May 25, 2024

इतिहास के एक ऐसे अध्याय को मैं Ashwini Rai ‘अरुण’ आज आप के सामने रखने वाला हूं, जो शायद आज से पहले तक किसी अंधेरे बस्ते में रख कहीं छूपा दिया गया था। यह अध्याय एक ऐसे व्यक्ति से संबंध रखता है जिसका जन्म आज ही के दिन अर्थात २९ जनवरी १९०४ को बिरिसल जिले में हुआ था जो उस समय बंगाल प्रेसीडेंसी में आता था जो आज बांग्लादेश में है, वो हमारी नजर में कहीं से भी महानता की श्रेणी में नहीं आता और ना तो वह इतना काबिल ही रहा की इतिहास उसे याद रखता मगर वो इतिहास का हिस्सा है और रहेगा, क्यूंकि उसका कृत्य… लोगों के प्रेरणा का कारक बने अथवा विचार करने की प्रेरणा प्रदान करे। वैसे मैं आप सब से करबद्ध अनुरोध कर रहा हूँ, आप मेरे लेखनी के गलतियों को दरकिनार कर इस आलेख पर ध्यान केंद्रित करेंगे।

जोगेंद्र नाथ मंडल

नमूसूरा समुदाय के एक परिवार के थे जिसे हिंदू व्यवस्था के बाहर माना जाता था लेकिन उसने इसके भीतर एक स्थिति का दावा करने के लिए एक आंदोलन को शुरू कर दिया था।

मंडल ने १९३७ के भारतीय प्रांतीय विधानसभा चुनाव में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में अपनी राजनीतिक कैरियर को शुरू किया। उन्होंने बखरागंज उत्तर पूर्व ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र, बंगाल विधान सभा में एक सीट पर चुनाव लड़ा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की जिला समिति के अध्यक्ष सरकल कुमार दत्ता को पराजित किया। जो स्वदेशी नेता अश्विनी कुमार दत्ता के भतीजे थे।

सुभाष चंद्र बोस और शरतचंद्र बोस दोनों ने इस समय मंडल को काफी प्रभावित किया था। जब उन्हें १९४० में कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया तब मंडल मुस्लिम लीग (एमएल) के साथ जुड़ गए जो उस समय एकमात्र अन्य महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पार्टी थी और एमएल के मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी के मंत्रिमंडल में एक मंत्री भी बने।

यही वह समय था जब मंडल और भीमराव अांबेडकर जी ने अनुसूचित जाती संघ की बंगाल शाखा की स्थापना की और जो स्वयं राजनीतिक सत्ता की इच्छा रखते थे। जबकी नमूसूरा समुदाय को हिंदू महासभा के द्वारा मान्यता दी गई थी और प्रांत की राजनीति में दलित और मुस्लिम लोगों का वर्चस्व भी स्थापित था। मंडल ने सांप्रदायिक मामलों, कांग्रेस और एमएल से जुड़े राजनैतिक विवादों के बीच के अंतर को देखा। जब १९४६ में दंगे फैल गए तो उसने पूर्वी बंगाल के चारों ओर यात्रा की ताकि दलितों को मुसलमानों के खिलाफ हिंसा में भाग न लेने का आग्रह किया जाए। उसने तर्क दिया कि एमएल के साथ अपने विवाद में कांग्रेस हमे इस्तेमाल कर रहा है।

१५ अगस्त १९४७ को ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद, मंडल पाकिस्तान के संविधान सभा के सदस्य और अस्थायी अध्यक्ष बने, साथ ही कानून और श्रम के लिए नए देश के पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने पर सहमत हो गए। पाकिस्तान सरकार में वह १९४७ से १९५० तक उच्चतम स्थान पाने वाला पहले हिंदू सदस्य रहे।

१९५० में, पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को अपना इस्तीफा देने के बाद मंडल वापस भारत लौट आये, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन के विरोधी हिंदू पूर्वाग्रह का हवाला दिया गया था। उन्होंने अपने इस्तीफे पत्र में सामाजिक अन्याय और गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार से संबंधित घटनाओं का उल्लेख किया।

जब पाकिस्तान बना तो लाखो दलित पाकिस्तान चले गये जिन्हें विश्वास था की वहां के मुसलमान उनका साथ देंगे, उन्हें अपनाएंगे। लेकिन उनके साथ क्या हुआ यह जानना जरूरी है। दिल दहला देने वाली इस सच्चाई को वहां के कानून मंत्री ने स्वयं ही लिखा है, जो आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ।

