May 25, 2024

भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम में प्रत्यक्ष नायकों झांसी की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई तथा उनके योग्य सेना नायक राव साहब और तात्या टोपे आदि को तो हम सब जानते हैं, परंतु इनके पीछे खड़े उन नायकों को हम नहीं जानते, जिन्होंने प्रत्यक्ष नायकों का खुल कर सहयोग किया था तथा अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। आज हम उन्हीं नायकों में से एक नायक नगर सेठ अमरचंद बांठिया के बारे में बात करेंगे। यह वही नगर सेठ थे जो नगर सेठ व ग्वालियर राज्य के कोषाध्यक्ष भी थे, मगर जब स्वतन्त्रता के नायक अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने के लिए ग्वालियर के मैदान-ए-जंग में आ डटे थे। उस समय झांसी की रानी की सेना और ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों को कई महीनों से वेतन तथा राशन आदि का समुचित प्रबंध न हो पाने से संकटों का सामना करना पड़ रहा था। उस समय अमरचंद बांठिया आगे बढ़े और महारानी लक्ष्मीबाई के एक इशारे पर ग्वालियर का सारा राजकोष विद्रोहियों के हवाले कर दिया। जिसका उन्हें आगे बहुत बुरा खामियाजा उठाना पड़ा। पहले तो उनके पुत्र को तोप के मुंह पर बांध कर उड़ा दिया गया और फिर अमरचंद बांठिया को सर्राफा बाजार में नीम के पेड़ पर लटका कर फांसी दे दी गई।

परिचय…

अमरचंद बांठिया का जन्म वर्ष १७९३ को राजपुताने और शौर्य की भूमि बीकानेर में हुआ था। बचपन से ही शौर्य की कहानियों को सुनते हुए बड़े हुए अमरचंद ने बाल्यकाल में ही ठान लिया था कि देश की आन-बान और शान के लिए उन्हें भी कुछ करना है। वैसे तो इतिहास प्रत्यक्ष नायकों को ही याद रखता है इसलिए अमरचंद जी के बारे में हमें कोई खास जानकारी नहीं मिलती, परंतु कहने वालों के अनुसार उनके पिता के व्यावसायिक घाटे ने बांठिया परिवार को राजस्थान से ग्वालियर कूच करने के लिए मजबूर कर दिया और यह परिवार सर्राफा बाजार में आकर बस गया। ग्वालियर की तत्कालीन सिंधिया रियासत के महाराज ने उनकी कीर्ति से प्रभावित होकर उन्हें राजकोष का कोषाध्यक्ष बना दिया। उस समय ग्वालियर का गंगाजली खजाना गुप्त रूप से सुरक्षित था जिसकी जानकारी केवल चुनिन्दा लोगों को ही थी। बांठिया जी भी उनमें से एक थे। वस्तुतः वे खजाने के रक्षक ही नहीं वरन ज्ञाता भी थे। उनकी सादगी, सरलता तथा कर्तव्य परायणता के सभी कायल थे।

स्वातंत्र समर…

वर्ष १८५७ का स्वातंत्र समर अपने पूर्ण यौवन पर था, परंतु दुर्भाग्य यह देखिए कि तत्कालीन सिंधिया रियासत अंग्रेजों का पिट्ठू था। परंतु उनके अधिकारियों में यह चर्चा हुआ करती थी कि भारत माता को दासता से मुक्त कराने के लिए अब तो हमको भी अहिंसा छोड़कर शस्त्र उठा ही लेना चाहिए। इस पर बांठिया जी ने कहा, “भाई मैं हथियार तो नहीं उठा सकता, किन्तु एक दिन समय आने पर ऐसा काम करूंगा जिससे क्रान्ति के पुजारियों को मदद मिलेगी।” तभी ग्वालियर पर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का अधिकार हो गया तथा अंग्रेजों के सहयोगी शासक वहां से हटने को विवश हुए। लक्ष्मीबाई तथा तात्या टोपे अपने सैन्य बल के साथ अंग्रेजों से लोहा तो ले ही रहे थे, परंतु उनकी सेना को कई माह से न तो वेतन प्राप्त हुआ था और नहीं उनके भोजन आदि की समुचित व्यवस्था थी। अर्थाभाव की वजह से समर दम तोड़ता नजर आ रहा था। इस स्थिति को देखते हुए बांठिया जी ने अपनी जान की परवाह न करते हुए क्रांतिकारियों की मदद की तथा ग्वालियर का गुप्त राजकोष ८ जून, १८५८ को उनके सुपुर्द कर दिया। उनकी मदद के बल पर लक्ष्मीबाई दुश्मनों के छक्के छु़ड़ाने में सफल रहीं।

शहीद…

वीरांगना के शहीद होने के चार दिन बाद ही श्री अमरचंद बांठिया को राजद्रोह के अपराध में उनके निवास स्थान के नजदीक सर्राफा बाजार में ही सार्वजनिक रूप से नीम के पेड़ पर लटकाकर फाँसी दे दी गई। अँगरेजों ने इससे पूरे उनसे माफी मांगने को भी कहा था, मगर उन्होंने माफी नहीं मांगी। इसपर उन्हें धमकी दी गई कि उनके पुत्र को तोप में उड़ा दिया जाएगा, मगर फिर भी वे टस से मस ना हुए। क्रोध के वशीभूत होकर अंग्रेजी सरकार ने उनके पुत्र को तोप के मुंह पर बांध कर उड़ा दिया। उसके बाद उन्हें भी २२ जून, १८५८ को फाँसी पर लटका दिया गया। जहां १८५७ के समर के इतिहास में ग्वालियर का इतिहास काला है वहीं अमर शहीद स्व. श्री अमरचंद बांठिया की वजह से ग्वालियर का पाप धुल गया।

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