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पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी: हिंदी पत्रकारिता के ‘शिखर पुरुष’ और साक्षात्कार विधा के जनक

 

प्रस्तावना: एक नई विधा का उदय

आज हम टीवी, रेडियो और इंटरनेट पर जिस ‘साक्षात्कार’ (Interview) विधा का आनंद लेते हैं, हिंदी साहित्य में उसकी नींव रखने का श्रेय निर्विवाद रूप से पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी को जाता है। उन्होंने कोलकाता से प्रकाशित होने वाली प्रसिद्ध पत्रिका ‘विशाल भारत’ के माध्यम से इस विधा को न केवल जन्म दिया, बल्कि इसे एक साहित्यिक गरिमा प्रदान की। चतुर्वेदी जी केवल एक संपादक नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे दृष्टा थे जिन्होंने शहीदों की स्मृति को सहेजने और प्रवासी भारतीयों की पीड़ा को आवाज देने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।

 

प्रारंभिक जीवन: आगरा से इंदौर और गांधी जी का सान्निध्य

२४ दिसंबर, १८९२ को उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में जन्मे चतुर्वेदी जी का प्रारंभिक जीवन संघर्ष और खोज का रहा। फर्गुसन से लेकर इंदौर तक की उनकी यात्रा ने उन्हें महान मनीषियों से मिलाया।

गांधी जी से भेंट: इंदौर में हिंदी साहित्य सम्मेलन के दौरान उनकी भेंट महात्मा गांधी से हुई। गांधी जी उनकी प्रतिभा से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने १९२१ में गुजरात विद्यापीठ की स्थापना के समय चतुर्वेदी जी को अपनी सेवाएं देने के लिए आमंत्रित किया।

राष्ट्रभाषा अभियान: गांधी जी के आदेश पर उन्होंने देश भर के विद्वानों से हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के संदर्भ में अभिप्राय एकत्र किए, जो बाद में हिंदी आंदोलन का वैचारिक आधार बना।

 

‘विशाल भारत’ का स्वर्णकाल और रमानन्द चट्टोपाध्याय

जब चतुर्वेदी जी ने कोलकाता के मासिक पत्र ‘विशाल भारत’ के संपादन की जिम्मेदारी संभाली, तब हिंदी पत्रकारिता में एक नया अध्याय जुड़ा।

संपादकीय स्वतंत्रता: इस पत्रिका के मालिक प्रतिष्ठित पत्रकार रमानन्द चट्टोपाध्याय थे। रमानन्द बाबू और चतुर्वेदी जी के बीच की मित्रता ‘पूंजी और प्रज्ञा’ के अद्भुत तालमेल का उदाहरण थी। चतुर्वेदी जी की संपादकीय निर्भीकता ऐसी थी कि वे अपने मालिक से भी असहमति जताने में संकोच नहीं करते थे।

साहित्यिक केंद्र: उस समय ‘विशाल भारत’ में छपना किसी भी हिंदी साहित्यकार के लिए गौरव की बात होती थी।

 

गिरमिटिया मजदूरों की आवाज और ‘दीनबंधु’ एंड्रयूज़

चतुर्वेदी जी की संवेदनशीलता केवल साहित्य तक सीमित नहीं थी। उन्होंने तोताराम सनाढ्य के संस्मरण ‘फिजी द्वीप में मेरे २१ वर्ष‘ के माध्यम से गिरमिटिया मजदूरों की त्रासदी को दुनिया के सामने रखा।

प्रवासी भारतीयों के मसीहा: उन्होंने सी.एफ. एंड्रयूज़ (जिन्हें वे ‘दीनबंधु’ कहते थे) के साथ मिलकर इन मजदूरों की दुर्दशा सुधारने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किए। गांधी जी द्वारा भूमिका लिखित उनकी अंग्रेजी पुस्तक आज भी इस विषय पर एक प्रमाणिक दस्तावेज है।

 

छायावाद का विरोध और वैचारिक स्पष्टता

हिंदी साहित्य के इतिहास में चतुर्वेदी जी को उनके छायावाद के प्रखर विरोध के लिए भी याद किया जाता है। जहाँ समूचा हिंदी साहित्य इस धारा में बह रहा था, चतुर्वेदी जी अपनी ‘विशिष्ट शैली’ और ‘साक्षी भाव’ के कारण इसके विरोध में खड़े रहे। उनका मानना था कि साहित्य को समाज और राष्ट्र की यथार्थ समस्याओं से सीधा जुड़ना चाहिए।

 

राजनीतिक जीवन और सम्मान

स्वतंत्रता के पश्चात, चतुर्वेदी जी ने १२ वर्षों तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य के रूप में राष्ट्र की सेवा की। साहित्य और पत्रकारिता में उनके अद्वितीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें १९७३ में ‘पद्म भूषण’से सम्मानित किया।

 

निष्कर्ष: जीवन का मूल मंत्र

२ मई, १९८५ को विदा लेने से पूर्व चतुर्वेदी जी ने साहित्यकारों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार की जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानती थी। वे किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले स्वयं से पूछते थे— “क्या इस कार्य से देश, समाज और हिंदी का कुछ भला होगा?” यही प्रश्न आज भी हर लेखक के लिए मार्गदर्शक होना चाहिए।

 

 

“इस आलेख को प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी द्वारा शोध का आधार बनाया गया है।”

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