February 23, 2024

जयपुर के महाराज प्रतापसिंह ‘ब्रजनिधि’ यानी सवाई प्रताप सिंह जी का जन्म २ दिसम्बर, १७६४ को राजस्थान, जयपुर के पिता महाराज माधोसिंह प्रथम एवं महारानी माजी के यहां हुआ था।

परिचय…

सवाई प्रताप सिंह जी जब मात्र चौदह वर्ष के थे तभी उन्हें सिंहासनारूढ़ होना पड़ा था। युद्धों में अत्यधिक व्यस्त एवं रोगों से ग्रस्त होने पर भी उन्होंने अपने अल्प आयु में ही लगभग १४०० वृत्तों का प्रणयन किया। लोगों द्वारा कहे अनुसार कि महाराज परम भागवत थे। भक्ति-रस-तरंग अथवा मन की उमंग में वे जो पद, रेखते अथवा छंद रचते, उन्हें उसी दिन या अगले दिन अपने इष्टदेव गोविंददेव तथा ठाकुर ब्रजनिधि महाराज को समर्पित करते थे। कम से कम पाँच वृत्त नित्य भेंट करने का उनका अपना नियम था।

रचनाएँ…

सभी रचनाएं तो नहीं लेकिन २२ रचनाएँ आज भी उपलब्ध हैं। परन्तु सोरठ ख्याल, (३६ चरण की एक लघु रचना) उनके किसी पदसंग्रह का ही एक अंश जान पड़ती है। उनके २२ रचनाओं को हम उनके स्वतंत्र अस्तित्व एवं काल क्रम के अनुसार यहां दे रहे हैं…

विरचित- प्रेमप्रकाश, फाग रंग, प्रीतिलता – वर्ष १८४८;

प्रणीत- सुहागरैनि – वर्ष १८४९;

लिखित – विरहसरिता, रेखतासंग्रह, स्नेहबिहार – वर्ष १८५०;

रचित- रमक-जमक-बतीसी, प्रीतिपचीसी, ब्रजशृंगार – वर्ष १८५१;

कृत- सनेहसंग्राम, नीतिमंजरी, शृंगारमंजरी, वैराग्यमंजरी – वर्ष १८५२;

रंगचौपड़ – वर्ष १८५३;

प्रेमपंथ, दुखहरनवेलि, रास का रेखता, श्रीब्रजनिधिमुक्तावली, ब्रजनिधि-पद-संग्रह, तथा हरिपदसंग्रह, इन शीर्षक छह कृतियों का रचनाकाल कविवर महाराज ने नहीं दिया है। लेकिन संख्या इनकी बाईस है अतः इन्हें “ग्रंथबाईसी” कहते थे।

तीनों मंजरियाँ भर्तृहरि के शतकत्रय, क्रमश: “नीतिशतक”, “शृंगारशतक” एवं “वैराग्यशतक” का ब्रजभाषा में पद्यानुवाद हैं। अन्य रचनाओं में राधा-गोविंद तथा ब्रजनिधि की भक्ति, उनका लीलाविहार, विरहव्यथा, उद्धव के प्रति गोपियों की उक्तियाँ, कुब्जा की निंदा, कवि का दैन्य एवं भक्तिसंपृक्त मनोभाव दर्शाए गए हैं। वस्तुत: कृष्ण राधा का वैभवसंपन्न रूप, नीति के पद तथा चौपड़ का खेल, स्नेह संग्राम तथा यत्र तत्र शस्त्रास्त्रों की उपमाएँ जहाँ ब्रजनिधि की राजोचित प्रवृत्तियाँ प्रदर्शित करती हैं, वहाँ कृष्ण के नटवर रूप के प्रति आकर्षण के ब्रजरज, यमुना, गोकुल, मथुरानिवास उनकी अनन्य भक्ति के परिचायक हैं। शांत रस के अतिरिक्त इन रचनाओं में वात्सल्य, शृंगार और हास्य रस के सुंदर उदाहरण मिलते हैं। कवि महाराज ने अधिकतर ब्रजभाषा का प्रयोग किया है किंतु कई एक पद राजस्थानी और पंजाबी में भी हैं।

कविवर महाराज ने अपने काव्य में अपने पूर्ववर्ती एवं समकालिक कवियों के लगभग १०० पदों को भी संगृहीत किए हैं। घनानंद और नागरीदास का इनपर स्पष्ट प्रभाव दिखाई पड़ता है। कई एक कवि आपके आश्रित थे। विश्वेश्वर महाशब्दे, बुधप्रकाश, भारतीय, रसपुंज, रसराज आदि विद्वानों ने आपकी प्रेरणा से संगीत, ज्योतिष, वैद्यक और काव्यग्रंथों का प्रणयन भी किया। फारसी के “आइने अकबरी” और “दीवान-ए-हाफिज” का भी हिंदी अनुवाद हुआ।

संगीत प्रेमी…

कविवर महाराज सवाई प्रताप सिंह जी संगीत प्रेमी थे। उनके उस्ताद थे चाँदखाँ उर्फ दलखाँजी, जो बुधप्रकाश के नाम से प्रसिद्ध हैं। अन्यत्र दोहा, सोरठा, कवित्त, सवैया, कुंडलियाँ, छप्पै, चौपाई, बरवै, रेख़्ता प्रयुक्त हुए हैं। उनके काव्य में अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, श्लेष प्रभृति अलंकार अनायास ही आ गए हैं।

अंत में एक और परिचय…

१ अगस्त, १८०३ को जयपुर के कवि श्रेष्ठ महाराजा का निधन हो गया। वे राजा थे मगर इसके ठीक उलट हिंदी भाषा के प्रकांड विद्वान और कवि तो थे ही साथ ही व्रज, राजस्थानी एवं पंजाबी भाषा के भी कवि थे। उन्होंने जो भी काव्य रचना की उसमें उन्होंने अपना उपनाम ‘ब्रजनिधि’ प्रयुक्त किया है। इनके अलावा प्रताप सिंह ‘ब्रजनिधि’ ने भवन निर्माण के क्षेत्र में भी काफ़ी रुचि दिखा। चंद्रमहल के कई विशाल भवन रिध·सिध पोल, बड़ा दीवानखाना, गोविंद जी के पिछाड़ी का हौज, हवामहल, गोवर्धननाथ, ब्रजराज बिहारी, ठाकुर ब्रजनिधि तथा मदनमोहन जी के मंदिर आपके स्थापत्य कलाप्रेम के द्योतक हैं।

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