May 25, 2024

लाला देशबंधु गुप्ता भारत के महान स्वतन्त्रता सेनानी एवं पत्रकार थे। उन्होंने लाला लाजपत राय के समाचार पत्र वंदेमातरम में संपादक के रूप में सहयोग दिया था। लालाजी ने बाल गंगाधर तिलक के लेखों से प्रभावित होकर अपना जीवन स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्पित किया। साइमन कमीशन के दिल्ली पहुंचने पर उसका विरोध किया, अनेको बार जेल भी गए। उनका जन्म पानीपत में हुआ था, लेकिन उनकी कर्मभूमि दिल्ली रही। आईए हम लाला देशबंधु गुप्ता जी के बारे में थोड़ी बहुत जो जानकारी जुटा पाए हैं उसे आप से साझा करते हैं…

लालाजी को प्रेस की व्यापक स्वतंत्रता के लिए और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली क्षेत्र के विधानसभा की स्थिति पर बहस करने के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है। उन्होंने ही पंजाब और हरियाणा के अलग होने का तर्क भी दिया था।

जीवनी…

देशबंधु गुप्ताजी का जन्म पानीपत के बड़ी पहाड़ क्षेत्र में १४ जून, १९०१ को हुआ था । उनके बचपन का नाम रतिराम गुप्ता था। उनके पिताजी श्री शादीराम एक याचिकाकर्ता-लेखक और वैदिक विद्वान थे। उन्होंने उर्दू भाषा में गद्य और पद्य; यानी दोनो विधाओं में समान रूप से रचना की है। जब वे १७ साल के थे, तभी उन्होंने अपने से दो साल बड़ी सोना देवी से शादी कर ली थी। हालांकि उनके वैवाहिक गठबंधन की व्यवस्था तब से थी जब वे तीन साल के थे और सोना पाँच साल की थीं। उनके चार बेटे हुए विश्वबंधु गुप्ता, प्रेमबंधु गुप्ता, रमेश गुप्ता और सतीश गुप्ता।

रतिराम गुप्ता ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पानीपत के एक मदरसे में पूरी की, और फिर सेंट स्टीफन कॉलेज में पढ़ाई करने चले गए।चार्ल्स इंड्रिज, वेस्टर्न और घोष जैसे उस समय के चर्चित शिक्षको ने उन्हें वहां पढ़ाया, उस समय श्री एसके रुद्र वहाँ के प्रधानाचार्य थे।जब वे सेंट स्टीफन में पढ़ाई कर रहे थे तब उन्होंने चांदनी चौक स्थित एक कपड़ा व्यापारी श्री जमनालाल बजाज के यहाँ १८ दिनों तक कार्य किया। यह वह समय था जब जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसी घटनाएं हुईं थीं। इसी घटना ने उनके अन्तर्मन एवं स्मृति पटल पर बड़े पैमाने पर और विशेष रूप से युवा रतिराम पर अपनी छाप छोड़ी। परिणामस्वरूप, २२ अक्टूबर, १९२० को भिवानी में महात्मा गांधी द्वारा किया गया असहयोग आंदोलन ने देशबंधु गुप्ता को ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए एवं उसमे प्रत्यक्ष भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया।उन्होंने अपने महाविद्यालय के प्रधानाचार्य श्री एस.के. रुद्र को सेंट स्टीफन को छोड़ने के बारे में अवगत कराया। कारण पूछे जाने पर उन्होने अपने इस आशय की जानकारी उन्हें दी। अब ऐसा था कि एस.के. रुद्र स्वयं क्रांतिकारीयों से सहानुभूति रखते थे अतः उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। यह माना जाता है कि उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के लिए युवा रतिराम को अपना सर्वश्रेष्ठ निर्णय लेने के लिए प्रोत्साहित भी किया और साथ ही उनके शिक्षण वर्ष की पूरी जिम्मेदारी भी उन्होने ले ली।

