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तारकनाथ दास: सात समंदर पार से क्रांति का शंखनाद करने वाले महामनीषी

​भारतीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास केवल भारत की भूमि पर नहीं, बल्कि विदेशों में रह रहे प्रवासियों के खून और पसीने से भी लिखा गया है। ग़दर पार्टी उसी अंतरराष्ट्रीय क्रांति का केंद्र थी, जिसने 10 मई, 1913 को अमेरिका और कनाडा की धरती पर जन्म लिया। ‘प्रशान्त तट का हिन्दी संघ’ कहे जाने वाले इस संगठन ने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को उत्प्रेरित किया। इसी संगठन के एक ऐसे स्तंभ थे डॉ. तारकनाथ दास, जिन्होंने कलम और क्रांति दोनों से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी।

 

​जन्म एवं प्रारंभिक चेतना

​तारकनाथ दास का जन्म 15 जून, 1884 को पश्चिम बंगाल के कंचरापाड़ा (मंजूपाड़ा) में हुआ था। एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे तारक बचपन से ही मेधावी थे। उनकी देशभक्ति का प्रमाण उनके द्वारा लिखे गए एक निबंध से ही मिल गया था, जिसे पढ़कर अनुशीलन समिति के संस्थापक बैरिस्टर पी. मित्र ने उन्हें अपनी समिति में भर्ती कर लिया। कलकत्ता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही वे गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए थे।

 

​विदेश गमन और ‘फ्री हिन्दुस्तान’

​वर्ष 1905 में जब बंगाल विभाजन की आग सुलग रही थी और पुलिस उनके पीछे लगी थी, तब तारकनाथ जी ‘साधु’ का वेश धारण कर ‘तारक ब्रह्मचारी’ के नाम से जापान चले गए। वहां से वे अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को पहुंचे। विदेश की धरती पर भारतीय स्वतंत्रता की गूँज पहुँचाने के लिए उन्होंने ‘फ्री हिन्दुस्तान’ (Free Hindustan) नामक समाचार पत्र निकालना शुरू किया। यह विदेश से निकलने वाला पहला भारतीय क्रांतिकारी पत्र था। उन्होंने लाला हरदयाल के साथ मिलकर ‘ग़दर पार्टी’ को संगठित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

 

​शिक्षा और शोध का संगम

​क्रांति के साथ-साथ उन्होंने अपनी शिक्षा को कभी रुकने नहीं दिया। उन्होंने वाशिंगटन यूनिवर्सिटी से एम.ए. और जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। बाद में वे कोलंबिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर बने। वे एक ऐसे ‘प्रोफेसर’ थे जिनकी भावी योजनाओं की चर्चा स्वयं महान दार्शनिक लियो टॉल्स्टॉय के साथ होती थी।

 

​प्रथम विश्वयुद्ध और कारावास

​प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान वे शोध के बहाने जर्मनी गए और वहां से भारत में हथियारों की खेप भेजने का प्रयास किया। उनकी अंतरराष्ट्रीय सक्रियता ने ब्रिटिश सरकार को इतना डरा दिया कि अमेरिका में उन पर मुकदमा चलाया गया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें 22 महीने की जेल काटनी पड़ी।

 

​संस्थाओं के जरिए सेवा

​जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने अपना जीवन उन भारतीय छात्रों के लिए समर्पित कर दिया जो विदेश में शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। उन्होंने ‘इंडिया इंस्टीट्यूट’ और ‘तारकनाथ दास फाउंडेशन’ की स्थापना की। वर्ष 1952 में, लंबे निर्वासन के बाद वे अपनी मातृभूमि लौटे और कोलकाता में ‘विवेकानंद सोसाइटी’ की स्थापना की।

 

​अश्विनी राय ‘अरुण’ की भावांजलि

​”डॉ. तारकनाथ दास का जीवन इस बात का प्रमाण है कि क्रांति केवल हथियारों से नहीं, बल्कि ज्ञान और बौद्धिक विमर्श से भी लड़ी जाती है। उन्होंने दुनिया को बताया कि भारत की आजादी केवल एक देश की नहीं, बल्कि मानवता की जीत होगी। ऐसे महान अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी को कोटि-कोटि नमन।”

 

 

 

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