images (23)

सिनेमा का संत-सभ्य कलाकार: भारत भूषण की महागाथा, फिल्में और नियति का खेल

 

“जिसने पर्दे पर संगीत और कविता को सजीव कर दिया, जिसके बंगले के बाहर कभी निर्माताओं की लाइन लगती थी, उसी अभिनेता ने जीवन के आखिरी दिनों में बस की कड़वी लाइनों में खड़े होकर वक़्त को गुज़रते देखा। अभिनय के अनमोल साधक भारत भूषण की संपूर्ण और मर्मस्पर्शी जीवन-यात्रा।”

हिंदी सिनेमा के इतिहास में जब भी किसी ऐसे अभिनेता की बात होगी जिसके चेहरे पर संतों जैसी निश्छल आभा, आँखों में गहरी संवेदनशीलता और स्वभाव में कूट-कूट कर भरी शराफत थी, तो ज़ुबान पर एक ही नाम उभरेगा—भारत भूषण। १४ जून १९२० को उत्तर प्रदेश के मेरठ की पावन धरती पर जन्मे भारत भूषण का बचपन से ही कला, संगीत और साहित्य के प्रति एक गहरा खिंचाव था। उनके पिता राव बहादुर मोतीलाल जी मेरठ के एक नामचीन वकील थे। माँ के असमय देहावसान के बाद उनका पालन-पोषण अलीगढ़ में हुआ। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वकालत के माहौल में पल रहा यह शांत बालक एक दिन भारतीय सिनेमा के आकाश पर अपनी सादगी का परचम लहराएगा।

 

माया नगरी में पहला कदम और संघर्ष के दिन

पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत भूषण के भीतर का कलाकार उन्हें तत्कालीन फिल्म निर्माण के सबसे बड़े केंद्र ‘कलकत्ता’ (कोलकाता) खींच लाया। यहीं से उनके संघर्ष की शुरुआत हुई। सन १९४१ में महान निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और अपनी फिल्म ‘चित्रलेखा’ में उन्हें एक छोटा सा किरदार दिया। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में काम किया, जैसे ‘भक्त कबीर’ और ‘श्रवण कुमार’, जहाँ उनके भीतर के आध्यात्मिक और संभ्रांत कलाकार की पहचान बनने लगी। लेकिन यह तो केवल एक बड़ी लहर से पहले की शांति थी, असली तूफ़ान और शोहरत का सूरज अभी उगना बाकी था।

 

‘बैजू बावरा’ और सफलता का वो ऐतिहासिक शिखर

सन १९५२ में निर्देशक विजय भट्ट एक ऐसी फिल्म बना रहे थे जो भारतीय शास्त्रीय संगीत पर आधारित थी—’बैजू बावरा’। इस फिल्म के लिए उन्हें एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो संगीत की साधना, विरह और तड़प को बिना किसी लाउड एक्टिंग के, सिर्फ अपनी आँखों से बयां कर सके। भारत भूषण इस किरदार में इस कदर रच-बस गए कि फिल्म ने इतिहास रच दिया।

महान संगीतकार नौशाद साहब के अमर संगीत और मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ में जब भारत भूषण पर्दे पर गाते थे—”ओ दुनिया के रखवाले…” या “मन तड़पत हरी दरसन को आज…”—तो थियेटर में बैठे दर्शकों की आँखें भी भीग जाती थीं। इस फिल्म ने उन्हें रातों-रात सुपरस्टार बना दिया। इसके बाद उन्होंने सोहराब मोदी की ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ (१९५४) में साक्षात ग़ालिब के दर्द और उनकी शायरी को पर्दे पर अमर कर दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी इस फिल्म को देखकर भारत भूषण के अभिनय की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।

 

जब ‘दिलीप-राज-देव’ की त्रिमूर्ति के बीच चमका यह सितारा

पचास के दशक में जहाँ दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद की त्रिमूर्ति का बोलबाला था, वहाँ भारत भूषण ने अपनी एक बिल्कुल अलग और विशिष्ट पहचान बनाई थी। वे ‘ऐतिहासिक और पौराणिक किरदारों के शहंशाह’ कहे जाने लगे। ‘बसंत बहार’, ‘कालिदास’, ‘कवि कालिदास’, ‘संगीत सम्राट तानसेन’ और ‘शबाब’ जैसी फिल्मों के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि संजीदा और साहित्यिक किरदारों को निभाने में उनका कोई सानी नहीं है। उस दौर में वे फिल्म इंडस्ट्री के सबसे महंगे अभिनेताओं में से एक थे। उनके पास मुंबई में आलीशान बंगले, महंगी गाड़ियां और धन-दौलत का अंबार था।

