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उम्र से मुलाकात

​मैंने कहा—जाती हुई उम्र से,

‘जरा ठहरो तो सही!’

उसने कहा—‘मैं उम्र हूँ,

कभी ठहरती नहीं!

 

अगर मिलना ही चाहते हो,

तो मेरे साथ-साथ चलो;

कुछ बातें करनी हों अगर,

तो मेरे साथ-साथ चलो।’

 

​मैंने कहा—‘कैसे चलूँ भला?

अभी तो मेरे हाथों में,

उछलते बचपने का हाथ है।’

 

​वह सुनकर चुपचाप आगे,

बहुत आगे निकल गई…

 

और मैं आज भी,

उसे जाते हुए देखता हुआ,

उसी मोड़ पर मौन खड़ा हूँ।

 

विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

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