July 22, 2024

यह तो जगजाहिर है कि रामायण एक महाकाव्य है जो कि राम के जीवन के माध्यम से हमे जीवन के सत्य व कर्तव्य से परिचित करवाता है। रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि जी हैं, जिन्होंने संस्कृत भाषा मे रामायण की रचना की है, इसीलिए यह महाकाव्य वाल्मीकि रामायण के नाम से जगतप्रसिद्घ है।

रामायण में भगवान वाल्मीकि ने २४००० श्लोकों में श्रीराम उपाख्यान ‘रामायण’ लिखी। ऐसा वर्णन है कि- एक बार वाल्मीकि क्रौंच पक्षी के एक जोड़े को निहार रहे थे। वह जोड़ा प्रेमालाप में लीन था, तभी उन्होंने देखा कि बहेलिये ने प्रेम-मग्न क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया। इस पर मादा पक्षी विलाप करने लगी। उसके विलाप को सुनकर वाल्मीकि की करुणा जाग उठी और द्रवित अवस्था में उनके मुख से स्वतः ही यह श्लोक फूट पड़ा।

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वंगमः शाश्वतीः समाः।

यत्क्रौंचमिथुनादेकं वधीः काममोहितम्॥

(अर्थ : हे दुष्ट, तुमने प्रेम मे मग्न क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी और तुझे भी वियोग झेलना पड़ेगा।)

उसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध महाकाव्य “रामायण” की रचना की और “आदिकवि वाल्मीकि” के नाम से अमर हो गये।

आदिकवि शब्द ‘आदि’ और ‘कवि’ के मेल से बना है। ‘आदि’ का अर्थ होता है ‘प्रथम’ और ‘कवि’ का अर्थ होता है ‘काव्य का रचयिता’। वाल्मीकि ने संस्कृत के प्रथम महाकाव्य की रचना की थी जो रामायण के नाम से प्रसिद्ध है। प्रथम संस्कृत महाकाव्य की रचना करने के कारण वाल्मीकि आदिकवि कहलाये। अपने महाकाव्य “रामायण” में उन्होंने अनेक घटनाओं के समय सूर्य, चंद्र तथा अन्य नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन किया है। इससे ज्ञात होता है कि वे ज्योतिष विद्या एवं खगोल विद्या के भी प्रकाण्ड ज्ञानी थे।

भगवान वाल्मीकि को “श्रीराम” के जीवन में घटित प्रत्येक घटना का पूर्ण ज्ञान था। सतयुग, त्रेता और द्वापर तीनों कालों में वाल्मीकि का उल्लेख मिलता है इसलिए भगवान वाल्मीकि को सृष्टिकर्ता भी कहते है, रामचरितमानस के अनुसार जब श्रीराम वाल्मीकि आश्रम आए थे तो आदिकवि वाल्मीकि के चरणों में दण्डवत प्रणाम करने के लिए वे जमीन पर डंडे की भांति लेट गए थे और उनके मुख से निकला था “तुम त्रिकालदर्शी मुनिनाथा, विस्व बदर जिमि तुमरे हाथा।” अर्थात आप तीनों लोकों को जानने वाले स्वयं प्रभु हैं। ये संसार आपके हाथ में एक बैर के समान प्रतीत होता है।

महाभारत काल में भी वाल्मीकि का वर्णन मिलता है। जब पांडव कौरवों से युद्ध जीत जाते हैं तो द्रौपदी यज्ञ रखती है, जिसके सफल होने के लिये शंख का बजना जरूरी था परन्तु कृष्ण सहित सभी के प्रयास करने पर भी शंख नहीं बजा। शंख के ना बजने पर यज्ञ सफल नहीं होता तो श्री कृष्ण के कहने पर सभी वाल्मीकि से प्रार्थना करते हैं। जब वाल्मीकि वहां प्रकट होते हैं तो शंख स्वयं बज उठता है और द्रौपदी का यज्ञ सम्पूर्ण हो जाता है। इस घटना को कबीर ने भी स्पष्ट किया है “सुपच रूप धार सतगुरु आए। पांडों के यज्ञ में शंख बजाए।”

परिचय…

महर्षि कश्यप और माता अदिति के नवम पुत्र थे वरुण अर्थात् आदित्य। महर्षि वाल्मीकि जी का जन्म अश्विन मास के शुक्‍ल पक्ष की पूर्णिमा यानी कि शरद पूर्णिमा को पिता वरुण जी एवं माता चर्षणी जी के यहां हुआ था। इनके बड़े भाई महर्षि भृगु थे। वरुण जी का एक नाम प्रचेत भी है, इसलिये इन्हें कहीं कहीं प्राचेतस् नाम से उल्लेखित किया जाता है। उपनिषद के विवरण के अनुसार ये भी अपने भाई भृगु की भांति परम ज्ञानी थे। एक बार ध्यान में बैठे हुए वरुण-पुत्र के शरीर को दीमकों ने अपना ढूह यानी बाँबी बनाकर ढक लिया था। दीमक – ढूह को वाल्मीकि कहते हैं अतः साधना पूरी करके जब ये बाहर निकले तबसे इन्हें वाल्मीकि कहा जाने लगा।

