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घर: कर्मों की बुनियाद

 

​इक आलीशान घर की ख़ातिर मैंने,

न जाने कितनों के घर उजाड़ दिए।

थोड़ी बेईमानी की, थोड़ी हेरा-फेरी,

और हक़ की खातिर… पन्ने फाड़ दिए।

 

​कुछ पैसे इधर से छल कर कमाए,

कुछ पैसे उधर बेफ़िक्र उड़ाए।

महज़ एक टुकड़े ज़मीन की ख़ातिर,

सोचा नहीं, पैसे चाहे जिधर से आए।

 

​कई घरों के रोशन दीये बुझाए मैंने,

अपने नए घर को चकाचौंध करने को।

तक़दीर अगर थोड़ा और साथ देती—

तो और बेइमानियां करता, घर भरने को।

 

​मगर एक दिन अचानक ऐसा भी आया,

निकल आए मेरे ही कर्म… साँप बनकर।

पुराने घर को तो मैंने ख़ुद गिराया था—

पर नया भी ढह गया आज, पाप बनकर।

 

​समय बदला था, तो सिंहासन बदल गए,

पुरानी बेईमानियों की परिभाषा बदल गई।

शायद अब किसी और को घर बदलना था—

सो, मेरे नए घर की भी… दुनिया बदल गई।

 

 

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