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खामोश शोर

​वह टकटकी लगाए देखता रहा—

कभी उस चमकती वीआईपी गाड़ी को,

तो कभी अपनी ही बेबस काया को।

​वह कुछ सोच पाता या कुछ कह पाता,

इससे पहले ही—

किसी रसूखदार हाथ ने उसे धक्के देकर हटा दिया,

महज़ खुद को उस जगह पर सजाने के लिए।

​फिर सफेदपोशों का वह काफिला आगे बढ़ा,

एक सफेद कुर्ते ने दूसरे सफेद कुर्ते को किनारे किया,

इस बार खुद को वहाँ टिकाने के लिए।

​मगर अफ़सोस!

वह काफिला रुका नहीं, धूल उड़ाता निकल गया।

भीड़ छंट गई, तमाशा खत्म हुआ।

​तब पहले शख्स ने उन्हें अपलक देखा,

जो शून्य में ताके जा रहे थे।

अजीब लोग थे—

नज़ारे देखने आए थे, और नज़रों को चुराए जा रहे थे।

​वहाँ एक लंबी खामोशी पसरी थी,

मगर उनके अंतर्मन का वह ‘अनकहा शोर’,

अंदर ही अंदर उन्हें… खाए जा रहा था।

 

 

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