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रोज केरकेट्टा – शूट२पेन
February 29, 2024

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, राँची विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त एवं आदिवासी भाषा खड़िया और हिन्दी की एक प्रमुख लेखिका, शिक्षाविद्, आंदोलनकारी और मानवाधिकारकर्मी रोज केरकेट्टा का जन्म ५ दिसंबर, १९४० को झारखंड के सिमडेगा अंर्तगत कइसरा सुंदरा टोली गांव में खड़िया आदिवासी समुदाय में हुआ था।

परिचय…

रोज केरकेट्टा झारखंड की पांच प्रमुख आदिवासी समुदायों में से एक खड़िया से आती हैं। उनकी माताजी का नाम मर्था केरकेट्टा और पिताजी का नाम एतो खड़िया उर्फ प्यारा केरकेट्टा था। उनके पिताजी शिक्षक, समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ और सांस्कृतिक अगुआ थे। जिनका प्रभाव रोज पर पड़ा। वे अपने पिता के मार्ग पर चल निकलीं, उनकी तरह रोज ने भी आजीविका के लिए शिक्षकीय जीवन को अपनाया। उनका विवाह सुरेशचंद्र टेटे से हुआ। जिनसे उनको वंदना टेटे और सोनल प्रभंजन टेटे दो बच्चे हैं। वंदना टेटे अपने नाना प्यारा केरकेट्टा और मां की तरह ही कालांतर में झारखंड आंदोलन से जुड़ गईं और पिछले ३० वर्षों से सामाजिक-सांस्कृतिक व साहित्यिक क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गुमला जिला के कोंडरा एवं जिला सिमडेगा से हुई। उन्होंने स्नातक सिमडेगा कॉलेज से पूरा किया और एम.ए. रांची विश्वविद्यालय से किया। ‘खड़िया लोक कथाओं का साहित्यिक और सांस्कृतिक अध्ययन’ विषय पर डा. दिनेश्वर प्रसाद जी के मार्गदर्शन में उन्होंने पीएच.डी. पूरा किया।

अपनी शिक्षा के दौरान एवं शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात् वे शिक्षण कार्य में जुट गईं। वे शिक्षण कार्य हेतु वर्ष १९६६ में वे माध्यमिक विद्यालय लड़बा, वर्ष १९७१·७२ में सिमडेगा कॉलेज, वर्ष १९७६ में पटेल मौन्टेसरी स्कूल, एच.ई.सी. रांची तथा वर्ष १९७७ से १९८२ तक सिसई के बी.एन. जालान कॉलेज, वर्ष १९८२ से दिसंबर २००० तक जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, रांची विश्वविद्यालय, रांची (झारखंड) से क्रमशः जुड़ती रहीं। यह तो हुई शिक्षण संस्थानों की बात, इसके इतर उन्होंने ग्रामीण, पिछड़ी, दलित, आदिवासी, बिरहोड़ एवं शबर आदिम जनजाति महिलाओं के बीच शिक्षा एवं जागरूकता के लिए विशेष प्रयास किया।

कार्य मूल्यांकन…

१. झारखंड एवम बिहार शिक्षा परियोजना सहित अनेक शैक्षणिक एवं सामाजिक संस्थाओं का मूल्यांकन
२. झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन (जे.पी.एस.सी.)
३. युनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यू.जी.सी.)
४. अब तक पांच पीएच.डी. शोध उपाधियों (२ संताली, कुड़ुख, खड़िया और नागपुरी एक-एक) का निदेशन
५. शांति निकेतन विश्वविद्यालय में इंटरव्यूवर

सामाजिक क्षेत्र में भागीदारी…

विगत ५० वर्षों से भी अधिक समय से शिक्षा, सामाजिक विकास, मानवाधिकार और आदिवासी महिलाओं के समग्र उत्थान के लिए व्यक्तिगत, सामूहिक एवं संस्थागत स्तर पर सतत सक्रिय। अनेक राज्य स्तरीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ जुड़ाव। आदिवासी, महिला, शिक्षा और साहित्यिक विषयों पर आयोजित सम्मेलनों, आयोजनों, कार्यशालाओं एवं कार्यक्रमों में व्याख्यान व मुख्य भूमिका के लिए आमंत्रित।

