बंगाल डायरी: आशापूर्णा देवी — पर्दे के झरोखे से जन-मानस को बदलने वाली अप्रतिम विद्रोहिणी
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
प्रस्तावना: अंतःपुर से ज्ञानपीठ तक का ऐतिहासिक सफ़र
बांग्ला साहित्य का आकाश अनेक दैदीप्यमान नक्षत्रों से सुशोभित रहा है, परंतु उनमें आशापूर्णा देवी का नाम एक ऐसे जाज्वल्यमान दीप की तरह है जिसने स्वयं बंद कमरों और सामाजिक निषेधों के बीच रहकर भी पूरे समाज को आलोकित किया। मात्र १३ वर्ष की अल्पायु में अपनी साहित्यिक यात्रा प्रारंभ करने वाली आशापूर्णा देवी की लेखनी जीवन के अंतिम पड़ाव तक निरंतर सक्रिय बनी रही। वे आधुनिक भारतीय साहित्य की उन चुनिंदा उपन्यासकारों में अग्रणी हैं, जिन्होंने नारी चेतना, मध्यवर्गीय समाज के अंतद्वंद्व और मानवीय संवेदनाओं को एक नितांत मौलिक और दक्ष शिल्प-कौशल के साथ पिरोया। भारतेंदु और प्रसाद के बाद जैसे नाटक में मोहन राकेश का स्थान है, वैसे ही बांग्ला कथा-साहित्य में आशापूर्णा देवी का स्थान अद्वितीय और अपरिवर्तनीय है।
आरंभिक जीवन: निषेधों का परिवेश और कला चेतना का प्रस्फुटन
आशापूर्णा देवी का जन्म एक पारंपरिक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। तत्कालीन बंगाल का समाज नारी शिक्षा के प्रति अत्यंत संकीर्ण दृष्टिकोण रखता था, जिसके कारण उन्हें कभी स्कूल या कॉलेज जाने का सुअवसर प्राप्त नहीं हो सका। उनके परिवेश में उन सभी सामाजिक निषेधों और बंधनों का बोलबाला था, जो उस युग के बंगाल को आक्रांत किए हुए थे। परंतु, विधि ने उनके भीतर ज्ञान की जो पिपासा दी थी, उसे घर के भीतर ही अनुकूल वातावरण मिल गया।
साहित्यिक सहवास: उनके पिता एक अत्यंत कुशल चित्रकार थे, उनकी माँ बांग्ला साहित्य की अनन्य प्रेमी थीं, और उनके तीनों भाई कॉलेज के छात्र थे। इस बौद्धिक वातावरण के कारण घर पर ही पढ़ने, गुनने और अपने विचार व्यक्त करने की भरपूर सुविधाएं उन्हें बचपन से मिलती रहीं। तत्कालीन जाने-माने साहित्यकारों और कला-शिल्पियों का उनके घर आना-जाना था, जिन्हें निकट से देखने और जानने के अवसरों ने आशापूर्णा के मानस में कला चेतना और संवेदनशीलता का भरपूर विकास किया।
झरोखे का यथार्थवाद: पिता के घर और कालांतर में पति के घर भी उन पर पर्दे के कड़े बंधन लागू रहे। परंतु, इस सजग मन की स्वामिनी लेखिका को यदि घर के किसी छोटे से झरोखे से भी बाहरी संसार की एक लघु झलक मिल जाती, तो उनका संवेदनशील मन उधर के समूचे घटनाचक्र और मानवीय संवेदनाओं की कल्पना कर लेता था। इसी विलक्षण प्रतिभा के बल पर देश का स्वतंत्रता संघर्ष, असहयोग आंदोलन, राजनीति के आंगन में नारी का पदार्पण और पुरुष वर्ग की बराबरी में उनके दायित्वों का निर्वाह—सब कुछ उनकी चेतना पर अमिट रूप से अंकित होता चला गया।
साहित्यिक परिचय: रूढ़ियों के विरुद्ध प्रखर और मौन विद्रोह
अपनी अद्वितीय और नैसर्गिक प्रतिभा के बल पर आशापूर्णा देवी को समकालीन बांग्ला उपन्यासकारों की प्रथम पंक्ति में गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ। उनका कृतित्व अत्यंत विपुल है, जिसका प्रमाण उनकी लगभग २२५ कृतियाँ हैं, जिनमें १०० से अधिक कालजयी उपन्यास शामिल हैं।
शिल्प और यथार्थवाद: आशापूर्णा देवी की सफलता का सबसे बड़ा रहस्य उनका शिल्प-कौशल था, जो नितांत स्वाभाविक होने के साथ-साथ अद्भुत रूप से दक्ष था। उनकी यथार्थवादिता, शब्दों की मितव्ययिता (कम शब्दों में गूढ़ बात कहना), सहज संतुलित मुद्रा और सत्य को ज्यों का त्यों कह देने की क्षमता ने उन्हें साहित्य जगत में अत्यंत विशिष्ट बना दिया।
