अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’: खड़ी बोली के प्रथम महाकवि
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का जन्म 15 अप्रैल, 1865 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के निजामाबाद में हुआ था। उनके पिता पंडित भोलानाथ उपाध्याय थे। उनकी शिक्षा का आरंभिक आधार बहुत ही विविध रहा। मात्र पाँच वर्ष की अल्पायु में ही उनके चाचा ने उन्हें फारसी पढ़ाना शुरू कर दिया था।
निजामाबाद से मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए काशी के ‘क्वींस कॉलेज’ गए, किंतु खराब स्वास्थ्य के कारण उन्हें औपचारिक कॉलेज शिक्षा छोड़नी पड़ी। हार न मानते हुए उन्होंने घर पर ही स्वाध्याय (Self-study) के बल पर संस्कृत, उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेजी भाषाओं का गहरा ज्ञान अर्जित किया। यही भाषाई विविधता आगे चलकर उनके साहित्य की शक्ति बनी।
अध्यापन और साहित्य सेवा
साहित्य के प्रति उनके समर्पण ने उन्हें शैक्षणिक जगत में प्रतिष्ठित किया। वर्ष 1932 से 1941 तक ‘हरिऔध’ जी ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के हिंदी विभाग में अवैतनिक (Honorary) शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएँ दीं। अध्यापन से निवृत्त होने के बाद वे अपने गाँव निजामाबाद लौट आए और पूरी तरह साहित्य-साधना में लीन हो गए।
उनकी सेवाओं के सम्मान में हिंदी साहित्य सम्मेलन ने उन्हें सम्मेलन का सभापति चुना और उन्हें ‘विद्यावाचस्पति’ की उपाधि से अलंकृत किया गया।
भाषा शैली: दो रूपों का संगम
हरिऔध जी की भाषा शैली की सबसे बड़ी विशेषता उनका भाषा पर अद्भुत अधिकार था। वे एक ही समय में दो विपरीत ध्रुवों पर चलने में सक्षम थे:
१. संस्कृतनिष्ठ और प्रौढ़ भाषा
उनकी भाषा कहीं-कहीं इतनी संस्कृतगर्भित है कि वह हिंदी न होकर संस्कृत की ही कोई कृति प्रतीत होती है। इसका एक सुंदर उदाहरण देखिए:
रूपोद्याम प्रफुल्ल प्रायः कलिका राकेंदु-बिंबानना,
तन्वंगी कल-हासिनी सुरसि का क्रीड़ा-कला पुत्तली।
२. सरल और मुहावरेदार भाषा
दूसरी ओर, उन्होंने आम बोलचाल की सरल और मुहावरेदार भाषा को भी उतनी ही कुशलता से अपनाया। उनके ‘चौपदों’ में यह सादगी देखते ही बनती है:
नहीं मिलते आँखों वाले,
पड़ा अंधेरे से है पाला।
कलेजा किसने कब थामा,
देख छिलते दिल का छाला॥
’प्रिय प्रवास’: एक युगांतकारी कृति
हिंदी साहित्य के इतिहास में ‘हरिऔध’ जी का नाम अमर करने वाली कृति है—’प्रिय प्रवास’। यह हिंदी खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।
विशेषता: इसमें कृष्ण के मथुरा गमन और ब्रज की विरह-दशा का अत्यंत मार्मिक चित्रण है।
आदर्शवाद: यहाँ कृष्ण केवल एक ईश्वरीय अवतार नहीं, बल्कि एक आदर्श मानव और लोक-सेवक के रूप में चित्रित हैं।
प्रकृति चित्रण: प्रकृति यहाँ केवल पृष्ठभूमि नहीं है, बल्कि पात्रों के दुख में साथ रोती नजर आती है:
फूलों-पत्तों सकल पर हैं वादि-बूँदें लखातीं,
रोते हैं या विपट सब यों आँसुओं की दिखा के।
सम्मान: इस कालजयी कृति के लिए उन्हें ‘मंगलाप्रसाद पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।
प्रमुख कृतियाँ (एक नजर में)
महाकाव्य/काव्य: प्रिय प्रवास, वैदेही वनवास, पारिजात, रस-कलश, चौखे चौपदे, चुभते चौपदे।
गद्य/उपन्यास: ठेठ हिंदी का ठाठ, अधखिला फूल, हिंदी भाषा और साहित्य का विकास।
बाल साहित्य: बाल विभव, बाल विलास, फूल पत्ते, चन्द्र खिलौना, खेल तमाशा, बाल गीतावली।
नाटक: रुक्मिणी परिणय, प्रद्युम्न विजय।
निष्कर्ष
‘हरिऔध’ जी केवल एक कवि नहीं, बल्कि हिंदी गद्य और पद्य के संधि-काल के एक ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने हिंदी को खड़ी बोली के रूप में महाकाव्य की गौरवमयी शक्ति प्रदान की। उनके काव्य की संध्या का वर्णन आज भी हिंदी प्रेमियों के कानों में गूँजता है:
दिवस का अवसान समीप था,
गगन था कुछ लोहित हो चला।
तरु शिखा पर थी जब राजती,
कमलिनी-कुल-वल्लभ का प्रभा।
लल्लू लाल जी: हिंदी गद्य के निर्माता और ‘प्रेमसागर’ के रचयिता