मंडल ने अपने खत में लिखा, ‘बंगाल में मुस्लिम और दलितों की एक जैसी हालात थी। दोनों ही पिछड़े, मछुआरे,अशिक्षित थे। मुझे आश्वस्त किया गया था लीग के साथ मेरे सहयोग से ऐसे कदम उठाये जायेंगे जिससे बंगाल की बड़ी आबादी का भला होगा। हम मिलकर ऐसी आधारशिला रखेंगे जिससे साम्प्रदायिक शांति और सौहादर्य बढ़ेगा। इन्ही कारणों से मैंने मुस्लिम लीग का साथ दिया। पाकिस्तान के निर्माण के लिये मुस्लिम लीग ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ मनाया। जिसके बाद बंगाल में भीषण दंगे हुए। कलकत्ता के नोआखली नरसंहार में पिछड़ी जाति समेत कई हिन्दुओ की हत्याएं हुई, सैकड़ों ने इस्लाम कबूल लिया। हिंदू महिलाओं का बलात्कार, अपहरण किया गया। इसके बाद मैंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया। मैने हिन्दुओ के भयानक दुःख देखे जिनसे अभिभूत हूँ लेकिन फिर भी मैंने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग की नीति को जारी रखा ।

१४ अगस्त १९४७ को पाकिस्तान बनने के बाद मुझे मंत्रीमंडल में शामिल किया गया। मैंने ख्वाजा नजीममुद्दीन से बात कर ईस्ट बंगाल की कैबिनेट में दो पिछड़ी जाति के लोगो को शामिल करने का अनुरोध किया। उन्होंने मुझसे ऐसा करने का वादा किया। लेकिन इसे टाल दिया गया जिससे मै बहुत हताश हुआ।

मंडल ने अपने खत में पाकिस्तान में दलितों पर हुए अत्याचार की कई घटनाओं जिक्र किया उन्होंने लिखा, ‘गोपालगंज के पास दीघरकुल में मुस्लिम की झूठी शिकायत पर स्थानीय नमो शूद्राय लोगो के साथ क्रूर अत्याचार किया गया। पुलिस के साथ मिलकर मुसलमानों ने मिलकर नमोशूद्राय समाज के लोगो को पीटा, घरों में छापे मारे। एक गर्भवती महिला की इतनी बेरहमी से पिटाई की गयी कि उसका मौके पर ही गर्भपात हो गया निर्दोष हिन्दुओ विशेष रूप से पिछड़े समुदाय के लोगो पर सेना और पुलिस ने भी हिंसा को बढ़ावा दिया। सयलहेट जिले के हबीबगढ़ में निर्दोष पुरुषो और महिलाओं को पीटा गया। सेना ने न केवल लोगो को पीटा बल्कि हिंदू पुरुषो को उनकी महिलाओं को सैन्य शिविरों में भेजने पर मजबूर किया ताकि वो सेना की कामुक इच्छाओं को पूरा कर सके। मैं इस मामले को आपके संज्ञान में लाया था, मुझे इस मामले में रिपोर्ट के लिये आश्वस्त किया गया लेकिन रिपोर्ट नहीं आई ।

खुलना जिले कलशैरा में सशस्त्र पुलिस, सेना और स्थानीय लोगो ने निर्दयता से पुरे गाँव पर हमला किया। कई महिलाओं का पुलिस, सेना और स्थानीय लोगो द्वारा बलात्कार किया गया। मैने २८ फरवरी 1950 को कलशैरा और आसपास के गांवों का दौरा किया। जब मैं कलशैरा में आया तो देखा यहाँ जगह उजाड़ और खंडहर में बदल गयी है। यहाँ तकरीबन ३५० घरों को ध्वस्त कर दिया गया था। मैंने तथ्यों के साथ आपको सूचना दी।

