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भाषा के भगीरथ रामचन्द्र वर्मा: शुद्ध हिंदी के शिल्पी और ‘मानक हिंदी कोश’ के अमर सर्जक

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

प्रस्तावना: हिंदी की शुचिता के अनन्य उपासक

​हिंदी साहित्य के इतिहास में ऐसे अनेक रचनाकार हुए हैं जिन्होंने अपनी कालजयी कहानियों और उपन्यासों से भाषा को समृद्ध किया, परंतु भाषा को एक व्याकरणिक सधाव, अनुशासन, शुद्धता और शब्दों को ‘अर्थ’ देने का जो महती कार्य रामचन्द्र वर्मा ने किया, वह अप्रतिम है। मोहन राकेश ने जहाँ हिंदी नाटक को नई ज़मीन दी, वहीं रामचन्द्र वर्मा जी ने उस ज़मीन पर खड़ी होने वाली भाषा को प्रामाणिकता और संस्कार दिए। वे हिंदी जगत के वह मूर्धन्य कोशकार, संपादक और अनुवादक थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों को शुद्ध हिंदी लिखने और बोलने के लिए प्रेरित करने में समर्पित कर दिया।

 

​जन्म, स्वाध्याय और अद्भुत भाषा-ज्ञान

​रामचन्द्र वर्मा जी का जन्म ८ जनवरी, १८९० को मोक्षनगरी काशी (वर्तमान बनारस) में हुआ था। उनके पिता का नाम दीवान परमेश्वरी दास था। रामचन्द्र जी को बचपन में विद्यालयी शिक्षा बहुत ही सीमित मात्रा में मिल सकी थी। परंतु, औपचारिक शिक्षा के अभाव को उन्होंने अपनी मेधा और कड़े स्वाध्याय (अध्यवसाय) से बौना साबित कर दिया। उन्होंने अपनी लगन से न केवल हिंदी, बल्कि उर्दू, फारसी, मराठी, बंगला, गुजराती और अंग्रेजी आदि अनेक देशी-विदेशी भाषाओं का अत्यंत गहरा और प्रामाणिक ज्ञान प्राप्त कर लिया। यह उनके इसी भाषा-ज्ञान का चमत्कार था कि वे आगे चलकर देश के सबसे बड़े कोशकार बने।

 

​पत्रकारिता से जीवन का आरंभ: ‘हिंदी केसरी’ का संपादन

​रामचन्द्र वर्मा जी ने अपने कर्मजीवन की शुरुआत पत्रकारिता के कटीले मार्ग से की थी।

​राष्ट्रीय चेतना का प्रसार: सन १९०७ में, मात्र १७ वर्ष की अल्पायु में उन्होंने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के प्रसिद्ध मराठी पत्र ‘केसरी’ के हिंदी संस्करण—नागपुर से प्रकाशित ‘हिंदी केसरी’ के संपादक का अत्यंत गरिमापूर्ण पद ग्रहण किया।

​पत्रकारिता का विस्तार: इसके पश्चात वे कुछ समय तक बांकीपुर (पटना) से निकलने वाले प्रतिष्ठित पत्र ‘बिहार बंधु’ के संपादक भी रहे। इस प्रकार उनका शुरुआती जीवन देश की राष्ट्रीय चेतना और भाषाई चेतना को जगाने में बीता।

 

​कोश कला और नागरी प्रचारिणी सभा में अवदान

​पत्रकारिता के बाद वर्मा जी का झुकाव शब्द-साधना और कोश-निर्माण की ओर हुआ, जो उनके जीवन का मुख्य ध्येय बन गया।

​हिंदी शब्द सागर का सारथ्य: सन १९१० से १९२९ तक, लगभग दो दशकों तक वे ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ के विश्वप्रसिद्ध ‘हिंदी शब्द सागर’ के सहायक संपादक के पद पर रहे। यह हिंदी का वह ऐतिहासिक शब्दकोश है जिसने हिंदी को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित किया।

​मानक हिंदी कोश: हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा प्रकाशित ५ खंडों का विशाल और प्रामाणिक ‘मानक हिंदी कोश’ पूर्णतः रामचंद्र वर्मा जी के कठिन परिश्रम, मेधा और रात-दिन की शब्द-साधना का ही प्रतिफल है। इसके अतिरिक्त, ‘संक्षिप्त हिंदी शब्द सागर’ के संपादन का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। उन्होंने विभिन्न प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के कोष विभाग को अपनी सेवाएं दीं और ‘साहित्य रत्नमाला कार्यालय’ का गठन किया।

 

​स्वतंत्र लेखन और कालजयी कृतियाँ

​रामचन्द्र वर्मा जी ने हिंदी भाषा को अनुशासित करने के लिए जिन ग्रंथों की रचना की, वे आज भी हिंदी के विद्यार्थियों, लेखकों और पत्रकारों के लिए मार्गदर्शक (Reference Books) की तरह काम करते हैं।

​भाषा, व्याकरण और कोश कला विषयक प्रमुख कृतियाँ:

​अच्छी हिन्दी — (हिंदी को शुद्ध रूप में लिखने की सबसे प्रामाणिक गाइड)

​हिन्दी प्रयोग मानक हिन्दी व्याकरण

​हिंदी कोश रचना

​शब्द और अर्थ

​शब्द साधना शब्दार्थ दर्शन

​कोषकला

​प्रामाणिक हिंदी कोश

​उर्दू हिंदी कोश

​विशिष्ट अनुवाद कार्य (विभिन्न भाषाओं से अनुवाद):

​वर्मा जी का बहुभाषा-ज्ञान उनकी अनुदित कृतियों में साफ झलकता है। उन्होंने देश-विदेश के प्रसिद्ध ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद करके हिंदी के पाठकों का दायरा बढ़ाया:

​’हिन्दी ज्ञानेश्वरी दासबोध’ (मराठी से संत समर्थ रामदास और ज्ञानेश्वर की कृतियाँ)

​’हिन्दू राजतन्त्र’

​’साम्यवाद धर्म की उत्पत्ति और विकास’

​’पुरानी दुनिया’, ‘छत्रशाल’, ‘प्राचीन मुद्रा’, ‘रायफल’ तथा ‘देवलोक’।

 

​सम्मान, पुरस्कार और महाप्रयाण

​हिंदी भाषा, व्याकरण और शब्दकोश निर्माण के क्षेत्र में उनकी इसी अद्वितीय और अविस्मरणीय महती सेवा के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के अत्यंत प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ की उपाधि से अलंकृत किया था।

​अपनी लेखनी से शब्दों को अर्थ देने वाले इस महान शब्द-साधक का वर्ष १९६९ (मूल संकलन में मुद्रण त्रुटिवश १०६९ अंकित था) में निधन हुआ। रामचन्द्र वर्मा जी आज हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं हैं, लेकिन जब भी कोई लेखक शुद्ध और मानक हिंदी लिखने का प्रयास करेगा, वर्मा जी की ‘अच्छी हिन्दी’ और ‘शब्द साधना’ उसका मार्ग प्रशस्त करती रहेगी।

 

 

 

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