April 25, 2024

काशी नगरी की उत्पत्ति की कथा स्कन्द पुराण के काशी खण्ड में वर्णित है। भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय जी का ही दूसरा नाम स्कन्द है। काशी उत्पत्ति के विषय में जब महर्षि अगस्त्य ने श्रीस्कन्द से पूछा, तब उत्तर देते हुए श्रीस्कन्द ने उन्हें बताया कि इस प्रश्न का उत्तर हमारे पिता महादेव जी ने माता पार्वती जी को दिया था। उन्होंने कहा था कि ‘महाप्रलय के समय जगत के सम्पूर्ण प्राणी नष्ट हो चुके थे, सर्वत्र घोर अन्धकार छाया हुआ था। उस समय ‘सत्’ स्वरूप ब्रह्म के अतिरिक्त सूर्य, नक्षत्र, ग्रह, तारे आदि कुछ भी नहीं थे। केवल एक ब्रह्म का अस्तित्त्व था, जिसे शास्त्रों में ‘एकमेवाद्वितीयम्’ कहा गया है। ‘ब्रह्म’ का ना तो कोई नाम है और न रूप, इसलिए वह मन, वाणी आदि इन्द्रियों का विषय नहीं बनता है। वह तो सत्य है, ज्ञानमय है, अनन्त है, आनन्दस्वरूप और परम प्रकाशमान है। वह निर्विकार, निराकार, निर्गुण, निर्विकल्प तथा सर्वव्यापी माया से परे तथा उपद्रव से रहित परमात्मा कल्प के अन्त में अकेला ही था।

कल्प के आदि में उस परमात्मा के मन में ऐसा संकल्प उठा कि ‘मैं एक से दो हो जाऊँ’। यद्यपि वह निराकार है, किन्तु अपनी लीला शक्ति का विस्तार करने के उद्देश्य से उसने साकार रूप धारण कर लिया। परमेश्वर के संकल्प से प्रकट हुई वह ऐश्वर्य गुणों से भरपूर, सर्वज्ञानमयी, सर्वस्वरूप द्वितीय मूर्ति सबके लिए वन्दनीय थी। महादेव ने पार्वती जी से कहा, ‘प्रिये! निराकार परब्रह्म की वह द्वितीय मूर्ति मैं ही हूँ। सभी शास्त्र और विद्वान मुझे ही ‘ईश्वर ’ कहते हैं। साकार रूप में प्रकट होने पर भी मैं अकेला ही अपनी इच्छा के अनुसार विचरण करता हूँ। मैंने ही अपने शरीर से कभी अलग न होने वाली ‘तुम’ प्रकृति को प्रकट किया है। तुम ही गुणवती माया और प्रधान प्रकृति हो। तुम प्रकृति को ही बुद्धि तत्त्व को जन्म देने वाली तथा विकार रहित कहा जाता है। काल स्वरूप आदि पुरुष मैंने ही एक साथ तुम शक्ति को और इस काशी क्षेत्र को प्रकट किया है।’

प्रकृति और ईश्वर…

इस प्रकार शक्ति को ही प्रकृति और ईश्वर को परम पुरुष कहा गया है। वे दोनों शक्ति और परम पुरुष परमानन्दमय स्वरूप में होकर काशी क्षेत्र में रमण करने लगे। पाँच कोस के क्षेत्रफल वाले काशी क्षेत्र को शिव और पार्वती ने प्रलयकाल में भी कभी त्याग नहीं किया है। इसी कारण उस क्षेत्र को ‘अविमुक्त’ क्षेत्र कहा गया है। जिस समय इस भूमण्डल की, जल की तथा अन्य प्राकृतिक पदार्थों की सत्ता (अस्तित्त्व) नहीं रह जाती है, उस समय में अपने विहार के लिए भगवान जगदीश्वर शिव ने इस काशी क्षेत्र का निर्माण किया था। स्कन्द (कार्तिकेय) ने अगस्त्य जी को बताया कि यह काशी क्षेत्र भगवान शिव के आनन्द का कारण है, इसीलिए पहले उन्होंने इसका नाम ‘आनन्दवन’ रखा था।

रहस्य…

काशी क्षेत्र के रहस्य को कोई भी नहीं जान पाता है। उन्होंने कहा कि उस आनन्दकानन में जो यत्र-तत्र सम्पूर्ण शिवलिंग हैं, उन्हें ऐसा समझना चाहिए कि वे सभी लिंग आनन्दकन्द रूपी बीजो से अंकुरित हुए हैं।

सृष्टि के निर्माण के समय सदाशिव ने महाविष्णु से कहा कि आप विविध प्रकार की यथायोग्य सृष्टि की रचना कीजिए, साथ ही कुमार्ग पर चलने वाले दुष्टात्मा के संहार का कारण भी बनिए, परंतु पाँच कोस के क्षेत्रफल में फैला यह काशीधाम मुझे अतिशय प्रिय है। मैं यहाँ सदा निवास करता हूँ, इसलिए इस क्षेत्र में सिर्फ़ मेरी ही आज्ञा चलेगी। यहां का सृष्टि कर्ता, पालक और संहारक सिर्फ मैं हूं, आप और यमराज आदि कोई भी देवता, इस ‘अविमुक्त’ क्षेत्र में रहने वाले किसी भी प्राणी पर अपना कोई नियम अथवा शासन का प्रयोग नहीं करेंगे। चाहे वह धर्मात्मा हो अथवा पापी। 

इसीलिए कहा जाता है कि काशी क्षेत्र में रहने वाला हर प्राणी पाप और पुण्य से दूर है। इतना ही नहीं वह यहां से दूर रहकर भी मानसिक रूप से इस क्षेत्र का स्मरण करता है, उसे पाप स्पर्श नहीं करता है और वह काशी क्षेत्र में पहुँच कर उसके पुण्य के प्रभाव से मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। जो कोई संयमपूर्वक काशी में बहुत दिनों तक निवास करता है, किन्तु संयोगवश उसकी मृत्यु काशी से बाहर हो जाती है, तो वह भी स्वर्गीय सुख को प्राप्त करता है और अन्त में पुन: काशी में जन्म लेकर मोक्ष पद को प्राप्त करता है।

काशी के घाट

About Author

Leave a Reply