April 25, 2024

आश्विन (क्वार) शुक्ल की पूर्णमासी को शरद पूर्णिमा, टेसू पुने, रास पूर्णिमा, बंगाल लक्ष्मी पूजा, कौमुदी व्रत, कोजागरी लक्ष्मी पूजा आदि अलग अलग नामों से जाना जाता है। ज्योतिषाचार्यो के अनुसार, वर्ष में सिर्फ एक बार आज ही के दिन चंद्रदेव सोलह कलाओं से परिपूर्ण होते हैं। आज के दिन कई जगहों पर कोजागर एवम कई अन्य जगहों पर कौमुदी व्रत रखा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने आज ही के दिन महारास रचाया था।

वैज्ञानिक कारण…

आज की रात के बाद से मौसम बदलने लगता है और सर्दियां शुरू हो जाती हैं तथा मंदिरों में पूजा – अर्चना का समय परिवर्तित हो जाता है।

मान्यता…

वैसे तो मानवीय जीवन में चंद्र का महत्व बहुत है, मगर शरद पूर्णिमा को चंद्रदेव का बहुत महत्व कुछ खास ही है। आज की रात्रि यानी शरद पूर्णिमा को चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है, इसलिए उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चांदनी में रखने का विधान है। विद्वानों का कहना है कि चंद्रमा की किरणों में उपचार करने की शक्ति विद्यमान होती हैं, जिसे अमृत वर्षा की तरह देखा जाता है। परंपरागत रूप से शरद पूर्णिमा के दिन गाय के दूध की खीर या अन्य मीठे व्यंजन सारी रात चंद्रमा की खुली चांदनी के नीचे लटका कर रखते हैं, जिससे कि उन व्यंजनों में भी अमरत्व की शक्ति प्रवेश कर जाती है। माना जाता है कि जो व्यक्ति पूर्णिमासी उपवास का संकल्प लेते हैं, वे शरद पूर्णिमा के दिन से ही उपवास प्रारंभ करते हैं।

कथा…

किसी समय की बात एक साहूकार के दो पुत्रियाँ थीं। वे दोनों पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। परन्तु बड़ी पुत्री बड़ी श्रद्धा से व्रत के हर छोटे बड़े नियम का पालन करती थी, मगर छोटी पुत्री व्रत को अधूरे मन से ही करती थी, वह जब जो इच्छा व्रत के नियम को अपने अनुसार ढाल लेती थी।परिणामस्वरूप जब भी छोटी पुत्री की कोई सन्तान उत्पन्न होती तो तत्काल मर जाती। उस दुखिया ने जब विद्वान पण्डितों से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया की तुम पूर्णिमा का व्रत अधूरे मन से करती हो, जिसके फलस्वरुप तुम्हारी सन्तान का जन्म होते ही मरण हो जाता है। पूर्णिमा का विधिपूर्वक व्रत करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है।

उसने पण्डितों के परामर्श पर पूर्णिमा का व्रत विधिपूर्वक किया। उसके बाद उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, परन्तु इसबार भी वही हुआ। पुत्र शीघ्र ही मर गया। उसने अपने पुत्र को एक पीढ़े पर लिटाकर ऊपर से एक कपड़े से ढक दिया और फिर बड़ी बहन को बुलाकर ले आई। और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बड़ी बहन जब पीढे पर बैठने ही वाली थी तो उसके कपड़े से वह बच्चा छू गया, जिससे वह बच्चा रोने लगा। इसपर बड़ी बहन गुस्से से बोली, “तू मुझे कलंक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।” तब छोटी बहन बोली, “ यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे पुण्य प्रताप से यह पुनः जीवित हो गया है।” फिर नगर में उसने पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।

खीर रखने का रहस्य…

१. आज की रात आसमान से अमृतमयी किरणों का आगमन होता है। इन किरणों रोगों को नष्ट करने की क्षमता होती है। ऐसे में जहां इन किरणों से बाहरी शरीर को लाभ मिलता है वहीं अंतःकरण के लाभ के लिए खीर को चंद्रमा की रोशनी में रखकर दूसरे दिन सुबह उसका भोग लगाया जाता है। इसी वजह से शरद पूर्णिमा की रात्रि को लोग अपने घरों की छतों पर खीर रखते हैं।

२. जानकारों के अनुसार, इस दौरान चंद्र से जुड़ी हर वस्तु जाग्रत हो जाती है। दूध भी चंद्र से जुड़ा होने ने कारण अमृत समान बन जाता है जिसकी खीर बनाकर उसे चंद्रप्रकाश में रखा जाता है।

३. यह भी मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन दूध या खीर का प्रसाद स्वरूप वितरण करने से चंद्रदोष दूर हो जाता है और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।

४. शरद पूर्णिमा मौसम परिवर्तन का धोत्तक है। इस तिथि के बाद से वातावरण में ठंडक बढ़ने लगती है और शीत ऋतु का आगमन होता है।

विधान…

आज के दिन जितेन्द्रिय भाव से व्रत रखना चाहिए। क्षमता और श्रद्धा भाव से ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी अथवा किसी भी धातु की लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित कर भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए १०० दीपक जलाए। फिर घी मिश्रित खीर बनायें और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चंद्रदेव को सुपुर्द करें। जब एक प्रहर (३ घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें। तत्पश्चात भक्तिपूर्वक निर्धनों और दीन-बन्धुुुओं को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही माङ्गलिक गीत गाकर तथा मङ्गलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। तदनन्तर अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह प्रतिमा किसी दीन दुःखी को अर्पित करें। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी। इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह कोजागर व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी इस लोक में समृद्धि और परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।

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