April 23, 2024

१३ अप्रैल, १९१९ को बैसाखी पर्व के दिन रौलेट एक्ट का विरोध करने के लिए एक सभा हो रही थी। स्थान था अमृतसर स्वर्ण मन्दिर के निकट जलियाँवाला बाग। जाने कैसे जनरल डायर नामक एक अँग्रेज ऑफिसर को इस बात की जानकारी हो गई, उसने बिना किसी बात का पता लगाए सीधे ही उस सभा पर गोलियां चलवा दीं जिसमें आधिकारिक तौर पे ४०० से अधिक व्यक्ति मारे गए और २००० से अधिक व्यक्ति घायल हुए। आज भी अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में ४८४ शहीदों की सूची है, जबकि जलियांवाला बाग में कुल ३८८ शहीदों की सूची है। वहीं ब्रिटिश राज के अभिलेख के अनुसार इस घटना में २०० लोगों के घायल होने और ३७९ लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते हैं जिनमें से ३३७ पुरुष, ४१ नाबालिग बच्चे और एक ६-सप्ताह का बच्चा था। जबकि अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार १,००० से अधिक लोग मारे गए और २,००० से अधिक घायल हुए।

इस तरह कहा जा सकता है कि राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आने दी गई। जबकि वास्तविकता यह है कि आजाद भारत के पास मारे गए लोगों के परिजनों ने पूरे सबूत के साथ गुहार लगाई थी, उन्होंने यह भी कहा कि अगर वे वहां नहीं मारे गए तो आप उनको ना सही उनके लापता होने की वजह का ही पता लगा दें, सच्चाई खुद बा खुद सामने आ जाएगी। मगर आज तक कुछ ना हुआ…

अच्छा जाने दीजिए इन राजनीतिक एवं कूटनीतिक कृत्यों को, हम आते हैं अपने मुख्य मुद्दे पर। उस दिन १९-२० साल का एक लड़का भी था वहां और जो जालियाँवाला बाग नरसंहार का प्रत्यक्षदर्शी था। इस घटना से वीर की आंखें लाल हो गई वह तिलमिला उठा और उसने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए वह विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा पर निकल पड़ा। वर्ष १९३४ में वह लंदन पहुंच गया और वहां ९, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगा। यह थी उस युवा की पहली जीत। वहां उसने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपने मुख्य कार्य को पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। अब भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा। इतना कुछ पढ़कर आप सभी उस महान क्रांतिकारी को भली भांति पहचान गए होंगे।

जी हां ! उधम सिंह…

उधम सिंह जी का जन्म २६ दिसंबर, १८९९ को पंजाब के संगरूर जिला अंतर्गत सुनाम नामक गाँव में हुआ था। जब वे मात्र दो वर्ष के थे यानी वर्ष १९०१ में उधम सिंह की माता जी का एवं उनके आठ वर्ष की अल्प आयु तक यानी वर्ष १९०७ में पिता जी का निधन हो गया। इस हृदय विदार घटना के बाद उन्हें और उनके बड़े भाई को अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। उधमसिंह जी के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्तासिंह था जिन्हें अनाथालय में क्रमश: उधमसिंह और साधुसिंह के रूप में नए नाम मिले। सर्वधर्म समभाव को मानने वाले उधम सिंह जी ने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक है।

अनाथालय में उधमसिंह की जिन्दगी सही मायनों में अभी चल भी ना पाई थी कि वर्ष १९१७ में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया। इस तरह ऊपर वाले ने उन्हें इस जहां में बिल्कुल अकेला छोड़ दिया मगर इतिहास उनसे यह बलिदान अपनी एक महत्वपूर्ण कार्य करवाने के लिए ले रहा था, जिससे वे मानसिक तौर पर और मजबूत हो सकें। अतः वर्ष १९१९ में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शमिल हो गए। उधमसिंह अनाथ हो गए थे, लेकिन इसके बावजूद वह विचलित नहीं हुए और देश की आजादी तथा डायर को मारने की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए लगातार काम करते रहे।

समय आ गया…

उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका अतः वर्ष १९४० में मिला। यानी जलियांवाला बाग हत्याकांड के २१ साल बाद १३ मार्च, १९४० को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुँच गए। उस वक़्त उन्होंने अपनी रिवॉल्वर एक मोटी किताब में छिपा रखी थी। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके। इस तरह का प्रयोग कालांतर में भगत सिंह ने भी अपनी एक महत्वपूर्ण योजना के लिए किया था।

बैठक जब समाप्त होने से पूर्व ही उधम सिंह दीवार के पीछे मोर्चा संभाल चुके थे। बैठक जैसे ही समाप्त हुआ और कातिल माइकल ओ डायर मुस्कुराते हुए वहां से गुजरा उधम सिंह ने उसपर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश भी ना की और भागते भी कहां आखिर हत्यारे के देश में ही तो थे, और भागते भी क्यों जिस कार्य को करने के लिए उन्होंने प्रण लिया था वे उसे पूरा कर चुके थे। उन्होंने ना भागकर संपूर्ण विश्व को यह संदेश दिया कि भारत आज भी वीर पुत्रों से खाली नहीं है। और उन्होंने अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। ४ जून, १९४० को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और ३१ जुलाई, १९४० को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई।

विवाद…

भारत के इस महान स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी एवं क्रान्तिकारी द्वारा, जलियांवाला बाग हत्या कांड का हत्यारा जनरल माइकल ओ’ ड्वायर को लन्दन में जाकर गोली मारने वाले इस प्रकरण पर कई इतिहासकारों का मानना है कि यह हत्याकाण्ड ओ’ ड्वायर व अन्य ब्रिटिश अधिकारियों की एक सुनियोजित षड्यंत्र थी, जो पंजाब पर नियंत्रण बनाने के लिए किया गया था। अतः हत्याकांड के पश्चात जनरल की हत्या भी क्या पंजाब सहित पूरे भारत में उपज रही जनाक्रोश को ठंडा करने की योजना तो नहीं थी ??? मगर जो भी हो, हो सकता है कि आक्रोश की वजह से हमें हमारी आजादी शायद और पहले मिल जाति मगर वह हत्यारा लंदन में सीना फुलाए हम पर हंस रहा होता। जिसे शांत कर दिया हमारे अमर पुरोधा उधम सिंह जी ने।

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