June 24, 2024

हिन्दू महासभा के एक क्रान्तिकारी कार्यकर्ता थे। जिन्हें गान्धी-हत्या के आठ अभियुक्तों मे जैसे शंकर किस्तैया, मदनलाल पाहवा, दिगम्बर बड़गे, नारायण आप्टे, विनायक दामोदर सावरकर, नाथूराम गोडसे और विष्णु करकरे के साथ गान्धी-हत्या के मामले में सजा मिली थी। ये प्रमुख अभियुक्त नाथूराम गोडसे के अनुज थे, जिनका नाम गोपाल गोडसे था। अपने अंतिम दिनों तक उन्हें महात्मा गाँधी के प्रति अपने रवैये पर कभी कोई अफ़सोस नहीं था, वे महात्मा गाँधी को हिंदुस्तान के बटवारे का दोषी व पक्षपाती मानते रहे ! कट्टर देशभक्त हिन्दू की छवि लेकर वे अंत तक कार्यरत रहे, वृद्धावस्था के समय भी वे भारतीय पुरातत्व एवं इतिहास के अध्यन में व्यस्त थे ! न्यायालय में जब गान्धी-हत्या का अभियोग चला तो मदनलाल पाहवा ने उसमें स्वीकार किया कि जो भी लोग इस षड्यन्त्र में शामिल थे पूर्व योजनानुसार उसे केवल बम फोडकर सभा में गडबडी फैलाने का काम करना था, शेष कार्य अन्य लोगों के जिम्मे था। जब उसे छोटूराम ने जाने से रोका तो उसने जैसे भी उससे बन पाया अपना काम कर दिया। उस दिन की योजना भले ही असफल हो गयी हो परन्तु इस बात की जानकारी तो सरकार को हो ही गयी थी कि गान्धी की हत्या कभी भी कोई कर सकता है। आखिर २० जनवरी १९४८ की पाहवा द्वारा गान्धीजी की प्रार्थना-सभा में बम-विस्फोट के ठीक १० दिन बाद उसी प्रार्थना सभा में उसी समूह के एक सदस्य नथूराम गोडसे ने गान्धी के सीने में ३ गोलियाँ उतार कर उन्हें सदा सदा के लिये समाप्त कर दिया।

गोपाल गोडसे की एक किताब थी, जिसे कांग्रेस ने बैन कर दिया था। आखिर क्या था गोपाल गोडसे की उस किताब में ???

गोपाल गोडसे, ‘भारत को गांधीवाद की सोच देने वाले महात्मा गांधी जिनकी मृत्यु आज तक रहस्य बनी हुई है। ऐसा रहस्य जिसमें गुनहगार ने गुनाह भी कबूला और फांसी की सजा भी मिली। लेकिन उसके बावजूद भी हत्या का असली मकसद कभी साफ नही हो पाया। अखबार हिंदू राष्ट्र के संपादक नाथूराम गोडसे जो हमेशा से गांधी की सोच के कायल थे।उन्होंने गांधी को अपने घर पर खाने का निमंत्रण भी दिया था। उसी ने गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी। और पुलिस के पास जाकर अपना गुनाह भी कबूला । ऐसा इंसान हत्यारा था य़ा हालातो ने उसे गुनहगार बनाया।
इस बात को आज तक कोई नहीं समझ पाया। नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे ने नाथूराम गोडसे को लेकर कई लेख और किताबें लिखी। जिनमे से कई लेख और किताबों को कांग्रेस ने बैन कर दिया । उन्ही मे से एक किताब ऐसी भी थी। जिसमे गोपाल गोडसे ने नाथूराम गोडसे के गांधी को लिखे सभी पत्र को संजोया था। नाथूराम गोडसे का आखिरी पत्र जो उसने गांधी को आखिरी बार लिखा था। उसका भी गोपाल गोडसे ने उस किताब में जिक्र किया था। गोपाल ने अपनी किताब ‘गांधी वध क्यों’ में नाथूराम गोडसे की गांधी की हत्या के १३० कारणों की व्याख्या की थी। जो वजह नाथूराम गोडसे ने कोर्ट को बताई थी। कुछ तथ्यों के अनुसार नाथूराम गोडसे भारत -पाकिस्तान विभाजन से खुश नहीं थे । गोपाल गोडसे की किताब में लिखा है कि नाथूराम ने विभाजन को लेकर कहा, “जब कांग्रेस के दिग्गज नेता, गांधी की सहमति से देश के बंटवारे का फ़ैसला कर रहे थे, उस देश का जिसे हम पूजते रहे हैं, मैं भीषण ग़ुस्से से भर रहा था। व्यक्तिगत तौर पर किसी के प्रति मेरी कोई दुर्भावना नहीं है लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि मैं मौजूदा सरकार का सम्मान नहीं करता, क्योंकि उनकी नीतियां मुस्लिमों के पक्ष में थीं। लेकिन उसी वक्त मैं ये साफ देख रहा हूं कि ये नीतियां केवल गांधी की मौजूदगी के चलते थीं। “

