फाँसी के फंदे पर मुस्कुराता बालक: अमर शहीद खुदीराम बोस और ‘खुदीराम धोती’ की वो ऐतिहासिक क्रांति
”बुझी आग दिल में जलनी चाहिए, बुढ़ापे सभी ढोते हैं… कुछ तो ऐसा करो तुम भी, खुदीराम आकर कह दे—जवानी ऐसी ढोनी चाहिए।”
मात्र १८ वर्ष की आयु में हाथ में गीता लेकर फाँसी के फंदे को चूमने वाले और बंगाल के लोकगीतों में अमर होने वाले भारत माता के सबसे युवा सेनानी खुदीराम बोस की शौर्य गाथा।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सन १९०८ के बाद देश के नौजवानों में एक नया और अजीब सा ‘फैशन’ चल पड़ा था—धोती का फैशन! उस दौर के युवा इस खास धोती के इस कदर दीवाने थे कि उनकी देशभक्ति और दीवानेपन को देखकर बंगाल के जुलाहे (बुनकर) रातों-रात एक विशेष किस्म की धोती बुनने लगे थे। इस धोती के कपड़े में कोई जादुई खासियत नहीं थी, बल्कि अगर कुछ बेहद खास था, तो वह थी उस धोती की ‘किनारी’ (बॉर्डर), जिस पर सूत के धागों से साफ-साफ अक्षरों में लिखा होता था—’खुदीराम’। नौजवान इस धोती को पहनकर देश की आज़ादी के नारे लगाते थे। आइए जानते हैं कि इस अनूठे फैशन के पीछे छिपा वो कौन सा रक्त-रंजीत इतिहास था, जिसने पूरे भारत को हिला कर रख दिया था।
बचपन से ही देशभक्ति का अटूट संकल्प
मातृभूमि को आज़ाद कराने की यह अलौकिक तड़प जिस महामानव के भीतर थी, वे थे अमर पुरोधा खुदीराम बोस जी। उनका जन्म पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी नामक गाँव में बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस के यहाँ हुआ था और उनकी पूजनीय माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। बचपन में ही माता-पिता का साया उठ जाने के बाद भी खुदीराम के मन में देश को आज़ाद कराने की ऐसी अटूट लगन लगी कि वे मात्र नौवीं कक्षा के बाद ही अपनी पढ़ाई-लिखाई छोड़कर देश के ‘स्वदेशी आंदोलन’ में कूद पड़े। वे रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और वन्देमातरम के पर्चे बांटने से लेकर ब्रिटिश खजाने पर छापे मारने तक की हर साहसिक गतिविधि में सबसे आगे रहने लगे।
मुजफ्फरपुर बम कांड: भारत का पहला धमाका
क्रांतिकारी दल ने बंगाल के विभाजन के लिए ज़िम्मेदार और क्रांतिकारियों को क्रूर सजाएं देने वाले मुजफ्फरपुर के अत्याचारी ब्रिटिश सत्र न्यायाधीश ‘किंग्सफोर्ड’ को मौत के घाट उतारने का जिम्मा खुदीराम बोस और प्रफुल्ल कुमार चाकी को सौंपा।
३० अप्रैल १९०८ की वो ऐतिहासिक रात, करीब साढ़े आठ बजे का समय रहा होगा। मुजफ्फरपुर क्लब से एक आलीशान बग्घी बाहर निकली, जो हूबहू किंग्सफोर्ड की बग्घी के समान थी। उस गाड़ी को आते देख खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी गाड़ी के पीछे भागने लगे। रास्ते में घना अँधेरा था। जैसे ही वह गाड़ी किंग्सफोर्ड के बँगले के ठीक सामने पहुँची, खुदीराम ने अँधेरे का सीना चीरते हुए आगे वाली बग्घी पर अचूक निशाना लगाकर पूरी ताकत से बम फेंक दिया।
