अटल संकल्प: आपातकाल की कालकोठरी से गूँजी वो कविता, जो आज भी झुकना नहीं सिखाती
”नाम जिसका ‘अटल’ है, वो वीर क्या कहीं झुकता है?
जिसके चाहने वाले करोड़ों हैं, उनके चरणों में राष्ट्र का शीश स्वतः ही झुकता है।”
भारतीय राजनीति के अजातशत्रु, प्रखर वक्ता और ओजस्वी कवि श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्मोत्सव पर उनके पावन स्मरण में पूरा देश नतमस्तक है। उनके विराट व्यक्तित्व के बारे में कोई क्या कहे, जिनके चाहने वाले करोड़ों हैं और जिनकी प्रशंसा में इतिहास के पन्ने भी छोटे पड़ जाते हैं।
अटल जी के जन्म-दिवस के इस पावन अवसर पर, उन्हें नमन करते हुए, मैं उनकी वही कालजयी और ऐतिहासिक कविता पेश कर रहा हूँ, जो उन्होंने सन् १९७५ में आपातकाल के काले दिनों के दौरान कारागार (जेल) की सलाखों के पीछे से तानाशाह सत्ता की छाती पर लिखी थी। यह कविता आज भी हमें विपरीत परिस्थितियों से लड़ना और आत्मसम्मान के साथ जीना सिखाती है।
॥ टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते ॥
सत्य का संघर्ष सत्ता से,
न्याय लड़ता निरंकुशता से,
अँधेरे ने दी चुनौती है,
किरण अन्तिम अस्त होती है।
दीप निष्ठा का लिए निष्कम्प,
वज्र टूटे या उठे भूकम्प,
यह बराबर का नहीं है युद्ध,
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध,
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज,
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज।
किन्तु फिर भी जूझने का प्रण,
पुन: अंगद ने बढ़ाया चरण,
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार,
समर्पण की माँग अस्वीकार।
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते;
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते।
एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: जब कलम बनी वज्र
यह महज़ कुछ पंक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र के चीरहरण के खिलाफ एक महायोद्धा का वैचारिक शंखनाद है। २५ जून १९७५ को जब देश पर आपातकाल का ग्रहण लगा और लोकतंत्र के प्रहरियों को सलाखों के पीछे डाल दिया गया, तब जेल की वो तन्हाई अटल जी के हौसलों को डिगा नहीं सकी।
निरंकुश सत्ता के पास दमनकारी ‘पशुबल’ था, सेना थी, तंत्र था और जेल की कालकोठरी थी; लेकिन अटल जी के पास ‘निष्ठा का निष्कंप दीप’ और सत्य का अडिग साहस था। उन्होंने अंगद की तरह अपना पैर जमाया और स्पष्ट कर दिया कि चाहे पूरा शरीर टूट जाए, लेकिन राष्ट्र के सम्मान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए वे तानाशाही के सामने कभी झुक नहीं सकते। आज का यह दिन उनके इसी अदम्य साहस को बार-बार प्रणाम करने का दिन है।
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