गोडसे ने कहा था – अगर मैं उसदिन गांधी की हत्या न करता तो दूसरा विभाजन पक्का था।
गोडसे के अनुसार पाकिस्तान का माना था कि पूर्वी पाकिस्तान से पश्चिमी पाकिस्तान (बांग्लादेश) जाने में बहुत वक्त लगता है और हर कोई जहाज का खर्चा नहीं उठा सकता । इसलिए पाकिस्तान से दिल्ली होते हुए पश्चिमी पाकिस्तान तक एक कॉरिडोर तैयार किया जाए। जिसके किनारे सिर्फ मुसलमानों की बस्तियां होंगी।

गोपाल गोडसे की किताब में नाथूराम गोडसे और महात्मा के सबसे छोटे बेटे देवदास की मुलाकात का जिक्र है। जिसमें कहा गया है कि जब देवदास नाथूराम गोडसे से मिलने आए तो वो हैरान थे क्योंकि वो किसी क्रूर हत्यारे की तस्वीर मन में सोचकर आए थे लेकिन नाथूराम गोडसे तो बुहुत सौम्य और सहज थे।लेकिन गोडसे ने जो देवदास को कहा वो चौकाने वाला था। देवदास द्वारा हत्या का कारण पूछे जाने पर नाथूराम गोडसे ने कहा -“मैने उनकी हत्या केवल राजनीतिक कारणों से की है।” नाथूराम गोडसे इसे पहले की पूरी बात बता पाते मिलने का वक्त खत्म हो गया। गांधी के बङे बेटे रामदास गांधी ने भी नाथूराम गोडसे से वजह जाने के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू से अपील की लेकिन ये अपील खारिज कर दी गई। उस वक्त की सरकार ने ये फैसला क्यों लिया ये कहना तो मुश्किल है लेकिन इसने इस मामले को एक रहस्य जरुर बना दिया। जिसे सबने अपने – अपने हिसाब से समझा। लेकिन गोपाल गोडसे ने नाथूराम गोडसे की संपत्ति का जिक्र करते हुए लिखा था कि गोडसे की आखिरी इच्छा था कि उनकी अस्तियों को उस दिन सिंधु नदी में बहाया जाए जब सिंधु नदी दोबारा से भारत के तिरंगे झण्डे के नीचे बहने लगे।

गोपाल गोडसे का पूरा और मराठी नाम गोपायक विनायक गोडसे मगर हिन्दी भाषी लोगों के लिए वे गोपाल विनायक गोडसे थे। दोस्तों मुझे आज तक यह समझ नहीं आया की भाषा के आधार पर नाम कैसे बदल जाता है। अच्छा छोड़िए इन बातों को हम आगे चलते हैं…

गोपाल नाथूराम गोडसे के छोटे भाई थे, उनका जन्म १२ जून १९१९ को पुणे जिले के खेड़ (अब राजगुरुनगर) में हुआ था। वह विनायक गोडसे और लक्ष्मी के चार बेटों में तीसरे थे। उनकी प्राथमिक शिक्षा रायगढ़ जिले के कर्जत में शुरू हुई, और रत्नागिरी में जारी रही। उनके पिता के सेवानिवृत्त होने के बाद, उनका पूरा परिवार सांगली में बस गया और उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा भी वहीं से पास की। कालांतर मे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में एक स्वयंसेवक के रूप में जुड़े। इसके साथ ही, उन्होंने हिंदू महासभा के लिए भी काम किया, परंतु सदस्यता के बिना। ऐसा क्यूँ हुआ ??? जब पेट पालने की बारी आई ; यानी जीवनयापन के लिए वे एक स्टोर कीपर के रूप में सशस्त्र बलों में शामिल हो गए। जब ​​द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ, तो उन्हें मोर्चे के लिए चुना गया। और अप्रैल १९४४ तक वे इराक और ईरान में अपनी सेवा देते रहे। वापस आने के बाद, उन्होंने सिंधु से शादी की जिनसे उन्हें दो बेटियां विदुलता और असिलता का पिता कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

