सच नंगा फिरता है, कोई पास नहीं आता,
रेशम पहने झूठे से, हर कोई हाथ मिलाता।
चेहरे पर चेहरा लगा, सब बाज़ार निकले हैं,
झूठ के सुंदर रंग में, सबके ईमान पिघले हैं।
सच की फटी कमीज़ को, रफू कराते फिरते हैं,
झूठ का ओढ़ के चोगा, ऊँचा दिखते रहते हैं।
भीतर एक वीराना है और बाहर रौनक भारी है,
झूठ की ऊँची महफ़िल में, सच की लाचारी है।
तारीफ़ों के पुल बाँधे हैं, जिनमें कोई जान नहीं,
झूठ की इस बस्ती में, सच की पहचान नहीं।
रिश्तों की ये बुनावट, अब कच्ची होती जाती है,
झूठ की पॉलिश चढ़ते ही, हकीकत खो जाती है।
शीशे के महलों में, पत्थर छुपाए बैठे हैं,
झूठ का तिलक लगा, खंजर दबाए बैठे हैं।
दिखावे की धूप में, साये भी अब काले हैं,
झूठ का मीठा शहद लगा, जुबां पे पड़े छाले हैं।
ये लिबास भी एक दिन, पुराना होकर फटेगा,
झूठ का गहरा काला पर्दा, एक रोज़ तो हटेगा।
तब नग्न खड़ा होगा सच, और रूह भी थर्राएगी,
झूठ की ये मखमली चादर, साथ न दे पाएगी।
उतार दो ये भारी बोझ, जो सांसें दबाए बैठा है,
झूठ का ये जाली मुकुट, हस्ती मिटाए बैठा है।
सच की सादा चादर ही, रूह का असली गहना है,
झूठ के इस लिबास में, हमें उम्र भर नहीं रहना है।