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रास्ते और राही

 

​जहाँ से मैं आ रहा हूँ,

वहाँ वापस जाना नहीं चाहता!

और जहाँ मैं जा रहा हूँ,

वहाँ जाना भी तो नहीं चाहता!

 

​मैं कोई राही तो नहीं हूँ,

मगर ये अनजान रास्ते—

अब मुझे अच्छे लगने लगे हैं।

 

​क्योंकि ये कभी रुकते नहीं,

हमेशा चलते ही रहते हैं,

बस, चलते ही रहते हैं!

 

​हमारा तो कोई ठिकाना भी है,

और हमारी अपनी मंजिल भी है;

मगर इन रास्तों का क्या?

 

​ये कहाँ से चले हैं,

और कहाँ तक जाएँगे?

कुछ मालूम नहीं।

 

​मगर फिर भी अच्छे लगते हैं!

हाँ! एक बात तो सच है इनमें—

​ये किसी के रोके नहीं रुकते,

तो भला हमारे रोके कैसे रुकते?

 

​ये वो सच्चे हमसफ़र हैं,

जो कभी किसी का साथ नहीं छोड़ते,

चाहे हम इनका साथ दें या न दें।

 

​मेरी मंजिल तो कब की—

आकर पीछे निकल गई है,

मगर ये रास्ते अब भी चल रहे हैं।

 

​और सच कहूँ तो, मैं भी यही चाहता हूँ कि—

यह जीवन का रास्ता कभी खत्म न हो।

 

​— विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

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