महात्मा गांधी की हत्या…

गोपाल गोडसे के बड़े भाई, नाथूराम ने ३० जनवरी, १९४८ को महात्मा गांधी को गोली मार दी थी। गोपाल ने हत्या की साजिश रचने में मदद की थी और कथित तौर पर वहाँ मौजूद भी थे, हालांकि वो अपनी बंदूक से फायर करने में पूर्णतया असमर्थ हो गए थे। गोपाल को ५ फरवरी को पुणे में उनके घर से गिरफ्तार किया गया था और हत्या जैसे अपराध में सहायक होने के लिए १८ साल की सजा सुनाई गई थी। १५ नवंबर, १९४९ को नारायण आप्टे के साथ एक अन्य सह-साजिशकर्ता, नाथूराम को फांसी पर लटका दिया गया। तीनों लोगों ने माना कि गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से मुंह मोड़ लिया था, और उनके कार्यों के कारण भारत का विभाजन हुआ, जिसके कारण भारत में बदलाव हुआ। पाकिस्तान के मुसलमानों और भारत के हिंदुओं के बीच सांप्रदायिक संघर्ष की दास्तान १९९८ में Rediff.com के साथ एक साक्षात्कार में, गोपाल ने दोहराया कि उन्होंने गांधी की हत्या पर कभी पछतावा नहीं रहा जबकी उन्हें नफरत थी। उन्होंने गांधी को मुसलमानों का “तुष्टिकरण” कहा।

गोडसे के अनुसार, २० जनवरी, १९४८ को दिल्ली में गांधी की प्रार्थना सभा में एक बम विस्फोट हुआ था, जो गांधी से सिर्फ ५० मीटर की दूरी पर फटा था। यह विफल विस्फोट था जिसके लिए मदन लाल पाहवा को पकड़ा गया था।’ गोडसे ने दावा किया कि गांधी ने वास्तव में “हे राम” नहीं कहा था, क्योंकि वह मर रहे थे और यह साबित करने के लिए सरकार का सिर्फ एक चाल थी कि वह वास्तव में वे एक कट्टर हिंदू थे। जो संत बनाने के लिए योग्य थे, जिस पर अपनी राजनीति चमकाई जा सके। टाइम पत्रिका के साथ एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “किसी ने मुझसे पूछा कि क्या गांधी ने कहा” हे राम “। मैंने कहा कि किंग्सले ने ऐसा कहा था। लेकिन गांधी ने नहीं किया। क्योंकि वह नाटक नहीं था।” उन्होंने स्वीकार किया कि किसी समय, गांधी उनके आदर्श थे। उन्होंने गांधी को उस जन जागरण का श्रेय दिया जो उन्होंने बनाया था और उन्होंने भारतीयों के मन से जेल जाने के भय को दूर किया था।

गांधी की हत्या के बाद का जीवन…

गांधीजी की हत्या में भूमिका के लिए गोपाल को गिरफ्तार किए जाने के बाद, सिंधु-ताई गोडसे ने गोपाल के बड़े भाई दत्तात्रेय की कार्यशाला में काम करके अपना और अपनी बेटियों का जीवनयापन किया, जिसे ‘उद्योगम इंजीनियरिंग’ कहा जाता है। बाद में उसने पुणे में एक अलग घर बनाया और ‘प्रताप इंजीनियरिंग’ के नाम से अपनी एक छोटी सी कार्यशाला शुरू की। गोडसे को अक्टूबर १९६४ में जेल से रिहा कर दिया गया, लेकिन एक महीने बाद ही फिर से भारत रक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर लिया गया और एक साल तक जेल में रखा गया। आखिरकार उन्हें १९६५ के अंत में रिहा कर दिया गया। अपने अंत समय तक वे काफी हद तक महात्मा गांधी और हत्या पर लिखी गई पुस्तकों से प्राप्त रॉयल्टी पर निर्भर रहे। उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में नौ पुस्तकें लिखीं। २००५ में गोडसे की मृत्यु के समय तक, उनकी बेटी हिमानी सावरकर (य़ानी असिलता गोडसे) ने पुणे में एक हिंदू संगठन का नेतृत्व किया। गोडसे और सावरकर का परिवार करीब रहा। गोडसे की बेटी असिलता ने बाद में सावरकर के छोटे भाई नारायण के बेटे अशोक सावरकर से शादी की। उनलोगों के परिवारों को हिंदू महासभा के करीब रहना आज भी जारी है क्यूंकि गोपाल गोडसे जेल से रिहा होने के बाद कई वर्षों तक इसके महासचिव बने रहे।

गोपाल गोडसे की पुस्तके…

१. क्या भारतीय कानून के तहत जेल में मरने का दोषी पाया गया है? (१९६१)
२. जया मृत्युंजय (१९६९)
३. क्रान्तिकारंचा अद्वैतमावद आनि इतरा लेखा (१९७१)
४. पंचवन कोटिनचे बाली (५५ करोड़ का बलिदान; १९७१)
५. सईन का लिहिला जय राष्ट्रचिता इतिहस? (१९७५)
६. लाल किलातिला अथवानी (१९८१)
७. गांधी हटिया आनी मी (गांधी हत्या और मैं; १९८९)
८. कुतुब मीनार विष्णु ध्वाजा है (१९६१)
९. फांसी आनी नाथूराम (१९९९)।

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