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UBI Contest १०१

विषय : बर्फीली नदी

जमी नदी पुनः बहने लगी

लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​आज वो नदी बेहद उदास है,

जो कभी चंचल मुस्कान लिए—

कल-कल, निश्चल सी बहती थी।

 

​वो कभी पीतल मद्धम सी, तो

कभी सोना सी चमकती थी;

शायद… डर से जमी आज बर्फ थी!

 

​ऐसा भी लगता है कि आज वो,

अपने में सिमटे, सकुचाए—

सफेद चादर ओढ़े जैसे सोई है।

 

​उसके ऊपर ओस का आसमान,

अपनी आगोश में लेने को उत्सुक;

बांह पसारे वस्त्र बन यूँ ही पड़ा था।

 

​डरी हुई, सहमी सी छुई-मुई को,

अस्ताचल की ओर बढ़ते सूर्य ने—

जब देखा, तो वह वहीं ठहर गया!

 

​मन का भाव छिपाए वो,

अपनी जलन से जलता… उसे पुनः—

बहाने की हर कोशिश करने लगा।

 

​पहली लड़ाई ओस से थी,

दूसरी कड़ाके ठंड के जोश से थी;

यह देख… बर्फ को भी पसीना आया!

 

​उसे पिघलना तो था ही, सो—

वह पिघला तो हलचल सी मची;

नदी कल-कल कर पुनः बहने लगी।

 

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