May 25, 2024

‘कादम्बिनी’ नाम तो सुना होगा, सरिता?, नंदन? ये नाम तो सुने ही होंगे। ये नाम स्तरीय पत्रिकाओं के हैं, जो कभी इतनी प्रसिद्ध थीं की पहली एडिशन हाथो हांथ निकल जाती थीं। अगर हम सिर्फ कादम्बिनी की ही बात करें तो, उसने किसी समय में बिक्री के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए थे, और ऐसा हुआ था कादम्बिनी के कालचिन्तन कॉलम की वजह से। जिसके लेखक थे…

श्री राजेन्द्र अवस्थी जी

जिनकी लेखनी का करिश्मा ही था कि मृतप्राय: पत्रिकाओं के दौर में भी ‘कादम्बिनी’ साँस लेती रही। उनके कुशल संपादन और दूरदर्शिता का ही उदाहरण था कि रहस्य, रोमांच, भूत-प्रेत, आत्माओं, रत्न-जवाहरात, तंत्र-मंत्र-यंत्र व कापालिक सिद्ध‍ियों जैसे विषय को भी गहरी पड़ताल, अनूठे विश्लेषण और अद्भुत तार्किकता के साथ वे पेश करते थे।

अवस्थी जी ने ‘कादम्बिनी’ के ऐसे अनूठे और अदभुत विशेषांक निकाले, जो सुधी पाठकों के पुस्तक-संग्रह में अपना स्थान बनाने में सफल हो गए। ‘रिडर्स डाइजेस्ट’ ‘सर्वोत्तम’ जैसी पत्रिकाओ की बराबरी अगर कोई पत्रिका कर सकती थी तो वह सिर्फ ‘कादम्बिनी’ ही थी। हां ‘नवनीत’ भी थी मगर इसे इस कड़ी में दूसरे स्थान पर रखी जा सकती है। ‘हर दिन होत ना एक समाना’ समय बदला और इसके बदलने के साथ ‘कादम्बिनी’ की विषयवस्तु भी सिमटने लगी थी, मगर गुणवत्ता में वह हमेशा शीर्ष पर रही। अवस्थी जी के संपादकीय व्यक्तित्व का प्रभाव ‘कादम्बिनी’ के अलावा अनन्य पत्र-पत्रिकाओं जैसे ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘सरिता’, ‘नंदन’ जैसी स्तरीय पत्रिकाओं में भी बखूबी देखी जा सकती थी।

पिता धनेश्वर प्रसाद एवं माता बेटी बाई की संतान राजेन्द्र अवस्थी जी का जन्म मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के ज्योतिनगर गढा इलाके में २५ जनवरी १९३० को हुआ था। जबलपुर में ही उनकी प्राथमिक शिक्षा हुई थी। वर्ष १९५० से १९५७ तक उन्होंने कलेक्ट्रेट में लिपिक के पद पर नौकरी की, लेकिन वर्ष १९५७ के आखिरी महीनों में वे पत्रकारिता के क्षेत्र में आए। उन्होंने कई समाचारपत्रों सहित प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन भी किया। वे १९६० तक जबलपुर में रहे इसके बाद दिल्ली चले गए। दिल्ली में रहते हुए उन्होंने जमीन से जुड़ी सामाजिक विसंगतियों को उजागर करने वाले कई साहित्यों की रचाना और साथ ही पत्रकारिता में भी सक्रिय रहे।

कथाकार और पत्रकार होने के साथ ही, सांस्कृतिक राजनीति तथा सामयिक विषयों पर लगातार लिखते रहे और यह कोई तभी कर सकता है जब उसकी समझ उस विषय पर सही हो। अपनी लेखनी के लिए अवस्थी जी सदा देश विदेश की यात्रा पर रहा करते थे। दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं जहाँ वे अनेको बार ना गए हों। इसीलिए तो उन्हें विश्व यात्री कहा जाता था। आश्चर्य की बात तो यह थी की उन्होने अपनी यात्रा और लेखनी में किस तरह से संतुलन बैठाया होगा। उनदिनों में अनेक दैनिक समाचार-पत्रों तथा पत्रिकाओं में उनके लेख प्रमुखता से छपते रहते थे। उनकी बेबाक टिप्पणियाँ अनेक बार आक्रोश और विवाद को भी जन्म देती रहीं, लेकिन अवस्थी जी कभी भी अपनी बात कहने से नहीं चूकते थे।

आज राजेन्द्र अवस्थी जी नहीं हैं मगर उनकी कलम के कायल सभी थे। हम जैसे नए कलमकारों के लिए अवस्थी जी सदा प्रेरणा के श्रोत बने रहेंगे। अवस्थी जी के कलम की स्याही के कुछ छींटे भी अश्विनी राय ‘अरुण’ पर गिर जाते तो वह कृतार्थ हो जाता।

धन्यवाद !

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