बाबाराव सावरकर: सशस्त्र क्रांति के पथप्रदर्शक और हिंदुत्व के वैचारिक शिल्पी
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में सावरकर परिवार का त्याग अप्रतिम है। जहाँ विनायक दामोदर सावरकर अपनी प्रखरता के लिए विख्यात हुए, वहीं उनके ज्येष्ठ भ्राता गणेश दामोदर सावरकर उर्फ बाबाराव सावरकर वह आधारशिला थे, जिन्होंने ‘अभिनव भारत’ से लेकर वैचारिक राष्ट्रवाद तक की नींव को सुदृढ़ किया।
जन्म एवं पारिवारिक उत्तरदायित्व
बाबाराव का जन्म 13 जून, 1879 को नासिक के निकट भागपुर में हुआ था। दामोदर विनायक सावरकर की ज्येष्ठ संतान होने के नाते, माता-पिता के असामयिक देहावसान के बाद मात्र 20 वर्ष की आयु में पूरे परिवार का भार उनके कंधों पर आ गया। विनायक, मैनाबाई और नारायण—इन तीनों छोटे भाई-बहनों की शिक्षा और संरक्षण का दायित्व निभाते हुए भी उनके भीतर राष्ट्रभक्ति की ज्वाला निरंतर सुलगती रही।
क्रांति का शंखनाद: ‘अभिनव भारत’
यद्यपि बाबाराव की रुचि आरंभ में योग और जप-तप की ओर थी, किंतु देश की पराधीनता ने उन्हें शस्त्र उठाने पर विवश किया। जब विनायक सावरकर उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए, तब भारत में ‘अभिनव भारत’ क्रांतिकारी दल की कमान बाबाराव ने संभाली। वे न केवल विनायक द्वारा भेजी गई क्रांतिकारी सामग्री का मुद्रण और वितरण करते थे, बल्कि संगठन के लिए धन और संसाधन जुटाने का दुष्कर कार्य भी करते थे।
कारावास और अंडमान की यात्रा
अंग्रेजी हुकूमत की नजरों में बाबाराव एक खतरनाक विद्रोही थे। वर्ष 1909 में उन्हें देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया और आजीवन कारावास की सजा देकर ‘कालापानी’ (अंडमान) भेज दिया गया। वर्ष 1921 में उन्हें भारत लाया गया और साबरमती जेल में रखा गया, जहाँ से 1922 में उनकी रिहाई हुई।
वैचारिक राष्ट्रवाद और आरएसएस
जेल से रिहा होने के बाद बाबाराव सावरकर का संपर्क डॉ. हेडगेवार से हुआ। ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की नींव रखने वाले पांच प्रमुख मित्रों में डॉ. मूनजे, डॉ. परांजपे, डॉ. थोलकर और डॉ. हेडगेवार के साथ बाबाराव सावरकर भी सम्मिलित थे।
राष्ट्र मीमांसा: बाबाराव द्वारा लिखित ‘राष्ट्र मीमांसा’ (1938) को हिंदुत्व की विचारधारा का पहला व्यवस्थित वक्तव्य माना जाता है, जिसे बाद में श्री गोलवलकर जी ने भी संदर्भ के रूप में उपयोग किया।
साहित्यिक योगदान
बाबाराव एक प्रखर लेखक भी थे। उन्होंने ‘दुर्गानंद’ के छद्म नाम से ‘इंडिया एज़ ए नेशन’ जैसी पुस्तकें लिखीं, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने अपनी दमनकारी नीति के तहत जब्त कर लिया। वे हिंदी भाषा के प्रबल समर्थक और अखंड हिंदू राष्ट्र के स्वप्नद्रष्टा थे।
अश्विनी राय ‘अरुण’ की भावांजलि
”बाबाराव सावरकर वह मौन तपस्वी थे, जिन्होंने खुद को तिल-तिल जलाकर क्रांति की मशाल को बुझने नहीं दिया। यदि विनायक सावरकर ‘वीर’ थे, तो बाबाराव उस वीरता के ‘संस्कार’ थे। उनका जीवन हमें सिखाता है कि परिवार और राष्ट्र के दायित्वों को एक साथ कैसे निभाया जाता है।”