May 18, 2024

भैया पांचों पांडव कहिए जिनको नाम सुनाऊं
लाखे वामनराव हमारे धर्मराज को है अवतार
भीमसेन अवतारी जानो, लक्ष्मीनारायण जिनको नाम
डागा सहदेव नाम से जाहिर रउफ नकुल को है अवतार
ठाकुर अर्जुन के अवतारी योद्धा प्यारेलाल साकार

बात १९३०की है जब महात्मा गाँधी ने आन्दोलन शुरू किया था तो रायपुर में इस आन्दोलन का नेतृत्व वामनराव बलिराम लाखे, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, मौलाना रउफ़, महंत लक्ष्मीनारायण दास और शिवदास डागा कर रहे थे। ये पांचों रायपुर में स्वाधीनता के आन्दोलन में ‘पांच पाण्डव’ के नाम से विख्यात हो गये थे। इसी लिए इस कविता में उन्हें पांच पांडव कहा गया है। मगर हम आज बात कर रहे हैं इन पांडवों के धर्मराज यानी…श्री वामनराव बलिराम लाखे की जिनका जन्म १७ सितम्बर, १८७२ में रायपुर, छत्तीसगढ़ में हुआ था। उनके पिता पण्डित बलीराव गोविंदराव लाखे एक ग़रीब व्यक्ति थे, मगर दृढ़ निश्चय और कठोर परिश्रम से उन्होंने कई गाँव ख़रीद लिये थे। जब वामनराव बलिराम लाखे का जन्म हुआ, उस समय तक उनके परिवार की गणना समृद्ध घरानों में होने लगी थी।वामनराव बलिराम लाखे बड़े होने के बाद वकालत की शिक्षा पूरी की और वकालत को अपना हथियार बना स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े। कालांतर में उन्होने अपना कार्यक्षेत्र सहकारी आंदोलन को बनाया, जिससे वे जीवन पर्यन्त जुड़े रहे। जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद वे सहकारिता आंदोलन के द्वारा इस अंचल के दु:खी और शोषित किसानों की सेवा तथा सहयोग करना उनका प्रमुख उद्देश्य था। १९१३ में ही उन्होंने रायपुर में ‘को-आपरेटिव सेन्ट्रल बैंक’ की स्थापना की थी, जिसके वे १९३६ तक अवैतनिक सचिव के पद पर रहकर कठोर परिश्रम तथा निष्ठा के साथ कार्य करते रहे और संस्था को उन्नति के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचा दिया। १९३७ से १९४० तक वे इस संस्था के अध्यक्ष पद पर रहे। उनके प्रयास से ही १९३० में बैंक का अपना स्वयं का भवन बनाया गया था।१९१५ में रायपुर में ‘होमरूल लीग’ की स्थापना की गई थी। लाखे जी उसके संस्थापक थे। छत्तीसगढ़ में शुरू में जो राजनीतिक चेतना फैली थी, उसमें लाखे जी का बहुत बड़ा योगदान था। उन्होंने अपना सारा जीवन राष्ट्रीय आन्दोलन और सहकारी संगठन में बिताया। १९१५ में बलौदा बाज़ार में ‘किसान को-आपरेटिव राइस मिल’ की स्थापना उन्होंने की थी। लाखे जी को अंग्रेज़ हुकूमत ने किसानों की सेवाओं के लिए १९१६ में ‘रायसाहब’ की उपाधि दी थी। जिसे उन्होंने असहयोग आंदोलन के समय अंग्रेजों को वापस कर दिया। इसपर लोगों ने उन्हें ‘लोकप्रिय’ की और एक उपाधि दे दी। ऐसा प्रभाव था जनता में लाखे जी का…रायपुर में ऐसा कोई पद नहीं था जिसपर लाखे जी अवैतनिक आजीवन स्थापित ना रहे हों, चाहे वो सहकारिता हो, बैंक हो, डाकघर हो, स्कूल की अध्यक्षता हो अथवा नगरपालिका की। प्रभाव भी ऐसा था उनका उनकी घाट पर अंग्रेजी हुकूमत और गरम दल एक साथ बैठते थे। कांग्रेस और आमजन को भी उनके किए फैसले पर कभी विरोध ना हुआ।ऐसे महान विभूति, धर्मराज श्री वामनराव बलिराम लाखे जी को अश्विनी राय ‘अरूण’ का कोटि कोटि नमन।धन्यवाद !

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