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एशिया का ब्राजील: नंगे पैरों से आधुनिक बूट्स तक भारतीय फुटबॉल की शौर्यगाथा

 

“जब मैदान पर गूंजती है बूट की टंकार, तो बूट्स नहीं, हौसले मैच जिताते हैं। यह कहानी है भारतीय फुटबॉल के उस स्वर्णिम अतीत, अंधकारमय पतझड़ और फिर से अंगड़ाई लेते आधुनिक युग की।”

आज भले ही फीफा रैंकिंग की भूलभुलैया में हमारी टीम थोड़ी पीछे दिखती हो, लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो एक ऐसा दौर भी था जब मैदान पर नीली जर्सी उतरते ही विपक्षी टीमों के हौसले पस्त हो जाते थे। उस दौर में इस महाद्वीप के खेल पंडित भारत को बड़े अदब से ‘एशिया का ब्राजील’ कहा करते थे। आइए, भारतीय फुटबॉल के इस महाआख्यान को एक जीवंत कथा के रूप में जीते हैं।

 

बूट्स बनाम राष्ट्रवाद: ब्रिटिश काल और जोश का वो ऐतिहासिक ‘शील्ड’

यह कहानी शुरू होती है १९वीं सदी के मध्य में, जब सात समंदर पार से आए अंग्रेज अपने साथ चमड़े की एक गोल गेंद लेकर भारत की माटी पर उतरे। साल १८५४ में भारत की धरती पर पहला आधिकारिक फुटबॉल मैच रिकॉर्ड किया गया। इसके बाद साल १८८९ में कोलकाता के सीने पर एक ऐसे क्लब की स्थापना हुई, जो आगे चलकर सिर्फ खेल का मैदान नहीं, बल्कि क्रांति का अखाड़ा बनने वाला था—’मोहन बागान’ (Mohun Bagan)।

वह ऐतिहासिक मोड़: १९११ का आईएफए शील्ड

१९११ का वो साल भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। ‘आईएफए शील्ड’ (IFA Shield) के फाइनल में मोहन बागान का मुकाबला ब्रिटिश सेना की सबसे खतरनाक ‘पूर्वी यॉर्कशायर रेजिमेंट’ से था। गोरे सिपाही पैरों में भारी-भरकम स्पाइक्स वाले बूट्स पहने थे, और हमारे भारतीय शूरवीर बिल्कुल नंगे पैर!

मैदान पर गेंद नहीं, भारत का स्वाभिमान दौड़ रहा था। नंगे पैरों से जब चमड़े की उस गेंद पर प्रहार हुए, तो गोरों का घमंड टूट गया। मोहन बागान ने ब्रिटिश रेजिमेंट को २-१ से हराकर शील्ड पर कब्ज़ा कर लिया। उस दिन कोलकाता की सड़कों पर जो जश्न मना, उसने देश में स्वतंत्रता संग्राम की मशाल को और तेज कर दिया।

 

सैयद अब्दुल रहीम और भारतीय फुटबॉल का वो स्वर्णिम काल (१९४८ – १९७०)

आज़ादी के बाद भारतीय फुटबॉल को एक ऐसा मसीहा मिला जिसने टीम को पूरी दुनिया में खौफ का दूसरा नाम बना दिया—महान कोच सैयद अब्दुल रहीम (रहीम साहब)। उनके मार्गदर्शन में भारतीय टीम का एक ऐसा ‘स्वर्ण युग’ शुरू हुआ, जिसे आज भी याद कर आंखें फड़क उठती हैं।

लंदन ओलंपिक (१९४८) का कौतुक: आज़ाद भारत के रूप में टीम ने पहली बार वैश्विक मंच पर कदम रखा। फ्रांस जैसी दिग्गज टीम के खिलाफ जब भारतीय खिलाड़ी बिना जूते पहने (नंगे पैर) मैदान पर उतरे, तो पूरी दुनिया हैरान थी। हालांकि हम यह मैच १-२ से हार गए, लेकिन हमारे अद्भुत पासिंग गेम और ड्रिब्लिंग की कायल खुद ब्रिटेन की महारानी तक हो गई थीं।

१९५० फीफा वर्ल्ड कप का वो अधूरा सच: अक्सर यह मिथक फैलाया जाता है कि फीफा ने भारत को नंगे पैर खेलने से रोका था, इसलिए भारत ब्राजील विश्व कप में नहीं गया। लेकिन सच यह था कि All India Football Federation (AIFF) के पास उस समय अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए पर्याप्त फंड नहीं था, अभ्यास का समय कम था और तत्कालीन हुक्मरान ओलंपिक को विश्व कप से कहीं ज्यादा बड़ा दर्जा देते थे।

