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बेटियाँ तितली नहीं हैं

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

​बेटियाँ तितली नहीं हैं,

जो हाथ तेरे आएँगी;

वो मधुमक्खी हैं—

उनके पास पंख भी हैं,

और डंक भी!

 

​हाथ लगाते ही,

फुर्र से उड़कर—

तेरा चेहरा सुजाएँगी।

 

​उन्हें पूजा… तो

वे जीवन-रक्षक हैं,

जीवनदायिनी हैं;

कुदृष्टि डाली… तो

काली, कपालधारिणी,

शिवा, दुर्गा, चांडालिनी हैं!

 

​शांत-सुशील सी धरा हैं वो,

पेट भरती शाकंभरी भी;

वो लक्ष्मी भी हैं,

वो सरस्वती भी,

शेरावाली दुर्गेश्वरी भी।

 

​वो नमनीय हैं,

वंदनीय हैं,

वो पूजनीय भी हैं;

 

​अगर वो पालना जानती हैं, तो—

सर कुचलना भी जानती हैं!

 

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