February 23, 2024

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का जन्म १५ अप्रैल, १८६५ को उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जिले के निजामाबाद के पंडित भोलानाथ उपाध्याय के यहाँ हुआ था। पाँच वर्ष की अवस्था में इनके चाचा ने इन्हें फारसी पढ़ाना शुरू कर दिया था। हरिऔध जी निजामाबाद से मिडिल परीक्षा पास करने के पश्चात काशी के क्वींस कालेज में अंग्रेज़ी पढ़ने के लिए गए, किन्तु स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा। उन्होंने घर पर ही रह कर संस्कृत, उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेजी आदि का अध्ययन किया।

वर्ष १९३२ से १९४१ तक हरिऔध जी ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अवैतनिक शिक्षक के रूप से कई वर्षों तक अध्यापन कार्य किया। उसके बाद यह निजामाबाद वापस चले आए। इस अध्यापन कार्य से मुक्त होने के बाद हरिऔध जी अपने गाँव में रह कर ही साहित्य-सेवा कार्य करते रहे। अपनी साहित्य-सेवा के कारण हरिऔध जी ने काफी ख़्याति अर्जित की। हिंदी साहित्य सम्मेलन ने उन्हें एक बार सम्मेलन का सभापति बनाया और विद्यावाचस्पति की उपाधि से सम्मानित किया।

हरिऔध जी की भाषा प्रौढ़, प्रांजल और आकर्षक है। कहीं-कहीं उसमें उर्दू-फारसी के भी शब्द आ गए हैं। नवीन और अप्रचलित शब्दों का प्रयोग भी हुआ है। संस्कृत के तत्सम शब्दों का तो इतनी अधिकता है कि कहीं-कहीं उनकी कविता हिंदी की न होकर संस्कृत की सी ही प्रतीत होने लगती है…

रूपोद्याम प्रफुल्ल प्रायः कलिका राकेंदु-बिंबानना,
तन्वंगी कल-हासिनी सुरसि का क्रीड़ा-कला पुत्तली।
शोभा-वारिधि की अमूल्य मणि-सी लावण्य लीलामयी,
श्री राधा-मृदु भाषिणा मृगदगी-माधुर्य की मूर्ति थी॥

भाषा पर हरिऔध जी का अद्भुत अधिकार प्राप्त था। एक ओर जहाँ उन्होंने संस्कृत-गर्भित उच्च साहित्यिक भाषा में कविता लिखी वहाँ दूसरी ओर उन्होंने सरल तथा मुहावरेदार व्यावहारिक भाषा को भी सफलतापूर्वक अपनाया। उनके चौपदों की भाषा इसी प्रकार की है…

नहीं मिलते आँखों वाले,
पड़ा अंधेरे से है पाला।
कलेजा किसने कब थामा,
देख छिलते दिल का छाला॥

हरिऔध जी के साहित्य संसार…

गद्य…

ठेठ हिंदी का ठाठ, अधखिला फूल, हिंदी भाषा और साहित्य का विकास आदि ग्रंथों की भी रचना की।

काव्य…

प्रिय प्रवास, कवि सम्राट, वैदेही वनवास, पारिजात, रस-कलश, चौखे चौपदे, ठेठ हिंदी का ठाठ, अध खिला फूल, रुक्मिणी परिणय, हिंदी भाषा और साहित्य का विकास।

बाल साहित्य…

बाल विभव, बाल विलास, फूल पत्ते, चन्द्र खिलौना, खेल तमाशा, उपदेश कुसुम, बाल गीतावली, चाँद सितारे, पद्य प्रसून आदि।

प्रिय प्रवास हरिऔध जी का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह हिंदी खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है। इसे मंगलाप्रसाद पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।

प्रिय प्रति वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है?
दुःख जल निधि डूबी का सहारा कहाँ है?
लख मुख जिसका मैं आजलौं जी सकी हूँ।
वह ह्रदय हमारा नैन तारा कहाँ है?

कृष्ण के मथुरा गमन तथा उसके बाद ब्रज की दशा का मार्मिक वर्णन और वियोग तथा वात्सल्य का इतना सुन्दर चित्रण।

विपत्ति से रक्षण सर्वभूत का,
सहाय होना असहाय जीव का।
उबारना संकट से स्वजाति का,
मनुष्य का सर्व प्रधान धर्म है।

लोक-सेवा की भावना पर आधारित यह कविता जिसमें कृष्ण को आदर्श मानव और लोक-सेवक के रूप में चित्रण।

फूलों-पत्तों सकल पर हैं वादि-बूँदें लखातीं,
रोते हैं या विपट सब यों आँसुओं की दिखा के।

इस काव्य में प्रकृति का कितना खुबसूरत चित्रण है। कृष्ण के वियोग में ब्रज के वृक्ष भी रोते हैं।

दिवस का अवसान समीप था,
गगन था कुछ लोहित हो चला।
तरु शिखा पर थी जब राजती,
कमलिनी-कुल-वल्लभ का प्रभा।

प्रकृति-वर्णन में संध्या का एक खुबसूरत दृश्य देखिए।

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