जस्टिस गोकरननाथ मिश्र: सिद्धांतों के धनी और भारतीय चिकित्सा पद्धति के संवाहक
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और समाज-सुधार के इतिहास में कई ऐसे मनीषी हुए, जिन्होंने भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय अपने सिद्धांतों को प्राथमिकता दी। जस्टिस गोकरननाथ मिश्र एक ऐसे ही प्रखर व्यक्तित्व थे, जिन्होंने न केवल राजनीति में अपनी अमिट छाप छोड़ी, बल्कि न्याय और शिक्षा के क्षेत्र में भी नए प्रतिमान स्थापित किए। वे उन नेताओं में से थे जिनकी गांधी जी की कार्यशैली से वैचारिक असहमति थी, और यही कारण था कि वे राष्ट्रहित के अपने व्यक्तिगत मापदंडों पर अडिग रहे।
जन्म एवं मेधावी छात्र जीवन
गोकरननाथ मिश्र जी का जन्म २० दिसम्बर, १८७१ को उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के एक कुलीन सनातनी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी बुद्धि इतनी प्रखर थी कि उन्होंने स्नातक स्तर पर ही अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया था। उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड जाने हेतु नियमित छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई, किंतु तत्कालीन पारिवारिक मान्यताओं और दादा-दादी के कड़े विरोध के कारण वे विदेश न जा सके। उन्होंने अपनी इस बाधा को अवसर में बदला और लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.एस.सी. तथा विधि (क़ानून) की डिग्री प्राप्त कर अपनी शैक्षणिक यात्रा पूर्ण की।
व्यावसायिक उत्कर्ष और राजनीतिक यात्रा
वकालत के पेशे में कदम रखते ही गोकरननाथ जी की तर्कशक्ति और कानूनी समझ ने उन्हें अल्प समय में ही प्रदेश के शीर्ष वकीलों की श्रेणी में खड़ा कर दिया। उनकी इस ख्याति ने उनके लिए राजनीति के द्वार खोल दिए।
कांग्रेस से जुड़ाव: वर्ष १८९८ के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन से उनकी राजनीतिक सक्रियता आरंभ हुई। यहाँ उनका परिचय मदन मोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू और विशन नारायण दर जैसे दिग्गज नेताओं से हुआ।
लोकहित के स्वर: १९१३ से १९१५ तक वे उत्तर प्रदेश कौंसिल के सदस्य रहे और निरंतर किसानों व मजदूरों के प्रश्नों को उठाते रहे।
गांधी जी से वैचारिक मतभेद और कांग्रेस का त्याग
गोकरननाथ मिश्र का मानना था कि गांधी जी की अहिंसक और नरम नीतियां कभी-कभी अंग्रेजी हुकूमत को परोक्ष रूप से लाभ पहुँचाती हैं। वे असहयोग आंदोलन के तौर-तरीकों से सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि राजनीति यथार्थ पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल भावनात्मक प्रयोगों पर। इसी वैचारिक मतभेद के कारण १९२० में उन्होंने कांग्रेस से सदैव के लिए दूरी बना ली।
न्यायिक निष्पक्षता और सामाजिक साहस
वर्ष १९२५ में उन्हें ‘अवध चीफ़ कोर्ट’ का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। न्याय की कुर्सी पर बैठकर भी उनकी सहानुभूति निर्बल वर्गों और किसानों के प्रति बनी रही। उन पर पक्षपात के आरोप भी लगे, किंतु उनकी निष्पक्षता और कानूनी आधार इतने सुदृढ़ थे कि सरकार या उनके विरोधी कभी भी उन पर कोई लांछन सिद्ध नहीं कर सके।
रूढ़िवादिता पर प्रहार: समाज सुधारक के रूप में उन्होंने अपनी विधवा पुत्री का पुनर्विवाह करवाकर तत्कालीन जड़ समाज को चुनौती दी और स्त्री गरिमा का एक महान उदाहरण प्रस्तुत किया।
शिक्षा और आयुर्वेद में ऐतिहासिक योगदान
गोकरननाथ जी का योगदान केवल राजनीति तक सीमित नहीं था।
महिला शिक्षा: लखनऊ का प्रसिद्ध ‘महिला विद्यालय’ आज भी उनकी शिक्षा के प्रति दूरदर्शिता का जीवंत प्रमाण है।
भारतीय चिकित्सा पद्धति: वर्ष १९२५ में उनकी अध्यक्षता में एक समिति गठित हुई, जिसने आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा प्रणालियों को व्यवस्थित करने का सुझाव दिया। इसी की संस्तुति पर १९२६ में ‘बोर्ड ऑफ इण्डिया मेडिसिन’ की स्थापना हुई, जिसके वे प्रथम अध्यक्ष बने। उन्होंने वैद्यों और हकीमों के पंजीकरण तथा आयुर्वेद विद्यालयों को अनुदान दिलाने हेतु अभूतपूर्व कार्य किए।
अंतिम विदाई
जुलाई, १९२९ में अपने निधन तक वे निरंतर समाज और चिकित्सा पद्धति के विकास में लगे रहे। जस्टिस गोकरननाथ मिश्र का जीवन हमें सिखाता है कि सत्य के मार्ग पर चलते हुए यदि अपनों या बड़े व्यक्तित्वों से भी असहमति हो, तो उसे साहसपूर्वक व्यक्त करना ही वास्तविक राष्ट्रभक्ति है।