ढाका में नौ दिनों के प्रवास के दौरान मैने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया। ढाका नारायणगंज और ढाका चंटगाँव के बीच ट्रेनों और पटरियों पर निर्दोष हिन्दुओ की हत्याओं ने मुझे गहरा झटका दिया। मैंने ईस्ट बंगाल के मुख्यमंत्री से मुलाकात कर दंगा प्रसार को रोकने के लिये जरूरी कदमों को उठाने का आग्रह किया। २० फरवरी १९५० को मैं बरिसाल पहुंचा। यहाँ की घटनाओं के बारे में जानकर मैं चकित था, यहाँ बड़ी संख्या में हिन्दुओ को जला दिया गया था। उनकी बड़ी संख्या को खत्म कर दिया गया। मैंने जिले में लगभग सभी दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया । मधापाशा में जमींदार के घर में २०० लोगो की मौत हुई और ४० घायल थे। एक जगह है मुलादी प्रत्यक्षदर्शी ने यहाँ भयानक नरक देखा। यहाँ ३०० लोगो का कत्लेआम हुआ था। वहां गाँव में शवो के कंकाल भी देखे नदी किनारे गिद्द और कुत्ते लाशो को खा रहे थे। यहाँ सभी पुरुषो की हत्याओं के बाद लड़कियों को आपस में बाँट लिया गया। राजापुर में 60 लोग मारे गये। बाबूगंज में हिन्दुओ की सभी दुकानों को लूट आग लगा दी गयी ईस्ट बंगाल के दंगे में अनुमान के मुताबिक १०००० लोगो की हत्याएं हुई। अपने आसपास महिलाओं और बच्चो को विलाप करते हुए मेरा दिल पिघल गया । मैंने अपने आप से पूछा, ‘क्या मै इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान आया था ।”

मंडल ने अपने खत में आगे लिखा, ‘ईस्ट बंगाल में आज क्या हालात हैं? विभाजन के बाद ५ लाख हिन्दुओ ने देश छोड़ दिया है। मुसलमानों द्वारा हिंदू वकीलों, हिंदू डॉक्टरों, हिंदू व्यापारियों, हिंदू दुकानदारों के बहिष्कार के बाद उन्हें आजीविका के लिये पलायन करने के लिये मजबूर होना पड़ा। मुझे मुसलमानों द्वारा पिछड़ी जाती की लडकियों के साथ बलात्कार की जानकारी मिली है। हिन्दुओ द्वारा बेचे गये सामान की मुसलमान खरीददार पूरी कीमत नहीं दे रहे हैं। तथ्य की बात यह है पाकिस्तान में न कोई न्याय है, न कानून का राज इसीलिए हिंदू चिंतित हैं ।

पूर्वी पाकिस्तान के अलावा पश्चिमी पाकिस्तान में भी ऐसे ही हालात हैं। विभाजन के बाद पश्चिमी पंजाब में १ लाख पिछड़ी जाति के लोग थे उनमे से बड़ी संख्या को बलपूर्वक इस्लाम में परिवर्तित किया गया है। मुझे एक लिस्ट मिली है जिसमे ३६३ मंदिरों और गुरूद्वारे मुस्लिमों के कब्जे में हैं। इनमे से कुछ को मोची की दुकान, कसाईखाना और होटलों में तब्दील कर दिया है मुझे जानकारी मिली है सिंध में रहने वाली पिछड़ी जाति की बड़ी संख्या को जबरन मुसलमान बनाया गया है। इन सबका कारण एक ही है। हिंदू धर्म को मानने के अलावा इनकी कोई गलती नहीं है ।

जोगेंद्र नाथ मंडल ने अंत में लिखा, ‘पाकिस्तान की पूर्ण तस्वीर तथा उस निर्दयी एवं कठोर अन्याय को एक तरफ रखते हुए, मेरा अपना तजुर्बा भी कुछ कम दुखदायी, पीड़ादायक नहीं है। आपने अपने प्रधानमंत्री और संसदीय पार्टी के पद का उपयोग करते हुए मुझसे एक वक्तव्य जारी करवाया था, जो मैंने 8 सितम्बर को दिया था । आप जानतें हैं मेरी ऐसी मंशा नहीं थी कि मै ऐसे असत्य और असत्य से भी बुरे अर्धसत्य भरा वक्तव्य जारी करूं। जब तक मै मंत्री के रूप में आपके साथ और आपके नेतृत्व में काम कर रहा था मेरे लिये आपके आग्रह को ठुकरा देना मुमकिन नहीं था पर अब मै इससे ज्यादा झूठे दिखाबे तथा असत्य के बोझ को अपनी अंतरात्मा पर नहीं लाद सकता। मैने यह निश्चय किया कि मै आपके मंत्री के तौर पर अपना इस्तीफे का प्रस्ताव आपको दूँ, जो कि मै अब आपके हाथों में थमा रहा हूँ। मुझे उम्मीद है आप बिना किसी देरी के इसे स्वीकार करेंगे। आप बेशक इस्लामिक स्टेट के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए इस पद को किसी को देने के लिये स्वतंत्र हैं ।

पाकिस्तान में मंत्रिमंडल से इस्तीफे के बाद जोगेंद्र नाथ मंडल भारत आ गये। कुछ वर्ष गुमनामी की जिन्दगी जीने के बाद ५ अक्टूबर १९६८ को पश्चिम बंगाल में उन्होंने अंतिम सांस ली।

अब बस…
धन्यवाद !

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