श्रीमान दूरदर्शन जी से एक आत्मीय माफीनामा… और जन्मदिन की ढेरों बधाइयाँ!
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
एक आत्मीय क्षमा-याचना: अपनों से कैसी बेरुखी?
अभी सितंबर का महीना ही चल रहा है, दिन बहुत आगे नहीं निकले हैं, इसलिए अभी भी समय रहते यह कहने का साहस जुटा पा रहा हूँ—”श्रीमान दूरदर्शन जी, मैं बहुत ही संकोच और भरे मन से आपसे हाथ जोड़कर माफी मांगता हूँ।”
बीती १५ सितंबर को आपका जन्मदिन था और इस भागदौड़ भरी जिंदगी के शोर में हमसे थोड़ी देर हो गई। लेकिन कहते हैं न कि अपनों को बधाई देने में यदि कुछ पल की देरी हो भी जाए, तो आत्मीयता कम नहीं होती। अतः विलंब के लिए क्षमा प्रार्थी होते हुए, मैं स्वयं अपनी ओर से, अपने सगे-संबंधियों, परिजनों और अपने तमाम आत्मीय मित्रों की तरफ से आपको जन्मदिन की अनंत और ढेरों बधाइयाँ प्रेषित करता हूँ। आप दीर्घायु हों और हमारी स्मृतियों में सदा अमर रहें!
कौन समझेगा आपका महत्व?
आज की पीढ़ी, जो हाथ में रिमोट थामे सैकड़ों और हजारों चैनलों के समंदर में खोई हुई है, वह शायद आपके इस एकांत और विनीत महत्व को कभी न समझ पाए। आपके महत्व को केवल वही लोग समझ सकते हैं, जिन्होंने इस देश में सैटेलाइट और केबल टीवी के आने से पहले अपना वह मासूम और सादगी भरा बचपन जिया हो।
गोद में बैठा मोगली: आपके महत्व को वो पीढ़ी आज भी अपनी रगों में महसूस करती है, जिसने रविवार की सुबह ठीक ९ बजे आपकी गोद में बैठकर, उस मोगली को जंगल-जंगल घूमते देखा था और जिसके कानों में आज भी “जंगल जंगल बात चली है पता चला है…” का वो तराना मिश्री घोल देता है।
प्रत्यक्ष देवत्व का अहसास: आपके महत्व को हमारे घर के वो बुजुर्ग और सयाने लोग समझेंगे, जिन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम और योगेश्वर श्री कृष्ण को ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के माध्यम से साक्षात अपने टेलीविजन स्क्रीन पर प्रत्यक्ष महसूस किया था। वह भी क्या दौर था, जब धारावाहिक शुरू होने से पहले टीवी पर अगरबत्ती दिखाई जाती थी, चप्पलें उतार दी जाती थीं और पूरा गाँव एक घर में सिमट जाता था।
जवानी की वो धड़कन: आपके महत्व को वो अल्हड़ जवानी महसूस करेगी, जिसने पूरे सप्ताह पल-पल गिनकर बुधवार की शाम ‘चित्रहार’ और रविवार की सुबह ‘रंगोली’ का बेसब्री से इंतजार किया था। गानों के आने से पहले उस ब्लैक एंड व्हाइट स्क्रीन पर घूमता हुआ आपका वह पारंपरिक ‘लोगो’ (Logo) और पृष्ठभूमि में बजती पंडित रविशंकर की वह अमर धुन—“सत्यम शिवम सुंदरम”—सिर्फ एक सिग्नेचर ट्यून नहीं थी, बल्कि धड़कनों की लय थी।
कुछ अनकही कहानियाँ: एंटीना का वो दौर और पड़ोस का वो प्यार
दूरदर्शन जी, आपके साथ सिर्फ कार्यक्रम नहीं जुड़े थे, बल्कि इंसानी रिश्तों की पूरी एक किताब जुड़ी थी। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो कुछ कहानियाँ आँखों के सामने सजीव हो उठती हैं:
