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अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध – शूट२पेन
February 29, 2024

खड़ी बोली को काव्य भाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने वाले कवियों में एक नाम बहुत आदर से लिया जाता है और वो नाम है, उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में यानी वर्ष १८९० ई. के आस-पास साहित्य सेवा में आए अयोध्या सिंह उपाध्याय जी का।

जीवनी…

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जी का जन्म १५ अप्रैल १८६५ में उत्तरप्रदेश के ज़िला आजमगढ़ अंतर्गत निज़ामाबाद नामक स्थान के रहने वाले पिता भोलासिंह और माता रुक्मणि देवी के यहां हुआ था। वे बचपन से ही शारीरिक रूप से रूग्ण थे अतः अस्वस्थता की वजह से हरिऔध जी का विद्यालय में पठन-पाठन न हो सका, इस कारण इन्होंने घर पर ही उर्दू, संस्कृत, फ़ारसी, बांग्ला एवं अंग्रेज़ी का अध्ययन किया। वर्ष १८८३ में ये निज़ामाबाद के मिडिल स्कूल के हेडमास्टर हो गए। वर्ष १८९० में क़ानूनगो की परीक्षा पास करने के बाद वे क़ानून गो बन गए। वर्ष १९२३ में पद से अवकाश लेकर वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बने।

कार्यक्षेत्र…

भाषाविदो और विद्वानों के अनुसार खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्यकार हरिऔध जी का सृजनकाल हिन्दी के तीनों युगों में फैला है-

१. भारतेन्दु युग
२. द्विवेदी युग
३. छायावादी युग

इसीलिये हिन्दी कविता के विकास में ‘हरिऔध’ जी की भूमिका नींव के पत्थर के समान मानी जाती है। उन्होंने संस्कृत छंदों का हिन्दी में बेहद सफल प्रयोग किया है। ‘प्रियप्रवास’ की रचना संस्कृत वर्णवृत्त में करके जहाँ ‘हरिऔध’ जी ने खड़ी बोली को पहला महाकाव्य दिया, वहीं आम हिन्दुस्तानी बोलचाल में ‘चोखे चौपदे’, तथा ‘चुभते चौपदे’ रचकर उर्दू जुबान की मुहावरेदारी की शक्ति भी रेखांकित की।

प्रसिद्धि…

हरिऔध जी को कवि रूप में सर्वाधिक प्रसिद्धि उनके प्रबन्ध काव्य ‘प्रियप्रवास’ के कारण मिली। ‘प्रियप्रवास’ की रचना से पूर्व की काव्य कृतियाँ कविता की दिशा में उनके प्रयोग की तरह मानी जाती हैं। इन कृतियों में प्रेम और श्रृंगार के विभिन्न पक्षों को लेकर काव्य रचना के लिए किए गए अभ्यास की झलक मिलती है। ‘प्रियप्रवास’ को इसी क्रम में लेना चाहिए। ‘प्रियप्रवास’ के बाद की कृतियों में ‘चोखे चौपदे’ तथा ‘वैदेही बनवास’ उल्लेखनीय हैं। ‘चोखे चौपदे’ लोकभाषा के प्रयोग की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। ‘प्रियप्रवास’ की रचना संस्कृत की कोमल कान्त पदावली में हुई है और उसमें तत्सम शब्दों का बाहुल्य है। ‘चोखे चौपदे’ में मुहावरों के बाहुल्य तथा लोकभाषा के समावेश द्वारा कवि ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह अपनी सीधी सादी जबान को भूला नहीं है। ‘वैदेही बनवास’ की रचना द्वारा एक और प्रबन्ध सृष्टि का प्रयत्न किया गया है। आकार की दृष्टि से यह ग्रन्थ छोटा नहीं है, किन्तु विद्वानों के अनुसार इसमें ‘प्रियप्रवास’ जैसी ताज़गी और काव्यत्व का अभाव जान पड़ता है।

साहित्यिक कृतित्व…

हरिऔध जी के अन्य साहित्यिक कृतित्व में उनकी ब्रजभाषा काव्य संग्रह ‘रसकलश’ को कैसे भुला जा सकता है। इसमें उनकी आरम्भिक कविताएँ संकलित हैं। ये कविताएँ श्रृंगारिक हैं। इन्होंने गद्य और आलोचना की ओर भी ध्यान दिया था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय हिन्दी के अवैतनिक अध्यापक पद पर कार्य करते हुए इन्होंने ‘कबीर वचनावली’ का सम्पादन किया। ‘वचनावली’ की भूमिका में कबीर पर लिखे गए लेखों से इनकी आलोचना दृष्टि का पता चलता है। इन्होंने ‘हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास’ शीर्षक एक इतिहास ग्रन्थ भी प्रस्तुत किया, जो बहुत ही लोकप्रिय हुआ।

