दिनांक : ०२/११/१९
तलाश
उधेड़बुन में पड़ा,
राह की तलाश में।
पहाड़ की चोटी से,
सागर की गहराई में।
पथरीली राहों पर,
आँखें मींचे, साँसें खींचे।
घर छूटा, बस्ती छूटी,
आ मिले अनजानी राहों में।
हर वक्त नजरें चुराऊँ,
तो कभी खुद को छुपाऊँ।
चला आ रहा मेरे पीछे,
साया कहता खुद को।
अब अंधेरा कर रखा है,
मैंने ही इन फिजाओं में।
उधेड़बुन में पड़ा,
राह की तलाश में।
कल के झूठ से,
आज की सच्चाई में।
आँखों के झरोखे से देखता,
दोष सहित या दोष रहित है।
मृत्यु के आलिंगन से,
जीवन की बेवफाई में।
उधेड़बुन में पड़ा,
लक्ष्य की तलाश में।
नजर के धोखे से,
मानव-माया की परछाईं में।
— अश्विनी राय ‘अरुण’