 

भाई की महत्वाकांक्षा और किस्मत का क्रूर मोड़

भारत भूषण जी जितने सीधे और सादगी पसंद थे, उनके भाई रमेश चंद्र उतने ही महत्वाकांक्षी थे। भाई के कहने पर भारत भूषण ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा और ‘बिजनेस’ में अपना हाथ आजमाया। उन्होंने कई फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें से कुछ फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल रहीं। इसी दौरान उनके भाई ने लॉटरी और सट्टे के कारोबार में भारी निवेश कर दिया, जिससे उन्हें भारी कर्ज का सामना करना पड़ा।

नियति का क्रूर प्रहार यहीं नहीं रुका। उनकी प्रिय पत्नी सरला का प्रसव के दौरान असमय निधन हो गया, जिसने भारत भूषण जी को भीतर से पूरी तरह तोड़ दिया। एक तरफ भाई की व्यापारिक गलतियों के कारण सिर पर चढ़ता कर्ज और दूसरी तरफ जीवनसंगिनी का साथ छूट जाना—इस दोहरे झटके ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।

 

जब बिक गए महलों के ख्वाब और लाखों किताबें

आर्थिक तंगहाली का यह दौर इतना भयावह था कि जिस अभिनेता के बंगले के बाहर कभी मशहूर निर्देशकों की कतारें लगी रहती थीं, उन्हें अपना सब कुछ बेचना पड़ा। उनके आलीशान बंगले बिक गए, महंगी कारें चली गईं। यहाँ तक कि उनके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी—उनका वह समृद्ध पुस्तकालय, जिसमें एक लाख से अधिक नायाब किताबें थीं—उसे भी औने-पौने दामों में रद्दी के भाव या कबाड़ियों को बेचना पड़ा। एक पुस्तक प्रेमी के लिए अपनी आँखों के सामने अपनी पसंदीदा किताबों को बिकते देखना किसी जीते-जी मौत से कम नहीं था, लेकिन उन्होंने इस दर्द को भी मौन रहकर पी लिया।

 

अंतिम दिनों का एकांत और गरिमामय स्वीकार

जीवन के अंतिम दो दशकों में भारत भूषण जी ने मुफ़लिसी का वह दौर भी देखा जब वे मुंबई की लोकल ट्रेनों और बसों में सफर करते थे। कई बार जूनियर कलाकार और आम लोग उन्हें पहचान कर हैरान रह जाते थे कि क्या यह वही ‘बैजू बावरा’ है? बाद के दिनों में उन्होंने अपना घर चलाने के लिए फिल्मों में बेहद छोटी-मोटी और साइड भूमिकाएं (यहाँ तक कि जूनियर आर्टिस्ट के स्तर के काम भी) करना स्वीकार किया, लेकिन कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया।

उन्होंने अभिनेत्री रत्ना भूषण से दूसरा विवाह किया, जिन्होंने उनके अंतिम समय तक उनका पूरा साथ निभाया। जीवन के इस सबसे कड़े संघर्ष और अंधकार भरे दौर में भी उनके चेहरे की वो संतों जैसी मुस्कान और आंखों की शराफत कभी गायब नहीं हुई। वे अक्सर कबीर और ग़ालिब के दर्शन को अपने जीवन में उतारते हुए शांत रहते थे।

 

उपसंहार: ‘पैकअप’ और अमर विरासत

अंततः २७ जनवरी १९९२ को ७१ वर्ष की आयु में मलाड (मुंबई) के एक बेहद साधारण से किराए के मकान में सिनेमा के इस महान साधक ने अपनी अंतिम सांस ली। अपनी मृत्यु से १५ दिन पहले उनका यह कहना कि—“मेरा पैकअप हो गया है”—वास्तव में उनके जीवन के उस संतोष को दिखाता है कि उन्होंने इस संसार के रंगमंच पर अपना हिस्सा पूरी ईमानदारी से जी लिया था।

लेखक विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’ हिंदी सिनेमा के इस अनूठे मनीषी, सादगी के शिखर पुरुष और शब्दों व सुरों के अमर साधक भारत भूषण जी के पावन चरणों में अपनी लेखनी के माध्यम से कोटि-कोटि नमन और भावांजली अर्पित करता है।

धन्यवाद ! !

 

 

राजा हरिश्चन्द्र (१९१३): भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म का गौरवशाली इतिहास

 

 

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *