April 25, 2024

कविता को साधारण ढंग में विन्यस्त कर उसे तार्किक विस्तार देने वाले सुप्रसिद्ध भारतीय कवि, संस्मरणकार, कहानीकार, उपन्यासकार तथा सहृदय समीक्षक श्री अजित शंकर चौधरी जी का जन्म ९ जून, १९३३ उत्तरप्रदेश के लखनऊ में हुआ था।

परिवेश…

अजीत जी का साहित्यिक परिवेश विरासत में मिला था। पिताजी प्रकाशन चलाते थे, जिसने निराला की पुस्तकें छापी थीं। मां सुमित्रा कुमारी सिन्हा स्वयं महत्वपूर्ण कवयित्री थीं। बहन कीर्ति चौधरी ‘तार सप्तक’ की कवयित्री थीं। बहनोई ओंकारनाथ श्रीवास्तव कवि तो थे ही, बीबीसी लंदन की हिंदी सेवा का अत्यंत लोकप्रिय नाम रहे। उनकी पत्नी स्नेहमयी चौधरी भी प्रतिष्ठित कवयित्री हैं। ऐसे साहित्यिक परिवेश में पले-बढ़े अजित कुमार ने कानपुर, लखनऊ तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और कुछ समय के लिए डीएवी कॉलेज, कानपुर में अध्यापन भी किया। उसके बाद दिल्ली आ गए, जहां उनकी नियुक्ति दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध किरोड़ीमल कॉलेज में हुई और यहीं से रिटायर हुए।

व्यक्तित्व…

कुछ वर्ष पूर्व वह पक्षाघात का शिकार हो गए, पर उनके जीवन के आगे उसकी एक न चली। शायद ही दिल्ली का कोई साहित्यिक आयोजन हो, जिसमें वह न दिखे। हर परिचित या किसी नए से भी आत्मीयता से मिलकर कुशल-क्षेम पूछना उनका स्वभाव था। उन्हें कभी किसी पद या पुरस्कार के लिए लिप्सा पालते नहीं देखा गया। वह बस लगातार काम करना जानते थे। नये से नया काम करना और स्वयं को उसमें तिरोहित कर देना उनका अभीष्ट था। उन्होंने अपने जीवन का यही लक्ष्य बनाया था- जितना हो सके करना और किसी भी लोभ-लाभ से विरत रहना। यही कारण है कि चालाकी से भरे इस दौर में वह गुटों, पक्षों से बाहर रहे और अपने को लगभग हाशिये पर भी डाल दिया। साहित्य का अध्ययन, मनन और उसके प्रति गहरी अनुरक्ति ने उनको एक ऐसा सर्जक बनाया, जिससे विपुल साहित्य रचा जा सका। मठों, जमातों से दूर रहकर काम में मगन रहना उनका धर्म था, छोटे-बड़े सबके प्रति स्नेहिल भाव रखना स्वभाव।

साहित्यिक परिचय…

निराला, शमशेर, बच्चन, अज्ञेय तो उनकी जुबान पर रहते थे। देवीशंकर अवस्थी को अक्सर वह भरे मन से याद करते। आज के साहित्यिक दौर पर अपनी निराशा व्यक्त करते हुए वह खामोश हो जाते- समय बुरा है, हम सब भूल से गए हैं कि हमारा दायित्व क्या है? हममें न सहकार रहा, न सद्भाव। साहित्य को गुटबाजी और वैचारिक लामबंदी में बंटा देख उन्हें निराशा होती थी। उनकी रचनाओं के विदेशी अनुवाद हुए, तो वह पर्याप्त पढ़े जाने वाले लेखकों में भी शुमार हुए। पर उन्हें वह सम्मान, पुरस्कार या प्रतिष्ठा नहीं मिली, जो कथित संस्थाएं लेखकों को देकर उपकृत करती हैं और लेखक भी खुद को धन्य मानकर प्रफुल्लित हुआ रहता है। बेशक केंद्रीय हिन्दी संस्थान, हिन्दी अकादमी, दिल्ली आदि के पुरस्कार उन्हें मिले, पर वह इनसे ज्यादा के हकदार थे।

रचनाएँ…

कवि के साथ-साथ वह संस्मरणकार, कहानीकार, उपन्यासकार तथा सहृदय समीक्षक भी थे। वर्ष १९५८ में उनका पहला कविता संग्रह ‘अकेले कंठ की पुकार’ आया। उसके बाद ‘अंकित होने दो’ १९६२, ‘ये फूल नहीं’ १९७०, ‘घरौंदा’ १९८७, ‘हिरनी के लिए’ १९९३, ‘घोंघे’ १९९६ और २००१ में ‘ऊसर’ नाम से कविता संग्रह आया। ‘बच्चन रचनावली’ के यशस्वी सम्पादक तथा दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रम ‘पत्रिका’ के संचालक के रूप में भी उन्हें अच्छी तरह से जाना जाता है।

‘छुट्टियां’ उपन्यास के अलावा ‘छाता’ और ‘चारपाई’ उनका कहानी संग्रह हैं। ‘इधर की हिंदी कविता’ व ‘कविता का जीवित संसार’ जैसी हार्दिकता से लिखी गई उनकी चर्चित समीक्षा पुस्तकें हैं। ‘दूर वन में’, ‘सफरी झोले में’, ‘निकट मन में’, ‘यहां से कहीं भी’, ‘अंधेरे में जुगनू’ व ‘जिनके संग जिया’ जैसी संस्मरणात्मक पुस्तकों के सर्जक अजित कुमार ने व्यक्ति, परिवेश और स्मृति का जैसा परिवेश इनमें रचा है, अन्यत्र दुर्लभ है। वह उन रचनाकारों में रहे, जो मानते हैं कि अपने समय को अंतरंगता से दर्ज करना साहित्यिक का पहला कर्तव्य है।

सम्पादन कार्य…

रामचंद्र शुक्ल विश्वकोष, हिन्दी की प्रतिनिधि श्रेष्ठ कविताएं, आठवें दशक की श्रेष्ठ प्रतिनिधि कविताएं, सुमित्रा कुमारी सिन्हा रचनावली, बच्चन रचनावली, बच्चन के साथ क्षण भर जैसी पुस्तकों का संपादन कर उन्होंने अपनी समझ के साथ-साथ श्रेष्ठ संपादन का आदर्श भी प्रस्तुत किया। इतना कुछ करने के बाद भी वह साहित्यिक चातुर्य से परे रहे।

सम्मान एवं पुरस्कार…

अजित शंकर चौधरी को केंद्रीय हिन्दी संस्थान, हिन्दी अकादमी, दिल्ली आदि के द्वारा सम्मानित किया गया था।

निधन…

हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार अजित शंकर चौधरी को स्वास्थ्य समस्याओं के चलते दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में भर्ती कराया गया था। १८ जुलाई, २०१७ को सुबह ६ बजे दिल का दौरा पड़ने से उनका अकस्मात निधन हो गया। उन्होंने काफ़ी समय पहले देहदान करने की घोषणा की थी, इसलिए उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया। बल्कि उनका पार्थिव शरीर ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान’ को सौंप दिया गया।

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