छत पर एंटीना घुमाने की वो कसरत: याद आता है वह रविवार का दिन, जब अचानक स्क्रीन पर झिलमिलाहट (स्नो) आने लगती थी। फिर घर का एक सदस्य छत पर जाकर लोहे के उस ‘एल्युमिनियम एंटीना’ को घुमाता था और नीचे से आवाज़ लगाई जाती थी—”आया?… आया?… थोड़ा और घुमाओ… हाँ! बस-बस, रुक जाओ, आ गया!” वह एंटीना घुमाना सिर्फ सिग्नल पकड़ना नहीं, बल्कि पूरे परिवार के आपसी तालमेल की एक अनूठी कसरत थी।
पड़ोसियों का वो साझा आँगन: उस दौर में पूरे मोहल्ले या गाँव में किसी एक या दो संपन्न घरों में ही टीवी हुआ करता था, जिसे लोग बकायदा एक शटर वाले लकड़ी के डिब्बे (कैबिनेट) में बंद करके ताला लगाकर रखते थे। लेकिन जैसे ही रविवार की सुबह होती थी, उस घर का मुख्य दरवाजा और वह लकड़ी का शटर सबके लिए खुल जाता था। बिना किसी निमंत्रण के, पड़ोस के बच्चे, बूढ़े, महिलाएं अपनी-अपनी चटाइयां और बोरियां लेकर फर्श पर बैठ जाते थे। वह दूरदर्शन ही था, जिसने समाज में अमीर-गरीब की दूरियों को मिटाकर सबको एक धागे में पिरो दिया था।
एक विनीत शुरुआत से जन-जन के एकाधिकार तक का सफर
यदि इतिहास के झरोखे से देखें, तो आपका यह सफर भारत के विकास की कहानी है:
१५ सितंबर, १९५९: इस ऐतिहासिक दिन आपकी शुरुआत अत्यंत विनीत और संकोची तरीके से, दिल्ली में महज़ एक छोटे से ‘परीक्षण’ (Experimental Telecast) के तौर पर हुई थी। तब किसने सोचा था कि यह छोटा सा पौधा एक दिन महावृक्ष बनेगा।
नियमित प्रसारण और विस्तार: नियमित दैनिक प्रसारण की शुरुआत सन १९६५ में ‘ऑल इंडिया रेडियो’ (AIR) के एक अभिन्न अंग के रूप में हुई। इसके बाद सन १९७२ में आपकी सेवाओं का विस्तार बंबई (मुंबई) और अमृतसर तक हुआ और १९७५ आते-आते यह अनूठी सुविधा देश के ७ बड़े महानगरों में अपनी पैठ बना चुकी थी।
१९८२ का वो जादुई साल: सन १९८२ आपके इतिहास का सबसे जादुई और स्वर्णिम वर्ष सिद्ध हुआ, जब ‘राष्ट्रीय प्रसारण’ (National Telecast) की शुरुआत हुई। इसी साल एशियाड खेलों के साथ आप श्वेत-श्याम (Black & White) से रंगीन (Color) हो गए। रंगीन होते ही आप भारतीय जनमानस के बेडरूम से लेकर लुटियन दिल्ली के गलियारों तक, हर आम और खास के सबसे प्रिय और इकलौते साथी बन गए।
आज भले ही समय बदल गया हो, स्क्रीन पतली हो गई हो और मनोरंजन के साधन उंगलियों पर सिमट गए हों, लेकिन जो सुकून, जो शुचिता और जो अपनापन आपकी बंदगी में था, वह आज के इस व्यावसायिक कोलाहल में कोसों दूर है।
मैं, विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’, पुनः एक बार पूरे आदर, श्रद्धा और आत्मीयता के साथ श्रीमान दूरदर्शन जी को जन्मदिन की अनंत-अनंत बधाइयाँ देता हूँ। आप हमारे भीतर के उस मासूम बच्चे के रूप में हमेशा जिंदा रहेंगे।
धन्यवाद !