July 20, 2024

बक्सर (सिद्धाश्रम) : श्रीराम की शिक्षा स्थली

बिहार राज्य में एक शहर है या यूं कहें कि एक जिला है, ‘बक्सर’, जिसने अपने इतिहास को कई युगों में समेटा है। बक्सर को ज्ञान विज्ञान का तपोवन कहा गया है। महर्षि विश्वामित्र के तप-बल का ही प्रभाव था कि मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम व अनुज लक्ष्मण ने, उनसे वीरोचित शिक्षा प्राप्त कर राक्षसी वृत्तियों का संहार किया था। विद्वानों व पंडितों ने बक्सर को महर्षि विश्वामित्र की तपोस्थली के रूप में बताया है। सतयुग में बक्सर का नाम सिद्धाश्रम था, त्रेतायुग में बामनाश्रम, द्वापरयुग में वेदगर्भा और कलियुग में व्याघ्रसर था, जो अंग्रेजी काल में बदलकर बक्सर हो गया।

परिचय…

बक्सर अपने ज्ञान, अध्यात्म और कर्मभूमि के लिए अपनी खास पहचान रखता है। कार्तिक पूर्णिमा को यहां बड़ा मेला लगता है, जिसमें लाखों लोग इकट्ठा हो गंगा में डुबकी लगा पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।

किसी समय में बक्सर का यह क्षेत्र पूरी तरह से जंगल से ढका हुआ था। जंगल के बीचोबीच एक सर (तालाब ) था, जहां बाघ पानी पीने आया करते थे। बाघ को संस्कृत में व्याघ्र कहते हैं। इसलिए इस जगह को व्याघ्रसर कहा जाने लगा। यही व्याघ्रसर कालांतर में अपभ्रंशित हो बघसर या बगसर हो गया। आम बोलचाल की भाषा में आज भी पुराने लोग इसे बगसर कहते हैं।

राजा गाधि के पुत्र थे ‘महर्षि विश्वामित्र’ जिनका जन्म कार्तिक शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को हुआ था। क्षत्रिय कुल में उत्पन्न होने के बावजूद उन्होंने राज्य-काज, संपदा व ऐश्वर्य के आगे तप-बल को महत्व दिया। उन्होंने बक्सर को अपना आश्रम बनाया और यहीं वे जप-तप, यज्ञ, योग आदि किया करते थे इसलिए बक्सर को विश्वामित्र नगरी के नाम से भी जाना जाता है।

साक्ष्य…

बक्सर के ऐतिहासिक होने का साक्ष्य वराहपुराण, ब्रह्मव्यवर्त पुराण, स्कन्द पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, नारद पुराण, गरुण पुराण, भविष्य पुराण, श्रीमदभागवत पुराण, बाल्मीकि पुराण, महाभारत आदि ग्रंथों में मिलता है। पुराणों में लिखा है कि

‘सिद्धाश्रमसमं तीर्थं न भूतं न भविष्यति।’

मतलब पूरी पृथ्वी पर सिद्धाश्रम के समान न तीर्थ हुआ है और न होगा। जहां ऋषि तो ऋषि ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव महादेव ने स्वयं को सिद्ध किया है।

यही कारण है कि इस महान तपोस्थली को कालांतर में सिद्धाश्रम के रूप में जाना जाने लगा। कहा जाता है कि किसी समय में यहां ८८ हजार से अधिक ऋषियों-मुनियों ने तप किया था। उनके तप का ही प्रभाव था कि यह भूमि ही सिद्ध हो गई।

महत्व…

बक्सर ही वह पुण्य भूमि है, जहां विश्व के प्रथम तत्वदर्शी, वैज्ञानिक, मंत्रद्रष्टा व सृष्टि के संस्थापक महर्षि विश्वामित्र ने अपना आश्रम बनाया था। महर्षि विश्वामित्र भारत की प्रचलित व्यवस्था के विरुद्ध क्रांतिकारी कदम उठाने वाले प्रथम व्यक्ति तो थे ही, उनके द्वारा स्थापित सिद्धाश्रम विश्व का पहला शैक्षणिक संस्थान भी था। उन्हीं के तपबल के प्रभाव से प्रभु श्रीराम-लक्ष्मण को शस्त्रनीति, धर्मनीति, कर्मनीति व राजनीति शास्त्र का विशेष ज्ञान प्राप्त हुआ। जहां दोनों भाइयों ने मिलकर प्रसिद्ध ताड़का राक्षसी, सुबाहु आदि राक्षसों का संहार करते हुए मानवीय आदशों के कीर्तिमान के रूप में रामराज्य की स्थापना की थी। इस स्थान को गंगा, सरयू संगम के निकट बताया गया है…

‘तो प्रयान्तौ महावीयो दिव्यां विपथगां नदीम्, दद्दशास्ते ततस्तत्र सरय्वाः संगमे शुभे, तत्रा श्रमं पुण्यमृषीणां भावितात्मनाम्।’

यहाँ संगम के निकट गंगा को पार करने के पश्चात् राम तथा लक्ष्मण ने भयानक वन देखा था, जहाँ राक्षसी ताड़का का निवास था। वह वन मलद और कारुष जनपदों के निकट था।

