June 13, 2024

एक युवा संन्यासी के रूप में महान भारतीय संस्कृति की सुगंध को विदेशों में बिखेरने वाले साहित्य, दर्शन और इतिहास के प्रकाण्ड ज्ञाता नरेंद्रनाथ दत्त ने हिन्दू धर्म को गतिशील तथा व्यावहारिक बनाया और साथ ही सुदृढ़ सभ्यता के निर्माण के लिए आधुनिक मानव से पश्चिमी विज्ञान व भौतिकवाद को भारत की आध्यात्मिक संस्कृति से जोड़ने का आग्रह किया। आप उन्हें भली भांति जानते हैं, वे कलकत्ता के एक कुलीन परिवार में जन्में थे। उनमें चिंतन, भक्ति व तार्किकता, भौतिक एवं बौद्धिक श्रेष्ठता के साथ-साथ संगीत की प्रतिभा का एक विलक्षण संयोग थे। कालांतर में संसार उन्हें स्वामी विवेकानन्द के नाम से जानने लगा और भारत में उनके जन्म दिवस को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। अब विस्तार से…

परिचय…

विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में आस्था रखने वाले एक कुलीन व्यक्ति थे और उन्हीं के घर उत्पन्न होने वाले उनका पुत्र नरेन्द्र दत्त पाश्चात्य जगत् को भारतीय तत्वज्ञान का सन्देश सुनाने वाला महान् विश्व-गुरु बना और जो कालांतर में स्वामी विवेकानन्द के नाम जाना गया। स्वामी जी का जन्म १२ जनवरी, १८६३ में कलकत्ता में कलकत्ता हुआ। बात को आगे ले जाने से पूर्व रोमा रोलाँ ने नरेन्द्र दत्त (भावी विवेकानन्द) के सम्बन्ध में जो कहा वह देख लें, “उनका बचपन और युवावस्था के बीच का काल योरोप के पुनरुज्जीवन-युग के किसी कलाकार राजपूत्र के जीवन-प्रभात का स्मरण दिलाता है।” बचपन से ही नरेन्द्र में आध्यात्मिक पिपासा थी। वर्ष १८८४ में पिता की मृत्यु के पश्चात् परिवार के भरण-पोषण का भार उन पर आ गया। समय न हो एक समान, एक कुलीन परिवार के कमाऊ व्यक्ति के जाते ही परिवार पर मानों वज्र आ गिरा। मगर दुर्बल आर्थिक स्थिति में भी स्वयं भूखे रहकर अतिथियों के सत्कार की गौरव-गाथा उनके व उनके परिवार का उज्ज्वल अध्याय है। नरेन्द्र में प्रतिभा तो अपूर्व थी, पर उन्हें वह अर्थौपार्जन में नहीं लगाना चाहते थे। उन्होंने बचपन में ही दर्शनों का अध्ययन कर लिया था। ब्रह्मसमाज में भी वे गये, पर वहाँ उनकी जिज्ञासा शान्त न हुई। प्रखर बुद्धि साधना में समाधान न पाकर नास्तिक हो चली।

शिक्षा…

वर्ष १८७१ में, आठ साल की उम्र में, नरेन्द्रनाथ ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में दाखिला लिया जहाँ वे स्कूल गए। वर्ष १८७७ में उनका परिवार रायपुर चला गया। वर्ष १८७९ में, कलकत्ता में अपने परिवार की वापसी के बाद, वह एकमात्र छात्र थे जिन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में प्रथम डिवीजन अंक प्राप्त किये।

वे दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य सहित अन्य विषयों के जिज्ञासु पाठक थे। इनकी वेद, उपनिषद, भगवद् गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त अनेक हिन्दू शास्त्रों में गहन रूचि थी। नरेंद्र को भारतीय शास्त्रीय संगीत में भी प्रशिक्षित किया गया था और वे नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम में व खेलों में भाग लिया करते थे। नरेंद्र ने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जनरल असेम्बली इंस्टिटूशन (अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में किया। वर्ष १८८१ में इन्होंने ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण की और वर्ष १८८४ में कला स्नातक की डिग्री पूरी कर ली।

नरेन्द्र ने डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, जोहान गोटलिब फिच, बारूक स्पिनोज़ा, जोर्ज डब्लू एच हेजेल, आर्थर स्कूपइन्हार, ऑगस्ट कॉम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन के कामों का अध्ययन किया। उन्होंने स्पेंसर की किताब एजुकेशन का वर्ष १८६० में बंगाली भाषा में अनुवाद किया। ये हर्बर्ट स्पेंसर के विकासवाद से काफी प्रभावित थे। पश्चिम के दार्शनिकों के अध्यन के साथ ही इन्होंने संस्कृत ग्रंथों और बंगाली साहित्य को भी सीखा। इस विषय पर विलियम हेस्टी (महासभा संस्था के प्रिंसिपल) ने लिखा है कि, “नरेन्द्र वास्तव में एक जीनियस है। मैंने काफी विस्तृत और बड़े इलाकों में यात्रा की है लेकिन उनके जैसी प्रतिभा वाला का एक भी बालक कहीं नहीं देखा यहाँ तक की जर्मन विश्वविद्यालयों के दार्शनिक छात्रों में भी नहीं।” अनेक बार इन्हें श्रुतिधर(विलक्षण स्मृति वाला एक व्यक्ति) भी कहा गया है।

आध्यात्मिक शिक्षुता – ब्रह्म समाज का प्रभाव…

वर्ष १८८० की बात है, रामकृष्ण परमहंस के प्रभाव से ईसाई धर्म से हिन्दू धर्म में परिवर्तित हुए केशव चंद्र सेन की नव विधान में नरेंद्र शामिल हुए। जहां से वे सुव्यवस्थित, युक्तिसंगत, अद्वैतवादी अवधारणाओं, धर्मशास्त्र, वेदांत और उपनिषदों के एक चयनात्मक और आधुनिक ढंग से अध्यन की ओर आकर्षित हुए।

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