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सितार के जादूगर: पंडित देबू चौधरी और सेनिया घराने की विरासत

​भारतीय शास्त्रीय संगीत के आकाश में पंडित देबू चौधरी एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र थे, जिन्होंने अपनी उंगलियों के जादू से सितार को विश्व पटल पर एक नई पहचान दी। उस्ताद मुश्ताक अली ख़ान के योग्य शागिर्द और सेनिया घराने के ध्वजवाहक पंडित जी का जीवन संगीत की अनवरत साधना की एक अमर गाथा है।

 

​जन्म और प्रारंभिक शिक्षा

​पंडित देबू चौधरी (देवव्रत चौधरी) का जन्म स्वतंत्रता पूर्व ३० मई, १९३५ को म्यमेनसिंह (वर्तमान बांग्लादेश) में हुआ था। संगीत के प्रति उनका अनुराग बाल्यकाल से ही दिखने लगा था। जब बच्चे खिलौनों से खेलते थे, महज चार वर्ष की कोमल आयु में उन्होंने सुरों की वर्णमाला सीखनी शुरू कर दी थी। उनका प्रारंभिक प्रशिक्षण पंचू गोपाल दत्ता के सानिध्य में हुआ, जहाँ उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बुनियादी बारीकियों को आत्मसात किया।

 

​सेनिया घराना और गुरु-शिष्य परंपरा

​पंडित देबू चौधरी जयपुर के प्रसिद्ध ‘सेनिया संगीत घराना’ के प्रतिनिधि स्तंभ थे। इस घराने का गौरवशाली इतिहास सम्राट तानसेन के वंशजों से जुड़ा है। सेनिया घराना विशेष रूप से रागों की शुद्धता और उनके पारंपरिक स्वरूप को संरक्षित रखने के लिए विख्यात है। पंडित जी ने संगीत की उच्च शिक्षा संगीत आचार्य उस्ताद मुश्ताक अली खान से प्राप्त की। अपने गुरु की देखरेख में उन्होंने सितार वादन की उन कठिन तकनीकों पर महारत हासिल की, जो आज के दौर में दुर्लभ मानी जाती हैं।

 

​कार्यक्षेत्र और बहुमुखी प्रतिभा

​देबू चौधरी का नाम पंडित रविशंकर, उस्ताद विलायत ख़ान और पंडित निखिल बनर्जी जैसे महान सितारवादकों की पंक्ति में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी विशेषता यह थी कि वे केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि एक प्रखर शिक्षाविद् और लेखक भी थे।

​साहित्यिक योगदान: उन्होंने संगीत पर केंद्रित छह महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं, जो आज भी संगीत के विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शक हैं।

​नवाचार: उन्होंने परंपरा से जुड़े रहते हुए भी संगीत में नए प्रयोग किए और कई नए रागों की रचना की।

​शैक्षणिक योगदान: उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के संगीत संकाय के डीन के रूप में भी अपनी सेवाएँ दीं और कई योग्य शिष्य तैयार किए।

 

​पुरस्कार एवं सम्मान

​कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष १९९२ में ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनगिनत राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए।

 

​एक युग का अंत

​८५ वर्ष की आयु में, १ मई, २०२१ को कोरोना संक्रमण के कारण संगीत का यह साधक दिल्ली के एक अस्पताल में ब्रह्मलीन हो गया। उनके निधन से भारतीय शास्त्रीय संगीत ने एक ऐसा चितेरा खो दिया, जिसने रागों की शुद्धता से कभी समझौता नहीं किया। उनके पुत्र पंडित प्रतीक चौधरी ने भी उनके नक्शेकदम पर चलते हुए संगीत की सेवा की, जिनका दुर्भाग्यवश उसी दौरान निधन हो गया।

 

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