राजनीतिक गतिविधि…

लगातार बदलती राजनीतिक घटनाओं नेे लालाजी को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं में सक्रिय भागीदारी करने का एक प्रमुख कारक बनी। उन्होंने सामाजिक जागरूकता के लिए कई महत्वपूर्ण संगठनों का हिस्सा बनने में रुचि दिखाई और वो भी काँग्रेस मे शामिल होने से पहले।उदाहरण के लिए, वे चावड़ी बाजार में आर्य समाज शाखा के एक सक्रिय सदस्य थे। एक समय तो वे शाखा पार्षद के पद को संभालने के लिए भी आए थे। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी के परिणामस्वरूप उन्हें कई मौकों पर राजनीतिक अड़चन का सामना करना पड़ा।पहली बार तो उन्हें १९ साल की अल्प आयु में ही कैद कर लिया गया था। वर्ष १९२७ में जेल से छूटने के बाद वे हरियाणा और पंजाब के अलग होने को लेकर, मौर्चाओ मे भाग लेने लगे। इसके लिए उन्हें रणबीर हुडा का समर्थन भी प्राप्त था। स्वतंत्रता आंदोलन के अन्य सदस्यों में लाला लाजपत राय और स्वामी श्रद्धानंद के साथ वे लगातार जुड़े रहे। पूर्व मे तिलक जी स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स में उनके शिक्षक रहे थे अतः यही कारण था की लालाजी, लालाजी के विश्वासपात्र बन गए। उन्होंने एक बार आईएनसी की महिला शाखा के कहने पर दिल्ली में एक सभा को संबोधित किया था।परिणामस्वरूप, लाला लाजपत राय जी ने उन्हें करनाल में कांग्रेस समितियों के आयोजन का काम सौंपा, जो उस समय की तहसील थी और किस्मत से वह स्थान उनका जन्मस्थान पानीपत था।

लंदन में तीसरे गोलमेज सम्मेलन में विचार-विमर्श के परिणामस्वरूप भारत सरकार अधिनियम, १९३५ को पारित किया गया। इस अधिनियम ने अखिल भारतीय महासंघ की स्थापना और प्रांतों के लिए नए शासन मॉडल प्रदान किए।अधिनियम में कई कमियां थीं, जिनमें से एक यह था कि भारतीयों के पास प्रांतीय प्रशासनिक शक्ति, रक्षा विभाग और विदेशी संबंध होने चहिए थे मगर वे अंग्रेजों के अधीन थे। अधिनियम के प्रावधानों के “कटु विरोध” होने के बावजूद, कांग्रेस चुनाव के लिए आगे बढ़ी और जुलाई १९३७ तक ग्यारह प्रांतों में से सात में सरकारों का गठन कर लिया और बाद में दो मे गठबंधन की सरकार बनाईं। सिर्फ बंगाल और पंजाब में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। कृषक प्रजा पार्टी-मुस्लिम लीग के गठबंधन ने पंजाब में और यूनियनिस्ट पार्टी ने बंगाल में सरकार बनाई। पंजाब में १८ फरवरी के विधान सभा चुनाव में केवल लाला देशबंधु गुप्ता और पंडित श्रीराम शर्मा ने ही कांग्रेस की ओर से जीत हासिल कर पाए। ​​वह सात साल तक पंजाब विधानसभा में रहे। बाद में उन्हें दिल्ली से सांसद चुना गया और अपने राजनीतिक करियर के दौरान INC के भीतर कई महत्वपूर्ण पदों पर लगातार बने रहे।

देशबंधु की उपाधि…

स्वामी श्रद्धानंद और महात्मा गांधी ने लालाजी को देशबंधु (यानी राष्ट्र का मित्र) की उपाधि प्रदान की, जो उनके नाम के मध्य में इस्तेमाल की जाने लगी। सक्रिय राजनीति के अलावा एक पत्रकार और संविधान सभा के सदस्य के रूप में भी वे लगातार सक्रिय रहते थे। उन्हें भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को दृढ़ता से समर्थन करने के लिए जाना जाता है, उदाहरण के लिए; सितंबर, १९४९ में आयोजित विधानसभा मसौदे में(तब) प्रविष्टि ८८-ए के आसपास की बहसों को दर्शाया गया है।

द रोजाना तेज…

देशबंधु गुप्ता एक पत्रकार थे, उन्होंने अखिल भारतीय समाचार पत्र के सम्मेलनो सहित कई प्रेस संपादकीय बोर्डों और समितियों का हिस्सा थे। स्वामी श्रद्धानंद के साथ, उन्होंने दैनिक तेज अखबार शुरू किया, जो उर्दू में (रोजाना तेज के रूप में) प्रकाशित हुआ करता था। २३ दिसंबर, १९२६ को श्रद्धानंद के निधन उपरांत देशबंधु ने समाचार पत्र का पूर्ण नियंत्रण ग्रहण किया। उन्होंने राम नाथ गोयनका के साथ भारतीय समाचार क्रॉनिकल की सह-अध्यक्षता भी की है। देशबंधु की मृत्यु के बाद, गोयनका ने पेपर का नाम बदलकर द इंडियन एक्सप्रेस कर दिया।

लाला जी का जन्म तो पानीपत में हुआ था, लेकिन उनकी कर्मभूमि दिल्ली रही। देश के विभाजन के समय लाला जी ने दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों में साम्प्रदायिक सदभाव बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दुर्भाग्य से अपने जीवन की ऊंचाइयों के समय ही वर्ष १९५१ में कलकत्ता जाते समय विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया।

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