July 24, 2024

शालिहोत्र ऋषि को पशुचिकित्सा का जनक माना जाता है। उन्होंंने एक ‘शालिहोत्रसंहिता’ नामक ग्रन्थ की रचना की थी। वे श्रावस्ती के निवासी थे।

 

परिचय…

संसार के इतिहास में घोड़े पर लिखी गई प्रथम पुस्तक शालिहोत्रसंहिता है, जिसे शालिहोत्र ऋषि ने महाभारत काल से भी बहुत समय पूर्व में कभीलिखा था। कहा जाता है कि शालिहोत्र द्वारा अश्वचिकित्सा पर लिखत प्रथम पुस्तक होने के कारण प्राचीन भारत में पशुचिकित्सा विज्ञान को ‘शालिहोत्रशास्त्र’ नाम दिया गया। शालिहोत्रसंहिता का वर्णन आज संसार की अश्वचिकित्सा विज्ञान पर लिखी गई पुस्तकों में दिया जाता है। भारत में अनिश्चित काल से देशी अश्वचिकित्सक को ‘शालिहोत्री’ कहा जाता रहा है।

 

घोड़ों के प्रकार…

शालिहोत्रसंहिता में ४८ प्रकार के घोड़े बताए गए हैं। इस पुस्तक में घोड़ों का वर्गीकरण बालों के आवर्तों के अनुसार किया गया है। इसमें लंबे मुँह और बाल, भारी नाक, माथा और खुर, लाल जीभ और होठ तथा छोटे कान और पूँछवाले घोड़ों को उत्तम माना गया है। मुँह की लंबाई २ अंगुल, कान ६ अँगुल तथा पूँछ २ हाथ लिखी गई है। घोड़े का प्रथम गुण ‘गति का होना’ बताया है। उच्च वंश, रंग और शुभ आवर्तोंवाले अश्व में भी यदि गति नहीं है, तो वह बेकार है। शरीर के अंगों के अनुसार भी घोड़ों के नाम, त्रयण्ड (तीन वृषण वाला), त्रिकर्णिन (तीन कानवाला), द्विखुरिन (दोखुरवाला), हीनदंत (बिना दाँतवाला), हीनांड (बिना वृषणवाला), चक्रवर्तिन (कंधे पर एक या तीन अलकवाला), चक्रवाक (सफेद पैर और आँखोंवाला) दिए गए हैं। गति के अनुसार तुषार, तेजस, धूमकेतु, एवं ताड़ज नाम के घोड़े बताए हैं। इस ग्रन्थ में घोड़े के शरीर में १२,००० शिराएँ बताई गई हैं। बीमारियाँ तथा उनकी चिकित्सा आदि, अनेक विषयों का उल्लेख पुस्तक में किया गया है, जो इनके ज्ञान और रुचि को प्रकट करता है। इसमें घोड़े की औसत आयु ३२ वर्ष बताई गई है।

 

शालिहोत्रशास्त्र की चर्चा…

भारत के अन्य प्राचीन ग्रंथों से पता लगता है कि शालिहोत्रशास्त्र वैदिक आर्यों के जीवन और जीविका से पूर्णतया हिल मिल गया था। पुराणों में भी इसकी चर्चा आती है, जिससे पता चलता है कि पशुओं के प्रति भारतवासियों में अगाध स्नेह था। अनेक पशु देवी देवताओं के वाहन माने गए हैं। इससे भी पशुओं के महत्व का पता लगता है। प्राचीन काव्यग्रंथों में भी पशुव्यवसाय का वर्णन मिलता है। बड़े बड़े राजे महाराजे तक पशुओं को चराते और उनका व्यवसाय किया करते थे। ऐसा कहा जाता है कि पांडव बंधुओं में नकुल ने अश्वचिकित्सा और सहदेव ने गोशास्त्र नामक पुस्तकें लिखी थीं, को शालिहोत्रशास्त्र से ही संदर्भित थीं। ऐतिहासिक युग में आने पर अशोक द्वारा स्थापित पशुचिकित्सालय का स्पष्ट पता लगता है। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में अश्वों एवं हाथियों के रोगों की चिकित्सा के लिए सेना में पशुचिकित्सकों की नियुक्ति का उल्लेख करते समय शालिहोत्रशास्त्र का उदाहरण प्रस्तुत किया है। अश्व, हाथी एवं गौर जाति के रोगों पर विशिष्ट पुस्तकें लिखी गई थीं, जैसे जयदत्त की अश्वविद्या तथा पालकण्य की हस्त्यायुर्वेद। ये सब भी शालिहोत्रशास्त्र के बाद ही लिखी गई हैं, पर पशुचिकित्सा के प्रशिक्षण के लिए विद्यालयों के सबंध में कोई सूचना इसमें नहीं मिलती है।

 

विदेशी पशुचिकित्सा में शालिहोत्रशास्त्र का प्रभाव…

ईसा से १९००-१८०० वर्ष पूर्व के विदेशी ग्रंथों में पशुरोगों पर प्रयुक्त होनेवाले नुसखे शालिहोत्रशास्त्र से ही लिए गए हैं। यूनान में भी ईसा से ५०० से ३०० वर्ष पूर्व के हिप्पोक्रेटिस, जेनोफेन, अरस्तू आदि ने पशुरोगों की चिकित्सा पर विचार किया था, वे सभी शालिहोत्रशास्त्र से प्रभावित थे। गेलेन नामक चिकित्सक ने पशुओं के शरीरविज्ञान के संबंध में जो लिखा है, वह शालिहोत्रशास्त्र का ही अंग्रेजी अनुवाद है। बिज़ैटिन युग में (ईसा से ५५०८ वर्ष पूर्व से) शालिहोत्रशास्त्र का वर्णन मिलता है। १८वीं और १९वीं शती में यूरोप में संक्रामक रोगों के कारण पशुओं की जो भयानक क्षति हुई उससे यूरोप भर में पशुचिकित्सा विद्यालय खोले जाने लगे। पशुचिकित्सा का सबसे पहला विद्यालय फ्रांस के लीओन में १७६२ ई. में खुला था।

 

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