तुम्हारी आँखें
लबों पर हर बार खामोशी झूलती है,
मगर हर बात कहती हैं तुम्हारी आँखें।
ये आसमां से भी गहरी तुम्हारी आँखें,
शून्य को झाँकती, कभी बरसती आँखें।
बरसे न गर कभी अंबर से बादल,
बेवजह ही बरस जाती तुम्हारी आँखें।
छिपाए हैं कितने ही राज़ गहरे इनमें,
कभी ख़ुद ही सब कह देती तुम्हारी आँखें।
ढूंढा करते हैं हम इनमें अक्सर ख़ुद को,
मगर अफ़सोस! कभी पढ़ न पाए हम तुम्हारी आँखें।
इनसे गुज़रते हैं सीधे दिलों के रास्ते,
काश! दे पातीं हमें पनाह ये तुम्हारी आँखें।
कभी लगे कोई मधुर गीत गाती सी ये,
तो कभी पावन गीता का सार तुम्हारी आँखें।
कुर्बान हुए हम बार-बार इन पर, लेकिन—
हैरत है, हमें अपना न समझ सकीं तुम्हारी आँखें।