पूर्वाग्रह रहित दृष्टिकोण: मानवीय चरित्रों के प्रति उनका दृष्टिकोण किसी विचारधारा या पूर्वग्रह से ग्रस्त नहीं था। जब वे किसी घृणित या नकारात्मक चरित्र का रेखांकन करती थीं, तब भी उनके मन में कोई कड़वाहट या द्वेष नहीं होता था। वे मूलतः एक मानवप्रेमी लेखिका थीं, जिनकी रचनागत सशक्तता का मुख्य स्रोत परानुभूति (दूसरों के दुख को महसूस करना) और मानवजाति के प्रति हार्दिक संवेदना थी।
सघन विद्रोह भाव: आशापूर्णा जी मूल रूप से एक विद्रोहिणी थीं। उनका यह विद्रोह किसी सतही नारेबाज़ी का हिस्सा नहीं था, बल्कि उनका संघर्ष उन रूढ़ियों, बंधनों, जर्जर पूर्वाग्रहों, समाज की अर्थहीन परंपराओं और उन अवमाननाओं से था, जो नारी पर पुरुष वर्ग, स्वयं अन्य नारियों और विकृत समाज व्यवस्था द्वारा लादी गई थीं।
कालजयी उपन्यास-त्रयी: चेतना का चरमोत्कर्ष
आशापूर्णा देवी के सघन विद्रोह भाव, कलात्मक परिपक्वता और सामाजिक विमर्श को पूर्ण रूप से मूर्त और मुखरित करने का कार्य उनकी सुप्रसिद्ध उपन्यास-त्रयी (Trilogy) ने किया। यह त्रयी भारतीय नारी के तीन पीढ़ियों के वैचारिक संघर्ष और क्रमिक विकास का जीवंत दस्तावेज़ है:
प्रथम प्रतिश्रुति (१९६४): यह उपन्यास उस पहली पीढ़ी की कहानी कहता है जो सामाजिक बेड़ियों को तोड़ने का पहला संकल्प (प्रतिज्ञा) लेती है।
सुवर्णलता (१९६६): इस कृति में समाज की बंद चहारदीवारी के भीतर एक स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व और वैचारिक छटपटाहट की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है।
बकुलकथा (१९७४): यह आधुनिक युग की उस नारी की कथा है जो स्वतंत्रता के बाद अपनी पहचान और अस्तित्व के नए आयाम तलाश रही है।
लेखन शैली: यथार्थ और आशा का अनूठा संगम
आशापूर्णा देवी के लेखन की विशिष्टता उनकी अपनी एक स्वतंत्र और अप्रतिम शैली है। कथा का क्रमिक विकास करना हो, चरित्रों का मनोवैज्ञानिक रेखांकन करना हो, या पात्रों के अंतर्मन के सूक्ष्म मनोभावों से पाठकों को अवगत कराना हो—वे हर स्तर पर कठोर यथार्थवादिता को बनाए रखती हैं। उनकी शैली की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे यथार्थ के अंधकार को दिखाते हुए भी अंततः अपनी आशामयी दृष्टि (Optimistic Vision) को ही अभिव्यक्ति देती हैं; उनका साहित्य पाठक को अवसाद में नहीं ढकेलता, बल्कि एक नई सुबह की उम्मीद जगाता है।
प्रमुख कृतियाँ और साहित्य-संसार
उनकी कालजयी लेखनी से प्रसूत कुछ मुख्य विधागत रचनाएँ इस प्रकार हैं:
उपन्यास:
प्रेम ओ प्रयोजन (१९४४) — (उनका प्रथम उपन्यास), अग्नि-परीक्षा (१९५२) — (जिस पर उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की प्रसिद्ध फिल्म भी बनी), छाड़पत्र (१९५९), प्रथम प्रतिश्रुति (१९६४), सुवर्णलता (१९६६), मायादर्पण (१९६६), बकुल कथा (१९७४), उत्तरपुरुष (१९७६), जुगांतर यवनिका पारे (१९७८)
कहानी संग्रह:
जल और आगुन (१९४०), आर एक दिन (१९५५), सोनाली संध्या (१९६२), आकाश माटी (१९७५), एक आकाश अनेक तारा (१९७७)।
सम्मान, पुरस्कार और महाप्रयाण
साहित्य के प्रति उनकी अनवरत साधना और विपुल योगदान के लिए उन्हें देश-विदेश के अनेक सर्वोच्च नागरिक और साहित्यिक सम्मानों से अलंकृत किया गया:
टैगोर पुरस्कार (१९६४),
लीला पुरस्कार,
पद्मश्री (१९७६) — (भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान हेतु),
ज्ञानपीठ पुरस्कार (१९७६) — (उनके कालजयी उपन्यास ‘प्रथम प्रतिश्रुति’ के लिए, जिसे पाकर वे यह सर्वोच्च सम्मान प्राप्त करने वाली देश की पहली महिला साहित्यकार बनीं)।
इस प्रख्यात, संवेदनशील और युगप्रवर्तक उपन्यासकार का १३ जुलाई, १९९५ को महाप्रयाण (निधन) हुआ। भले ही वे भौतिक रूप से विदा हो गईं, परंतु अंतःपुर के झरोखों से देखा गया उनका साहित्यिक संसार आज भी विश्व साहित्य की एक अमूल्य और अमर धरोहर है।