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UBI Contest – 110

सृजन का संगम

 

​ईंट और पत्थरों के भीतर,

एक अनूठा ही संगम है।

ईंट रचती है दीवारों को,

पत्थर संकल्पों का दम है।

सदा बना रहता मेलजोल,

यह कितना सुंदर युग्म है!

 

​दृढ़ता और संगठन का ही, इसमें छिपा महत्त्व विशेष।

 

​ईंटों की गहरी परतों में,

पत्थरों का समर्पण पलता है।

एक-दूसरे को पूर्ण कर ही,

यह भव्य विश्व फिर चलता है।

जिसमें ईंटों का संघ-बल है,

वहाँ पत्थर का धीरज ढलता है।

 

पत्थरों की सख्ती ही तो, ईंटों का बनती है सहारा।

 

​पूरक बनकर इक-दूजे के,

बनते हैं सपनों के आसरे।

मिलकर रचते हैं एक इतिहास,

जीवन की अनुपम गाथा रे!

ईंट-पत्थरों का यह संगम,

सृजन-विज्ञान का विधाता रे!

 

ईंटों के ही उपवन में अब, पत्थरों के फूल खिलते हैं।

 

​— विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

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