हिंदुस्तान के इतिहास में इससे पहले ऐसा भीषण बम विस्फोट कभी नहीं हुआ था। उस रात उस धमाके की गूँज मुजफ्फरपुर से तीन मील दूर तक सुनाई दी, और कुछ ही दिनों बाद उसकी धमक सात समंदर पार इंग्लैंड तथा समूचे यूरोप में भी सुनी गई। इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य की चूड़ें हिला दी थीं। हालाँकि, खुदीराम ने किंग्सफोर्ड की गाड़ी समझकर ही बम फेंका था, परन्तु उस दिन किंग्सफोर्ड की किस्मत अच्छी थी कि वह क्लब से थोड़ी देर से बाहर आया और बच गया। गाड़ियों की एक जैसी बनावट के कारण उस बग्घी में बैठीं दो यूरोपियन स्त्रियाँ (श्रीमती कैनेडी और उनकी बेटी), जो क्रांतिकारियों के हमदर्द बैरिस्टर पीर प्रिंगल कैनेडी के परिवार से थीं, अनजाने में इस धमाके का शिकार हो गईं।
२४ मील की नंगे पैर दौड़ और वैनी स्टेशन पर महाबलिदान
बम फेंकने के तुरंत बाद ब्रिटिश हुकूमत की पुलिस और सेना चारों तरफ फैल गई। खुदीराम और प्रफुल्ल कुमार चाकी रातों-रात रेलवे लाइन के किनारे-किनारे नंगे पैर भागते गए। बिना कुछ खाए-पिए, हाँफते हुए दोनों वीर भागते-भागते २४ मील दूर स्थित वैनी रेलवे स्टेशन (समस्तीपुर) पर जाकर रुके। किंग्सफोर्ड इस धमाके से इतना घबरा गया कि उसने डर के मारे तुरंत नौकरी ही छोड़ दी और क्रांतिकारियों के इसी खौफ़ के चलते शीघ्र ही सदमे से उसकी मौत भी हो गई।
दूसरी ओर, अंग्रेज पुलिस साये की तरह क्रांतिकारियों के पीछे लगी हुई थी और वैनी स्टेशन पर चाय पीते समय संदेह होने पर पुलिस ने दोनों वीरों को चारों तरफ से घेर लिया। खुद को फिरंगियों की पुलिस से घिरा देख, देशभक्त प्रफुल्ल कुमार चाकी ने अपनी पिस्तौल से खुद को गोली मार ली और वीरगति प्राप्त की, जबकि युवा खुदीराम बोस को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
निष्कर्ष: ११ अगस्त १९०८ और लोकगीतों में अमरत्व
मुजफ्फरपुर जेल में चले मुकदमे के दौरान भी इस १८ साल के बालक के चेहरे पर रत्ती भर भी शिकन या डर नहीं था। अदालत में जब जज ने उन्हें फाँसी की सजा सुनाई, तो खुदीराम मुस्कुरा दिए। अंततः ११ अगस्त १९०८ को हाथ में पवित्र श्रीमद्भगवद्गीता लेकर यह मुस्कुराता हुआ बालक हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गया।
उनकी इस शहादत ने बंगाल और पूरे देश में राष्ट्रवाद की ऐसी भीषण आग सुलगाई कि जुलाहों ने उनके नाम की धोतियाँ बुनना शुरू कर दिया। उनके साहसिक योगदान और इस सर्वोच्च बलिदान को अमर करने के लिए बंगाल में अनेक कालजयी लोकगीत रचे गए, जिन्हें बंगाल के बाउल और लोक गायक आज भी गाते हुए रो पड़ते हैं—”एक बार बिदाय दे मा घुरे आसी…” (माँ, मुझे एक बार विदा दे, मैं दोबारा इस धरती पर जन्म लेकर आऊँगा)।
आज जब हम स्वतंत्र भारत की हवा में सांस ले रहे हैं, तो लेखक विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’ अपनी अश्रुपूर्ण आँखों से भारत माता के इस लाडले, वीरता के अप्रतिम प्रतीक अमर शहीद खुदीराम बोस जी के चरणों में कोटि-कोटि वंदन और सादर भावांजलि अर्पित करता है।
धन्यवाद ! !
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