एशियाई खेलों में दोहरे स्वर्ण की चमक: रहीम साहब की रणनीति का ही जादू था कि भारत ने १९५१ (नई दिल्ली) और फिर १९६२ (जकार्ता) के एशियाई खेलों में पूरे एशिया को धूल चटाते हुए ‘गोल्ड मेडल’ अपने नाम किया।

मेलबर्न ओलंपिक (१९५६) की वो ऐतिहासिक हैट्रिक: भारत ओलंपिक फुटबॉल के सेमीफाइनल में पहुंचने वाला पहला एशियाई देश बना। इसी टूर्नामेंट में भारत के महान स्ट्राइकर नेविले डी’सूजा ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैदान पर वो तबाही मचाई कि उन्होंने शानदार ‘हैट्रिक’ ठोक दी। यह किसी भी एशियाई खिलाड़ी द्वारा ओलंपिक के इतिहास में लगाई गई पहली हैट्रिक थी।

मैदान की त्रिमूर्ति: उस दौर में एशिया के डिफेंडर्स के लिए तीन नाम किसी दुःस्वप्न की तरह थे—पी.के. बनर्जी, चुनी गोस्वामी और तुलसीदास बलराम। इस त्रिमूर्ति की जुगलबंदी को फुटबॉल पंडित एशिया की सबसे खतरनाक मारक क्षमता मानते थे।

 

पतन का वो अंधकारमय पतझड़ (१९७० – २०००)

“ज़िन्दगी कैसी है पहेली, हाय! कभी तो हँसाए, कभी ये रुलाये…”

खेल का नियम है कि वसंत के बाद पतझड़ भी आता है। साल १९६३ में कैंसर के कारण महान कोच सैयद अब्दुल रहीम का असमय निधन हो गया और इसी के साथ भारतीय फुटबॉल की रीढ़ टूट गई। रणनीतियों का अभाव और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की घोर कमी साफ दिखने लगी।

८० और ९० के दशक में जहाँ दुनिया के अन्य देशों ने आधुनिक ट्रेनिंग और टर्फ ग्रास को अपना लिया, वहीं भारत पुराने तौर-तरीकों में ही अटका रहा। इसी दौरान देश में क्रिकेट की दीवानगी इस कदर बढ़ी कि फुटबॉल धीरे-धीरे मुख्यधारा के मीडिया और प्रायोजकों (Sponsors) की नज़रों से ओझल होकर हाशिए पर चला गया। नतीजा यह हुआ कि १९७० के बाद भारत फिर कभी ओलंपिक की दहलीज तक नहीं पहुंच सका।

 

पुनरुत्थान की नई भोर: बाईचुंग, सुनील और ‘आईएसएल’ का रोमांच

जब-जब अंधकार घना होता है, उम्मीद की कोई किरण ज़रूर फूटती है। २१वीं सदी की शुरुआत के साथ भारतीय फुटबॉल को एक बार फिर संजीवनी मिली।

‘सिक्किमीज़ स्निपर’ और ‘कैप्टन फैंटास्टिक’ का युग: पहले बाईचुंग भूटिया ने अपनी चीते जैसी फुर्ती से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख को दोबारा जगाया। उनके बाद कप्तानी का जिम्मा संभाला आधुनिक युग के महानायक सुनील छेत्री ने। सुनील छेत्री ने मैदान पर वो कीर्तिमान स्थापित किए कि उनका नाम दुनिया के महानतम खिलाड़ियों—क्रिस्टियानो रोनाल्डो और लियोनेल मेसी के साथ सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय गोल करने वाले सक्रिय खिलाड़ियों की सूची में जुड़ गया।

इंडियन सुपर लीग (ISL – २०१४) का धमाका: साल २०१४ में ‘इंडियन सुपर लीग’ की शुरुआत ने भारतीय फुटबॉल का पूरा परिदृश्य ही बदल कर रख दिया। कॉर्पोरेट घरानों के आने से खेल में पैसा आया, विदेशी कप्तानों और कोचों का अनुभव मिला, और सबसे बढ़कर—अत्याधुनिक तकनीक (Modern Training Techniques) आई। आज इसकी बदौलत जमीनी स्तर (Grassroots) से ऐसे युवा सितारे निकल रहे हैं, जिनकी आँखों में दुनिया जीतने का सपना है।

 

निष्कर्ष: अंगड़ाई लेता हुआ भारत

फुटबॉल का मैदान महज़ ९० मिनट का खेल नहीं, बल्कि एक साधना है। आज सुनील छेत्री के संन्यास के बाद भारतीय फुटबॉल एक नए संक्रमण काल से गुज़र रहा है, लेकिन देश के युवाओं के पैरों में अब वो हुनर है जो किसी भी मजबूत दीवार को भेद सकता है। ‘एशिया का ब्राजील’ अब सोकर उठ चुका है, और वो दिन दूर नहीं जब फीफा विश्व कप के मंच पर भी हमारा तिरंगा शान से लहराएगा।

धन्यवाद!

 

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