June 13, 2024

मध्यप्रदेश के सागर जिले में एक विश्वविद्यालय स्थित है। जिसे सागर विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है, लेकिन आधिकारिक तौर पर उस विश्वविद्यालय का नाम डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय है। जिसकी स्थापना डॉ. हरिसिंह गौर ने १८ जुलाई, १९४६ को अपनी निजी संपत्ति से की थी। अपने स्थापना के समय यह भारत का १८वाँ विश्वविद्यालय था और किसी एक व्यक्ति के द्वारा उसकी निजी संपत्ति से स्थापित होने वाला देश का आज भी एकमात्र विश्वविद्यालय है। स्थापना के समय से लेकर वर्ष १९८३ तक यह सागर विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता रहा लेकिन उसके बाद डॉ. हरीसिंह गौर जी के सम्मान में इसका नाम बदलकर डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय कर दिया गया। और अंत में २७ मार्च, २००८ को इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय की श्रेणी भी प्रदान कर दी गई। आइए आज के दिन हम डॉ. हरीसिंह गौर जी को याद करते हैं…

परिचय…

डॉ. सर हरीसिंह गौर जी का जन्म मध्य प्रदेश के सागर जिला अंतर्गत के शनिचरीटोरी नामक एक गांव के रहने वाले एक निर्धन परिवार में २६ नवम्बर, १८७० में हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा सागर के ही सरकारी स्कूल से हुई। छात्रवृत्ति के सहारे उन्होंने पढ़ाई का क्रम जारी रखा, और मिडिल से आगे की पढ़ाई के लिए वे जबलपुर आ गए। तत्पश्चात महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए नागपुर के हिसलप कॉलेज में दाखिला ले लिया, जहां से उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में की थी। वे प्रांत में प्रथम रहे तथा पुरस्कारों से भी नवाजे गए।

वर्ष १८८९ में उच्च शिक्षा लेने इंग्लैंड गए। जहां से वर्ष १८९२ में दर्शनशास्त्र व अर्थशास्त्र में ऑनर्स की उपाधि प्राप्त की। वर्ष १८९६ में एम ए, वर्ष १९०२ में एलएलएम और वर्ष १९०८ में एलएलडी की उच्च कोटि की शिक्षा प्राप्त की।

जिस समय वे कैम्ब्रिज में पढाई कर रहे थे उसी दौरान वहां से समय बचाकर वे ट्रिनिटी कालेज से डीलिट् तथा एलएलडी की शिक्षा प्राप्त करते रहे। उन्होने अंतर-विश्वविद्यालयीन शिक्षा समिति में कैंब्रिज विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया, जो उस समय किसी भारतीय के लिये सम्मान की बात थी। डॉ. सर हरीसिंह गौर जी ने छात्र जीवन में ही दो काव्य संग्रह दी स्टेपिंग वेस्टवर्ड एण्ड अदर पोएम्स एवं रेमंड टाइम की रचना की, जिससे सुप्रसिद्ध रायल सोसायटी ऑफ लिटरेचर द्वारा उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान कर सम्मानित किया गया।

वर्ष १९१२ में वे बैरिस्टर होकर स्वदेश आ गये। यहां उनकी नियुक्ति भंडारा में सेंट्रल प्रॉविंस कमीशन में एक्स्ट्रा सहायक आयुक्त के रूप में हो गई। जहां वे मात्र तीन माह ही रहे। अपने पद से इस्तीफा देने के बाद वे अखिल भारतीय स्तर पर वकालत प्रारंभ कर दी मध्यप्रदेश, भंडारा, रायपुर, लाहौर, कलकत्ता, रंगून तथा चार वर्ष तक इंग्लैंड की प्रिवी काउंसिल में वकालत की, जहां उन्हें एलएलडी एवं डीलिट् की सर्वोच्च उपाधि से भी विभूषित किया गया। वर्ष १९०२ में उनकी द लॉ ऑफ ट्रांसफर इन ब्रिटिश इंडिया पुस्तक प्रकाशित हुई। वर्ष १९०९ में दी पेनल ला ऑफ ब्रिटिश इंडिया (वाल्यूम २) भी प्रकाशित हुई जो देश व विदेश में मान्यता प्राप्त पुस्तक है। प्रसिद्ध विधिवेत्ता सर फेडरिक पैलाक ने भी उनके ग्रंथ की प्रशंसा की थी। इसके अतिरिक्त डॉ. गौर ने बौद्ध धर्म पर दी स्पिरिट ऑफ बुद्धिज्म नामक पुस्तक भी लिखी। डॉ॰ साहब ने वर्ष १९२९ में स्प्रिट आफ बुद्धिज़्म लिखा, इस किताब की प्रस्तावना गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखी गई । इसी पुस्तक को पढ़कर डॉ. भीमराव अंबेडकर बेहद प्रभावित हुए थे। यही वह पुस्तक है जिसने जापान में बौद्ध दर्शन से डॉ. साहब को धर्मगुरु का सम्मान दिया गया। इसके अलावा उन्होंने कई उपन्यासों की भी रचना की।

वर्ष १९२१ में केंद्र सरकार ने जब दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थापना की तब उन्हें विश्वविद्यालय का संस्थापक कुलपति नियुक्त किया। ९ जनवरी, १९२५ को शिक्षा में अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें `सर´ की उपाधि से विभूषित किया गया, तत्पश्चात डॉ. सर हरीसिंह गौर को दो बार नागपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया।

