिवानी में महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने कॉलेज छोड़ने का निर्णय लिया। उनके प्रधानाचार्य एस.के. रुद्र, जो स्वयं क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति रखते थे, ने न केवल उनके निर्णय का समर्थन किया बल्कि उन्हें प्रोत्साहित भी किया।

 

​’देशबंधु’ की उपाधि और राजनीतिक सक्रियता

​स्वतंत्रता आंदोलन में उनके समर्पण को देखते हुए स्वामी श्रद्धानंद और महात्मा गांधी ने उन्हें ‘देशबंधु’ (राष्ट्र का मित्र) की उपाधि से विभूषित किया। वे लाला लाजपत राय और स्वामी श्रद्धानंद के अत्यंत विश्वासपात्र बने।

​जेल यात्रा: मात्र 19 वर्ष की आयु में वे पहली बार जेल गए और कई बार कारावास की यातनाएं सही।

​संसदीय सफर: 1937 के चुनावों में पंजाब विधानसभा में कांग्रेस की ओर से जीत दर्ज करने वाले वे गिने-चुने नेताओं में से एक थे। बाद में वे दिल्ली से सांसद चुने गए और संविधान सभा के सक्रिय सदस्य रहे।

​दूरदर्शी सोच: उन्होंने बहुत पहले ही पंजाब और हरियाणा के अलग होने का तर्क प्रस्तुत कर दिया था, जो दशकों बाद फलीभूत हुआ।

 

​पत्रकारिता और प्रेस की स्वतंत्रता

​लालाजी का मानना था कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के लिए स्वतंत्र प्रेस का होना अनिवार्य है।

​रोजाना तेज: स्वामी श्रद्धानंद के साथ मिलकर उन्होंने उर्दू समाचार पत्र ‘दैनिक तेज’ (रोजाना तेज) शुरू किया। स्वामी जी के बलिदान के बाद उन्होंने इसका पूर्ण कार्यभार संभाला।

​इंडियन एक्सप्रेस का उदय: उन्होंने रामनाथ गोयनका के साथ ‘भारतीय समाचार क्रॉनिकल’ की सह-अध्यक्षता की। उनकी मृत्यु के पश्चात गोयनका जी ने इसी पत्र का नाम बदलकर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ कर दिया, जो आज भारत का एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र है।

 

​सांप्रदायिक सद्भाव और दुखद अंत

​देश के विभाजन के काले दौर में लालाजी ने दिल्ली और आस-पास के क्षेत्रों में सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए दिन-रात काम किया। दुर्भाग्यवश, जब देश को उनकी सर्वाधिक आवश्यकता थी, वर्ष 1951 में कोलकाता जाते समय एक विमान दुर्घटना में इस महान देशभक्त का आकस्मिक निधन हो गया।

 

​अश्विनी राय ‘अरुण’ की भावांजलि

​”लाला देशबंधु गुप्ता जी का जीवन हमें सिखाता है कि पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को जगाने का माध्यम है। दिल्ली की विधानसभा की स्थिति हो या प्रेस की आजादी, लालाजी के विचार आज भी हमारे लोकतंत्र के लिए मार्गदर्शक हैं। पानीपत के उस ‘रतिराम’ को नमन, जो पूरे देश का ‘देशबंधु’ बन गया।”

 

 

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