हरिऔध’ जी लेखन के शुरुआती दौर में नाटक तथा उपन्यास लेखन की ओर आकर्षित हुए थे। ‘हरिऔध’ जी की दो नाट्य कृतियाँ ‘प्रद्युम्न विजय’ तथा ‘रुक्मणी परिणय’ क्रमश: वर्ष १८९३ तथा वर्ष १८९४ में प्रकाशित हुईं। १८९४ में ही इनका प्रथम उपन्यास ‘प्रेमकान्ता’ भी प्रकाशन में आया। बाद में दो अन्य औपन्यासिक कृतियाँ ‘ठेठ हिन्दी का ठाठ’ ( वर्ष १८९९ ई.) और ‘अधखिला फूल’ (वर्ष १९०७ ई.) नाम से प्रकाशित हुई। ये नाटक तथा उपन्यास साहित्य के उनके प्रारम्भिक प्रयास होने की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। इन कृतियों में नाट्यकला अथवा उपन्यासकला की विशेषताएँ ढूँढना तर्कसंगत नहीं हैं। उपाध्याय जी की प्रतिभा का विकास वस्तुत: कवि रूप में हुआ। खड़ी बोली का प्रथम महाकवि होने का श्रेय ‘हरिऔध’ जी को है। ‘हरिऔध’ के उपनाम से इन्होंने अनेक छोटे-बड़े काव्यों की सृष्टि की, जिनकी संख्या पन्द्रह से ऊपर है, जिनमें कुछ इस प्रकार हैं…

१. रसिक रहस्य १८९९
२. प्रेमाम्बुवारिधि, प्रेम प्रपंच १९००
३. प्रमाम्बु प्रश्रवण, प्रेमाम्बु प्रवाह १९०१
४. प्रेम पुष्पहार १९०४
५. उदबोधन १९०६
६. काव्योपवन १९०९
७. प्रियप्रवास १९१४
८. कर्मवीर १९१६
९. ऋतु मुकुर १९१७
१०. पद्मप्रसून १९२५
११. पद्मप्रमोद १९२७
१२. चोखेचौपदे १९३२
१३. वैदेही बनवास, चुभते चौपदे, रसकलश १९४०

जानकारी…

अमेरिकन एनसाइक्लोपीडिया ने इनका परिचय प्रकाशित करते हुए इन्हें विश्व के साहित्य सेवियों की पंक्ति प्रदान की। खड़ी बोली काव्य के विकास में इनका योगदान निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। यदि ‘प्रियप्रवास’ खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है तो ‘हरिऔध’ खड़ी बोली के प्रथम महाकवि।

हरिऔध जी ने गद्य और पद्य दोनों ही क्षेत्रों में हिन्दी की सेवा की। वे द्विवेदी युग के प्रमुख कवि है। उन्होंने सर्वप्रथम खड़ी बोली में काव्य-रचना करके यह सिद्ध कर दिया कि उसमें भी ब्रजभाषा के समान खड़ी बोली की कविता में भी सरसता और मधुरता आ सकती है। हरिऔध जी में एक श्रेष्ठ कवि के समस्त गुण विद्यमान हैं। ‘उनका प्रिय प्रवास’ महाकाव्य अपनी काव्यगत विशेषताओं के कारण हिन्दी महाकाव्यों में मील का पत्थर माना जाता है। निराला जी के शब्दों में, “हरिऔध जी की यह एक सबसे बड़ी विशेषता है कि ये हिन्दी के सार्वभौम कवि हैं। खड़ी बोली, उर्दू के मुहावरे, ब्रजभाषा, कठिन-सरल सब प्रकार की कविता की रचना कर सकते हैं।”

सम्मान…

अपने जीवनकाल में इन्हें यथोचित सम्मान मिला था। वर्ष १९२४ में इन्होंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधान पद को सुशोभित किया था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने इनकी साहित्य सेवाओं का मूल्यांकन करते हुए इन्हें हिन्दी के अवैतनिक अध्यापक का पद प्रदान किया।

अमेरिकन ‘एनसाइक्लोपीडिया’ ने इनका परिचय प्रकाशित करते हुए इन्हें विश्व के साहित्य सेवियों की पंक्ति प्रदान की। खड़ी बोली काव्य के विकास में इनका योगदान निश्चित रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण है। यदि ‘प्रियप्रवास’ खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है तो ‘हरिऔध’ खड़ी बोली के प्रथम महाकवि।

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