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गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न’: हिंदी पुनर्जागरण के शिल्पी और राष्ट्रभाषा के अनन्य साधक

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​हिंदी साहित्य के इतिहास में गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न’ एक ऐसे मनीषी के रूप में स्मरण किए जाते हैं, जिन्होंने अपनी बहुभाषी विद्वत्ता और सांगठनिक कौशल से हिंदी को ‘लोकभाषा’ से ‘राष्ट्रभाषा’ बनाने के संकल्प को सिद्ध किया। ६ जून, १८८१ को राजस्थान के झालरापाटन में जन्मे गिरिधर जी ने उस दौर में हिंदी का शंखनाद किया जब देश औपनिवेशिक मानसिकता और भाषायी भटकाव के दौर से गुजर रहा था।

 

​गांधी जी से भेंट और हिंदी का दीक्षा-मंत्र

​गिरिधर जी के जीवन का एक निर्णायक मोड़ वर्ष १९१४ की वह भेंट थी, जब इंदौर में ‘मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति’ की स्थापना के पश्चात वे मुंबई में महात्मा गांधी से मिले। कहा जाता है कि गांधी जी ने उन्हें हिंदी की सेवा का वह ‘दीक्षा मंत्र’ दिया, जिसने उनके भीतर छिपे भारतेन्दु युगीन संस्कारों को एक नई ऊर्जा प्रदान की। इसी वैचारिक सुदृढ़ता का परिणाम था कि अगले ही वर्ष लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में गौरव प्राप्त हुआ।

 

​संस्थागत क्रांति: झालरापाटन से इंदौर तक

​गिरिधर जी केवल लेखक नहीं, बल्कि संस्थानों के निर्माता थे। उन्होंने राजस्थान और मध्य भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए अभूतपूर्व कार्य किए:

​विद्या भास्कर (१९०६): राजपूताना से इस मासिक पत्र के माध्यम से उन्होंने साहित्यिक चेतना का प्रसार किया।

​राजपूताना हिन्दी साहित्य सभा (१९१२): झालरापाटन में स्थापित इस सभा का उद्देश्य न केवल साहित्य सृजन था, बल्कि विज्ञान, वाणिज्य, इतिहास और राजनीति जैसे विषयों पर सस्ते और सुलभ ग्रंथ उपलब्ध कराना भी था।

​सांगठनिक विस्तार: भरतपुर और इंदौर में हिंदी साहित्य समितियों की स्थापना कर उन्होंने कार्यकर्ताओं की एक ऐसी श्रृंखला तैयार की, जो हिंदी की श्रीवृद्धि के लिए समर्पित थी।

 

​साहित्यिक सृजन: ‘मातृ-वन्दना’ का ओजस्वी स्वर

​गिरिधर जी की लेखनी बहुमुखी थी। आयुर्वेद, दर्शन, नीति और समाजशास्त्र पर उनकी दर्जनों कृतियाँ (जैसे ‘नवरत्न नीति’, ‘आरोग्य दिग्दर्शन’) प्रकाशित हुईं। किंतु उनकी कीर्ति का अक्षय आधार उनकी काव्य कृति ‘मातृ-वन्दना’ है।

​”मेरो सब लगे प्रभो देश की भलाई में”

​जैसी पंक्तियों से सुसज्जित यह कृति राष्ट्रीयता के शुद्ध भाव का संचार करती है। विद्वानों के अनुसार, स्वदेश-प्रेम पर आधारित हिंदी रचनाओं में ‘मातृ-वन्दना’ अपने समय की श्रेष्ठतम और सर्वाधिक पुष्ट रचना मानी गई। जब अधिकांश कवि मध्यकालीन शृंगारिक वातावरण में सिमटे थे, तब गिरिधर जी ने अतीत के मोह से ऊपर उठकर सक्रिय राष्ट्रीयता का शंखनाद किया।

 

​अनुवाद के माध्यम से भाषायी सेतु

​गिरिधर जी ने संस्कृत, अंग्रेज़ी और हिंदी के बीच एक सेतु का कार्य किया। उन्होंने ‘हरमिट’ काव्य का संस्कृत अनुवाद किया और ‘शिशुपाल वध’ जैसे क्लिष्ट संस्कृत काव्यों का हिंदी पद्यानुवाद कर उन्हें जनसुलभ बनाया। उनकी लेखनी ने समाज के आचरण और व्यवहार को परिष्कृत करने का निरंतर कार्य किया।

 

​अश्विनी राय ‘अरुण’ का विचार

​मेरी दृष्टि में गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न’ जी वह ‘नवरत्न’ थे, जिनकी आभा से हिंदी का राजभवन सुशोभित हुआ। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का अस्त्र बनाया। आज जब हम राष्ट्रभाषा की अस्मिता की बात करते हैं, तो ‘नवरत्न’ जी जैसे तपस्वियों का स्मरण अनिवार्य हो जाता है, जिन्होंने निस्वार्थ भाव से हिंदी की वेदी पर अपनी पूरी मेधा अर्पित कर दी।

​शत-शत नमन!

 

 

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