ऐ मालिक तेरे बंदे हम, ऐसे हो हमारे करम
नेकी पर चले, और बदी से टले
ताकी हसते हुये निकले दम
ऐ मालिक तेरे बंदे हम
ये अंधेरा घना छा रहा, तेरा इन्सान घबरा रहा
हो रहा बेख़बर, कुछ ना आता नज़र
सुख का सूरज छुपा जा रहा
हैं तेरी रोशनी में जो दम
तो अमावस को कर दे पूनम
नेकी पर चले, और बदी से टले
ताकी हसते हुये निकले दम
ऐ मालिक तेरे बंदे हम..
वसंत देसाई: सुरों के साधक और सादगी के संगीतकार
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्णिम युग में जहाँ एक ओर पाश्चात्य वाद्ययंत्रों का प्रभाव बढ़ रहा था, वहीं दूसरी ओर वसंत देसाई एक ऐसे संगीतकार के रूप में उभरे जिन्होंने अपनी जड़ें भारतीय माटी और शास्त्रीय संगीत में जमाए रखीं। ९ जून, १९१२ को गोवा के कुदाल में जन्मे वसंत जी का जीवन एक ऐसे कलाकार की यात्रा है जिसने अभिनय और गायन से शुरुआत कर ‘संगीत निर्देशन’ के शिखर को छुआ।
प्रारंभिक संघर्ष: अभिनय से सहायक तक
वसंत देसाई को बचपन से ही सुरों ने अपनी ओर खींचा। उनका फिल्मी सफर १९३० की मूक फिल्म ‘खूनी खंजर’ में अभिनय से शुरू हुआ। १९३२ में फिल्म ‘अयोध्या का राजा’ में वे संगीतकार गोविंद राव टेंबे के सहायक बने और यहीं से उन्होंने संगीत की तकनीकी बारीकियों को समझना शुरू किया। हालाँकि, वे पार्श्वगायन में भी हाथ आजमा रहे थे (जैसे ‘अमृत मंथन’ का गीत ‘बरसन लगी’), लेकिन जल्द ही उन्हें आभास हो गया कि उनकी नियति संगीत सृजन में है।
शांताराम जी का साथ और ‘शकुंतला’ का उदय
वसंत देसाई के करियर को सही दिशा तब मिली जब महान फिल्मकार वी. शांताराम ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। १९४३ की ‘शकुंतला’ ने सफलता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए और वसंत जी को एक स्वतंत्र और सफल संगीतकार के रूप में स्थापित कर दिया। इसके बाद ‘राजकमल कला मंदिर’ और वसंत देसाई की जोड़ी ने भारतीय सिनेमा को ‘झनक झनक पायल बाजे’ और ‘दो आँखें बारह हाथ’ जैसी कालजयी फिल्में दीं।
शास्त्रीयता और नवाचार का अद्भुत संगम
वसंत जी केवल रागों के ज्ञाता नहीं थे, बल्कि वे पृष्ठभूमि संगीत (Background Score) के भी जादूगर थे।
’यादें’ (१९६४): एक पात्र वाली इस फिल्म में भावनाओं को व्यक्त करने की पूरी जिम्मेदारी वसंत जी के पार्श्व संगीत पर थी, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया।
’अचानक’ (१९७४): गुलज़ार की बिना गानों वाली इस फिल्म में उन्होंने संगीत के माध्यम से वह तनाव और संवेदना पैदा की, जो शब्दों से परे थी।
शास्त्रीय प्रयोग: ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होंने राग मालगुंजी और अन्य रागों का जो प्रयोग किया, उसने फिल्म संगीत को एक नई ऊँचाई दी। लता मंगेशकर की आवाज के साथ उनके गीतों ने ‘नैन सो नैन नाही मिलाओ’ जैसे अमर नगमे दिए।
’ऐ मालिक तेरे बंदे हम’: एक सार्वभौमिक प्रार्थना
१९५७ की फिल्म ‘दो आँखें बारह हाथ’ का यह गीत आज भी स्कूलों, जेलों और प्रार्थना सभाओं की पहचान है। भरत व्यास के शब्दों को वसंत जी ने इतनी पवित्र धुन में पिरोया कि यह गीत सीमाओं और धर्मों को लांघकर सीधे आत्मा से जुड़ गया। पंजाब सरकार द्वारा इसे प्रार्थना सभाओं में शामिल करना इसकी स्वीकार्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
निष्कर्ष: अश्विनी राय ‘अरुण’ का विचार
मेरी नजर में वसंत देसाई वह कलाकार थे जिन्होंने कभी व्यावसायिकता के लिए कला से समझौता नहीं किया। उनके संगीत में गोवा की प्रकृति की तरलता और कोल्हापुर के नाटकों की गंभीरता का मिश्रण था। उन्होंने लगभग ४५ हिंदी और २० मराठी फिल्मों को अपने सुरों से सजाया। आज उनकी जयंती पर हम उस ‘मौन साधक’ को याद करते हैं जिनके गीतों ने ‘अमावस को पूनम’ करने की शक्ति रखी।
सादर नमन!