July 20, 2024

 

जिंदगी के टेढ़े-मेढ़े राहों से,
एक शाम गुजरती है।
उस शाम से सुबहा के बीच में,
एक रात भी बहती है।

जब जब राह मुड़ती है,
ठोकर लगने का डर है।
शाम तक खाईयां भी,
आतीं हमें नजर है।

ये टेढ़े-मेढ़े रास्ते,
जो रात तक जाती हैं।
घनघोर अंधेरे में,
वे बड़ा डराती हैं।

कुछ कुछ पथरीली,
तो कुछ खुरदुरी हैं ये।
कहीं बालुई,
तो कहीं बर्फीली है ये।

कहीं चीकनी फिसलन भरी,
तो कहीं बरसात में गीली हैं ये।
कहीं नाजुक बलखाती हुई सी,
लेकिन बड़ी टेढ़ी-मेढी़ है ये।

गुजर जाते हैं यहां से,
कुछ जाने पहचाने चेहरे,
तो कुछ अंजान मुसाफिर मगर,
सभी को बेहद याद आती है, ये।

अश्विनी राय ‘अरुण’

About Author

Leave a Reply