आज की कविता है,
बेटियां तितली नहीं हैं!
इस कविता के रचनाकार हैं,
वाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
बेटियां तितली नहीं हैं,
जो हांथ तेरे आएंगी।
वो मधुमक्खी हैं,
उनके पास पंख भी है,
और डंक भी।
हाथ लगाते ही
फुर्र से उड़ कर
तेरा चेहरा सुजाएंगी।
उन्हें पूजा तो
वे जीवन रक्षक हैं,
जीवनदायनी हैं।
कुदृष्टि डाली तो
काली कपाल धारिणी,
शिवा, दुर्गा, चांडालीनी हैं।
शांत सुशील सी धरा हैं वो,
पेट भरती शाकंभरी भी,
वो लक्ष्मी भी है,
वो सरस्वती भी,
शेरावाली दुर्गेश्वरी भी।
वो नमनीय है,
वंदनीय है।
वो पूजनीय भी है।
अगर वो पालना जानती है, तो
सर कुचलना भी जानती है।