पंचकोशी यात्रा और श्रीराम…

बचपन से ही हम पंचकोस यात्रा के बारे में सुनते आ रहे थे, जो कि सही मायने में पंचकोस यात्रा ना होकर पंचकोश की यात्रा थी। यह यात्रा बक्सर के अहिरौली ग्राम से आरंभ होती है, जो न्याय दर्शन के विचारक और वैदिक ऋषि के आश्रम से आरंभ होती है और तीन स्थलो का भ्रमण कर पुनः बक्सर के चरित्रवन मे लिट्टी चोखा खाकर समाप्त होती है। वैसे तो पंचकोशी यात्रा काशी और अयोध्या दोनों ही जगहों पर होती है परंतु पंचकोशी यात्रा का मूल स्थल बक्सर या सिद्धाश्रम ही है। ताड़का बध उपरांत महर्षि विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को यह यात्रा कराई थी, जो कि सही मायने में राजकुमार राम को श्रीराम बनने की यात्रा थी, उनकी यह यात्रा उनके ज्ञान प्राप्ति की यात्रा थी। अब यहां सोचने वाली दो बातें हैं, पहला यह कि वह कौन सा ज्ञान है जो राम को बक्सर में मिला? तथा दूसरा यह कि वह कौन सा ज्ञान है जिसकी परंपरा बक्सर मे राम के आने से पूर्व से थी।

पंचकोशी यात्रा, यात्रा ना होकर एक परिक्रमा है, जो ज्ञान साधने का माध्यम है। उन दिनों महर्षि गौतम का आश्रम न्याय शास्त्र का केंद्र था, जो आज के अहिरौली में स्थित था। देवर्षि नारद का आश्रम भक्ति ज्ञान का केंद्र था, जी नदांव में स्थित था। महर्षि भृगु का आश्रम धर्म का केंद्र था, जो आज के भभूवर में स्थित था। महर्षि उद्धलक का आश्रम कृषि विज्ञान का केंद्र था, जो आज के छोटका नुआंव में स्थित था। तत्पश्चात अंत में महर्षि विश्वामित्र का आश्रम शस्त्र विद्या का केंद्र था, जो कि बक्सर स्थित चरित्रवन में स्थित था। यहां जानने योग्य यह बात भी है कि इस यात्रा अंतर्गत हर एक पड़ाव पर भोजन करने की अपनी अलग विधा और परंपरा सदियों से रही है, जो महर्षि विश्वामित्र के साथ श्रीराम और लक्ष्मण ने की थी। पहले पड़ाव अहिरौली में ‘पूवा’ खाने का विधान है। दूसरे पड़ाव नदांव में ‘खिचड़ी’ खाने की परंपरा है, तीसरे पड़ाव भभूवर में ‘दही चूड़ा’ का भोग लगता है, चौथे पड़ाव छोटका नुआंव में ‘सत्तू और मूली’ का भोग तथा अंत में पांचवे पड़ाव बक्सर में ‘लिट्टी चोखा’ के भोग के साथ पंचकोश यात्रा की समाप्ति होती है। यह यात्रा राजकुमार राम के भविष्य में आने वाली कठिनाइयों के समय की तैयारी थी, जो उन्हें हर तरह से तैयार करती है।

श्रीराम की तैयारी…

सिद्धाश्रम की पंचकोश यात्रा गायत्री मंत्र का विस्तार है। गायत्री मंत्र का द्रष्टान्त प्रथम बार महर्षि विश्वामित्र को यहीं हुआ था और सतयुग में महर्षि भृगु ने शुरू की थी पंचकोश परिक्रमा यात्रा।

१. पांच ऋषियों के आश्रमों की यात्रा करने के पक्षात ही श्रीराम मानव के अंतःकरण के पांच तत्वों को जान पाए। वे पांच आत्मतत्व हैं, अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश। इस यात्रा के बाद श्रीराम कामना रहित हो गए।

२. इसके साथ ही यह यात्रा जीवन के पांच सामाजिक ज्ञान को दर्शाता है। पहला न्याय और दण्ड शास्त्र, दूसरा भक्ति और ज्ञान, तीसरा धर्म (सामाजिक, पारिवारिक और राजनैतिक), चौथा कृषि विज्ञान और पांचवा शस्त्र विद्या। इसी ज्ञान को देने के लिए महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम एवम लक्ष्मण को अपने साथ अयोध्या से बक्सर लाए थे।

३. पांच आश्रमों की यात्रा के दौरान श्रीराम ने पांच अलग अलग प्रकार व गुणों से परिपूर्ण अत्यंत स्वादिष्ट और आसानी से प्राप्त होने वाले भोजन का स्वाद लिया। ये भोजन राज रसोई के भोजन से अलग और आसानी से बनने और उपलब्ध होने वाले थे।

महर्षि विश्वामित्र हजारों वर्षों से स्वयं ही आश्रम की सुरक्षा करते आ रहे थे, परंतु त्रेतायुग में महर्षि विश्वामित्र आश्रम की सुरक्षा के बहाने श्रीराम और लक्ष्मण को यहां लाए। उन्हें यहां लाना और पंचकोश परिक्रमा कराना, कोई अकस्मात कारण नहीं था। यह भविष्य में होने वाली घटनाओं के लिए श्रीराम को अंदर और बाहर दोनों तरफ से तैयार करना था। यह पंचकोश परिक्रमा पांच कोस में स्थित पांच ऋषियों के आश्रम यानी महर्षि गौतम, देवर्षि नारद, महर्षि भृगु, महर्षि उद्दालक और महर्षि विश्वमित्र के आश्रमों की यात्रा है।

विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

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