एक अनुमान…

नदी के तट पर व्याध द्वारा क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डालने पर वाल्मीकि जी के मुंह से व्याध के लिए शाप के जो उद्गार निकले वे लौकिक छंद में एक श्लोक के रूप में थे। इसी छंद में उन्होंने नारद से सुनी राम की कथा के आधार पर रामायण की रचना की। कुछ विद्वानों के अनुसार कि हो सकता है, महाभारत की भांति रामायण भी समय-समय पर कई व्यक्तियों ने लिखी हो और अंतिम रूप किसी एक ने दिया हो और वह वाल्मीकि जी के शिष्य परंपरा का ही हो। यह अनुमान एक कथा की ओर इंकित करती है अथवा वह कथा ही अनुमान के पीछे का एक मुख्य कारण है।

वाल्मीकि डाकू ?

कथाओं में जिस वाल्मीकि के डाकू का जीवन बिताने का उल्लेख मिलता है, उसे रामायण के रचयिता से भिन्न माना जा सकता है। पौराणिक विवरण के अनुसार यह रत्नाकर नाम का दस्यु था और यात्रियों को मारकर उनके धन से अपना परिवार पालता था। एक दिन नारद जी से उसकी भेंट हो गई। जब रत्नाकर डाकू ने उन्हें मारना चाहा तो नारद जी ने पूछा-जिस परिवार के लिए तुम इतने अपराध करते हो, क्या वह तुम्हारे पापों का भागीदार बनने को तैयार है ? (कथा के विस्तार में ना जाते हुए) रत्नाकर डाकू ने नारद जी को पेड़ से बांधकर इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए घर गया। वह यह जानकर स्तब्ध रह गया कि परिवार का कोई भी व्यक्ति उसके पाप का भागीदार बनने को तैयार नहीं है। लौटकर उसने नारद जी के चरण पकड़ लिए और डाकू का जीवन छोड़कर तपस्या करने लगा। इसी में उसके शरीर को दीमकों ने अपना घर बनाकर ढक लिया, जिसके कारण यह भी वाल्मीकि के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

‘मरा’ या ‘राम’…

एक अन्य विवरण के अनुसार इनका नाम अग्निशर्मा था और इन्हें हर बात उलटकर कहने में रस आता था। इसलिए ऋषियों ने इन्हें ‘मरा’ शब्द का जाप करने की राय दी। तेरह वर्ष तक मरा मरा मरा रटते-रटते यही शब्द ‘राम’ हो गया। लोगों के कहे अनुसार बिहार के चंपारन ज़िले का भैंसा लोटन गांव में वाल्मीकि जी का आश्रम था जो अब वाल्मीकि नगर के नाम से जाना जाता है।

इन कथाओं से वाल्मीकि जी की शिष्य परंपरा साफ़ झलकती है, क्यूंकि महर्षि कश्यप के वंश मे दस्यु का होना कुछ खलता है। जिनके बड़े भाई भृगु ऋषि हों और पिता वरुण देव हों। साथ ही वाल्मीकि जी से संबंधित अलग अलग कथाएं, यह सब शिष्य परंपरा को ही दर्शाते हैं। अब जो भी हो, जब सारी नदियां गंगा में मिलकर पवित्र हो रही हों तो उन्हें पृथक करने की क्या जरूरत है।

सार…

भगवान्नाम का निरन्तर जप करते-करते वाल्मीकि अब ऋषि हो गये। उनकी पहले वाली क्रूरता प्राणिमात्र के प्रति दया में बदल गयी। एक दिन इनके सामने एक व्याध ने क्रौंच पक्षी के एक जोड़े में से एक को मार दिया, तब दयालु ऋषि के मुख से व्याध को शाप देते हुए एक श्लोक निकला। वह संस्कृत भाषा में लौकिक छन्दों में प्रथम अनुष्टुप छन्द का श्लोक था। उसी छन्द के कारण वाल्मीकि आदिकवि हुए। इन्होंने ही रामायण रूपी आदिकाव्य की रचना की। वनवास के समय भगवान श्री राम ने स्वयं इन्हें दर्शन देकर कृतार्थ किया। सीता जी ने अपने वनवास का अन्तिम काल इनके आश्रम पर व्यतीत किया। वहीं पर लव और कुश का जन्म हुआ। वाल्मीकि जी ने उन्हें रामायण का गान सिखाया। इस प्रकार नाम-जप और सत्संग के प्रभाव से वाल्मीकि जी डाकू से ब्रह्मर्षि हो गये।

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