कार्य…

डॉ. सर हरीसिंह गौर ने २० वर्षों तक वकालत की तथा प्रिवी काउंसिल के अधिवक्ता के रूप में शोहरत हासिल की। वे कांग्रेस के सदस्य भी रहे, परन्तु अन्य राष्ट्रवादियों की भांति राष्ट्रवादी विचारधारा पर महात्मा गांधी से मतभेद हो गया और उन्होंने वर्ष १९२० कांग्रेस को छोड़ दिया। वे वर्ष १९३५ तक विधान परिषद् के सदस्य रहे। वे भारतीय संसदीय समिति के भी सदस्य रहे तथा भारतीय संविधान परिषद् के सदस्य के रूप में संविधान निर्माण में अपने दायित्वों का निर्वहन भी किया।

आपने डॉ. सर हरिसिंह गौर जी के बारे में ऊपर पढ़ा की वे शिक्षाशास्त्री, विधिवेत्ता, न्यायविद्, समाज सुधारक, साहित्यकार एवं देशभक्त थे, साथ ही वे बीसवीं शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ शिक्षा मनीषियों में से भी थे। वे दिल्ली विश्वविद्यालय तथा नागपुर विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। वे भारतीय संविधान सभा के उपसभापति, साइमन कमीशन के सदस्य तथा रायल सोसायटी फार लिटरेचर के फेल्लो भी रहे थे।उन्होने कानून शिक्षा, साहित्य, समाज सुधार, संस्कृति, राष्ट्रीय आंदोलन, संविधान निर्माण आदि में भी अपना महती योगदान दिया। लेकिन इस बीच हमने आपको सागर विश्वविद्यालय के स्थापना के बारे में बताना भूल ही गए।

डॉ. सर हरिसिंह गौर जी ने अपनी गाढ़ी कमाई में से उस समय में २० लाख रुपये की धनराशि से १८ जुलाई, १९४६ को अपनी जन्मभूमि सागर में सागर विश्वविद्यालय की स्थापना की तथा वसीयत द्वारा अपनी निजी सपत्ति से २ करोड़ रुपये दान भी दिया था। इस विश्वविद्यालय के संस्थापक, उपकुलपति तो थे ही, वे अपने जीवन के आखिरी समय २५ दिसम्बर, १९४९ तक इसके विकास के प्रति दृढ़ संकल्पित भी रहे। उनका एकमात्र स्वप्न था कि सागर विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज तथा ऑक्सफोर्ड जैसी ऊंचाई और मान्यता प्राप्त करे। डॉ. सर हरीसिंह गौर एक ऐसा विश्वस्तरीय अनूठा विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना एक शिक्षाविद् के द्वारा स्वयं की संपत्ति के दान के माध्यम एवं निर्देशन में की गई थी।

विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद उन्होंने नागरिकों से अपील कर कहा था कि सागर के नागरिकों को सागर विश्वविद्यालय के रूप में एक शिक्षा का महान अवसर मिला है, वे स्वयं को इतना आदर्श बनाएं की आपके माध्यम से यह विद्यापीठ आदर्श के रूप में स्मरणीय बन सके।

एक और बात, यह एक संयोग ही है कि स्वतंत्र भारत व इस विश्वविद्यालय का जन्म एक ही वक्त में हुआ। डॉ. सर हरीसिंह गौर को अपनी जन्मभूमि सागर में उच्च शिक्षा की व्यवस्था न होने का दर्द हमेशा रहा। इसी कारण द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात ही इंग्लैंड से लौट कर उन्होंने अपने जीवन भर की कमाई से इसकी स्थापना करायी। वे कहते थे कि राष्ट्र का धन न उसके कल-कारखाने में सुरक्षित रहता है न सोने-चांदी की खदानों में; वह राष्ट्र के स्त्री-पुरुषों के मन और देह में समाया रहता है। डॉ. हरिसिंह की सेवाओं के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए भारतीय डाक व तार विभाग ने वर्ष १९७६ में एक डाक टिकट जारी किया जिस पर उनके चित्र को प्रदर्शित किया गया है।

डॉ. हरि सिंह गौर ने ‘सेवेन लाईव्ज’ (Seven Lives) शीर्षक से अपनी आत्मकथा लिखी है। एक युवा पत्रकार ने इस आत्मकथा का हिन्दी भाषा में अनुवाद किया है। डॉ. गौर ने अपनी आत्मकथा में अपने जीवन के सभी पहलुओं पर बड़ी बेबाकी से लिखा है।

कुछ प्रमुख कृतियाँ…

1. The Transfer of Property in British India: Being an Analytical Commentary on the Transfer of Property Act, 1882 as Amended …, Published by Thacker, Spink, 1901.

2. The Law of Transfer in British India, Vol. 1–3 (1902)

3. The Penal Law of India, Vol. 1–2 (1909)

4. Hindu Code (1919)

5. India and the New Constitution (1947)

6. Renaissance of India (1942)

7. The Spirit of Buddhism (1929)

8. His only Love (1929)

9. Random Rhymes (1892)

10. Facts and Fancies (1948)

11. Seven Lives (आत्मकथा ; अंग्रेजी, हिंदी 1944)

12. India and the New Constitution (1947)

13. Letters from Heaven

14. Lost Soul

15. Passing Clouds etc.

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