१. झारखंड नेशनल एलायंस ऑफ वीमेन, रांची (झारखंड)
२. जुड़ाव, मधुपुर, संताल परगना (झारखंड)
३. बिरसा, चाईबासा (झारखंड)
आदिम जाति सेवा मंडल, रांची (झारखंड)
४. झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा (झारखंड)
५. प्यारा केरकेट्टा फाउण्डेशन, रांची (झारखंड) की संस्थापक सदस्य आदि अनेक संगठनों व संस्थाओं से जुड़ाव।

(क) राज्य स्तर पर भागीदारी :

१. झारखंड आदिवासी महिला सम्मेलन की संस्थापक और १९८६ से १९८९ तक अन्य संस्थाओं एवं संगठनों के सहयोग से उसका संयोजन एवम संचालन
२. वर्ष २००० से २००६ तक झारखंड गैर-सरकारी महिला आयोग की अध्यक्ष

(ख) राष्ट्रीय स्तर पर भागीदारी :

१. राष्ट्रीय नारी मुक्ति संघर्ष सम्मेलन, पटना, रांची और कोलकाता
२. रांची सम्मेलन का संयोजन
३. मानवाधिकार पर मुम्बई, बंगलोर, दिल्ली, कोलकाता और छत्तीसगढ़

(ग) अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भागीदारी :

१. एशिया पैसिफिक वीमेन लॉ एंड डेवलेपमेंट कार्यशाला, चेन्नई १९९३ में
२. बर्लिन में आयोजित आदिवासी दशक वर्ष के उद्घाटन समारोह १९९४ में
३. वर्ल्ड सोशल फोरम में
४. इंडियन सोशल फोरम में

पाठ्यक्रम योगदान…

१. पाठ्यक्रम निर्माण, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, रांची विश्वविद्यालय
२. खड़िया प्राइमर निर्माण, एन.सी.ई.आर.टी., नई दिल्ली
३. खड़िया भाषा ध्वनिविज्ञान, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर

कुछ प्रमुख कृतियां…

१. खड़िया लोक कथाओं का साहित्यिक और सांस्कृतिक अध्ययन (शोध ग्रंथ)
२. प्रेमचंदाअ लुङकोय (प्रेमचंद की कहानियों का खड़िया अनुवाद)
३. सिंकोय सुलोओ, लोदरो सोमधि (खड़िया कहानी संग्रह),
४. हेपड़ अवकडिञ बेर (खड़िया कविता एवं लोक कथा संग्रह)
५. खड़िया निबंध संग्रह
६. खड़िया गद्य-पद्य संग्रह
७. प्यारा मास्टर (जीवनी)
८. पगहा जोरी-जोरी रे घाटो (हिंदी कहानी संग्रह)
९. जुझइर डांड़ (खड़िया नाटक संग्रह)
१०. सेंभो रो डकई (खड़िया लोकगाथा)
११. खड़िया विश्वास के मंत्र (संपादित),
१२. अबसिब मुरडअ (खड़िया कविताएं)
१३. स्त्री महागाथा की महज एक पंक्ति (निबंध)
१४. बिरुवार गमछा तथा अन्य कहानियां (हिंदी कहानी संग्रह) आदि।

विगत कई वर्षों से झारखंडी महिलाओं की त्रैमासिक पत्रिका ‘आधी दुनिया’ का संपादन। इसके अतिरिक्त विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से सभी सृजनात्मक विधाओं में हिन्दी एवं खड़िया भाषाओं में सैंकड़ों रचनाएँ प्रकाशित एवं प्रसारित।

अपनी बात…

झारखंड की आदि जिजीविषा और समाज के महत्वपूर्ण सवालों को सृजनशील अभिव्यक्ति देने के साथ ही जनांदोलनों को बौद्धिक नेतृत्व प्रदान करने तथा संघर्ष की हर राह में वे अग्रिम पंक्ति में रही हैं। आदिवासी भाषा एवम साहित्य, संस्कृति और स्त्री सवालों पर डा. केरकेट्टा ने कई देशों की यात्राएं की हैं और राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं।

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