April 4, 2025

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झण्डा ऊँचा रहे हमारा।
सदा शक्ति सरसाने वाला
प्रेम-सुधा बरसाने वाला
वीरों को हरसाने वाला
मातृभूमि का तन-मन सारा,
झण्डा ऊँचा रहे हमारा।

इस गीत को आप सभी ने सुना ही होगा, जी हां भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान उत्प्रेरक यह झण्डा गीत है।

मगर आप सोच रहे होंगे की एकाएक आज झण्डा गीत की बात क्यूँ आन पड़ी..? ना तो आज स्वतंत्रता दिवस है और ना ही गणतंत्र दिवस ही है। फिर यह झण्डा गीत ? ? ? तो साहेबान, मेहरबान, कदरदान आज…

१६ सितंबर है, और आज ही के दिन इस झण्डा गीत के गीतकार श्री श्यामलाल गुप्त’पार्षद’ जी का जन्म उत्तर प्रदेश में कानपुर जिले के नरवल ग्राम में ९ सितम्बर १८९६ को मध्यवर्गीय वैश्य परिवार में हुआ था। उनके पिताजी का नाम श्री विश्वेश्वर प्रसाद और माताजी का नाम श्रीमती कौशल्या देवी था। प्रकृति ने उन्हें कविता करने की क्षमता सहज रूप में प्रदान की थी। जब श्यामलाल जी पाँचवी कक्षा में थे तो यह कविता लिखी..

परोपकारी पुरुष मुहिम में, पावन पद पाते देखे,
उनके सुन्दर नाम स्वर्ण से सदा लिखे जाते देखे।

कालांतर में अमर शहीद गणेशशंकर विद्यार्थी और साहित्यकार प्रताप नारायण मिश्र के सानिध्य में आने पर श्यामलालजी ने अध्यापन, पुस्तकालयाध्यक्ष और पत्रकारिता के विविध जनसेवा कार्य किये। पार्षद जी १९१६ से १९४७ तक पूर्णत: समर्पित कर्मठ स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी रहे। गणेशजी की प्रेरणा से आपने फतेहपुर को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। इस दौरान ‘नमक आन्दोलन’ तथा ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ का प्रमुख संचालन तथा लगभग १९ वर्षों तक फतेहपुर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद के दायित्व का निर्वाह करते रहे।

रामचरित मानस पार्षद जी का प्रिय ग्रन्थ था। वे श्रेष्ठ ‘मानस मर्मज्ञ’ तथा प्रख्यात रामायणी भी थे। रामायण पर उनके प्रवचन की प्रसिद्ध दूर-दूर तक थी। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद को उन्होंने सम्पूर्ण रामकथा राष्ट्रपति भवन में सुनाई थी। नरवल, कानपुर और फतेहपुर में उन्होंने रामलीला आयोजित की।

‘झण्डा गीत’ के अलावा एक और ध्वज गीत श्यामलाल गुप्त ’पार्षद’ जी ने लिखा था। लेकिन इसकी विशेष चर्चा नहीं हो सकी। उस गीत की पहली पंक्ति है:

राष्ट्र गगन की दिव्य ज्योति,
राष्ट्रीय पताका नमो-नमो।
भारत जननी के गौरव की,
अविचल शाखा नमो-नमो।

आजादी के बाद पार्षद जी को एक बार आकाशवाणी से कविता पाठ का न्योता मिला। उनके द्वारा पढ़ी जाने वाली कविता का एक स्थानीय अधिकारी द्वारा निरीक्षण किया गया जो तत्कालीन राजनीति पर हमला करती हुई जान पड़ती थी जो इस प्रकार थी…

सिंह यहाँ पंचानन मरते और स्यार स्वछन्द बिचरते,
छक कर गधे खिलाये खाते, घोड़े बस खुजलाये जाते।

ऐसे निर्भीक और सच्चे व्यक्ति थे पार्षद जी, उनके जन्मदिवस पर अश्विनी राय ‘अरूण’ का नमन।

धन्यवाद !

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