जब मैं तेरे बारे में किताब लिखूंगा…
जब मैं तेरे बारे में किताब लिखूंगा,
तो तेरे अधरों को महकता गुलाब लिखूंगा।
पन्ने पर कलम की जो स्याही होगी,
वो तेरे काजल की स्याह गहराई होगी।
तेरे उड़ते केशों के आगोश को,
मैं बरसता हुआ बादल लिखूंगा।
तेरी चाल हिरणी सी नहीं,
उसमें तो नजाकत होती है।
मैं तो तेरे हर एक कदम को,
खुदी में सिमटी नजाकत लिखूंगा।
कशमकश है कि तेरी आँखें चंचल हैं,
या मोहक मुस्कान का जादुई पल है?
इस कशमकश को मैं,
अपनी शायरी का हसीं सवाल लिखूंगा।
जो जमाल दिखता है,
वो तो कुदरत का अक़्स है,
पर तेरे उस बेहिसाब ‘ईमान’ को,
मैं खुदा का पाक कमाल लिखूंगा।
तेरी सरलता में सुकून,
और आचरण में इबादत का जमाल दूंगा।
मैं तेरे भीतर छिपे नूर को,
हर नज़्म का आख़िरी जवाब लिखूंगा।
“यह केवल शब्द नहीं, बल्कि मेरे हृदय का वह दर्पण है जिसमें अनीता का सौंदर्य और उनका ‘ईमान’ एक अमर ग्रंथ की भांति अंकित है। एक ऐसा प्रेम, जो नजाकत से शुरू होकर इबादत पर ठहरता है।”