July 24, 2024

कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य आदि सभी विधाओं में साहित्य संसार को प्रचूत संपदा प्रदान करनेे के बावजूद शरतचन्द्र की जीवनी ‘आवारा मसीहा’ से अपनी पहचान बनाने वाले श्री विष्णु प्रभाकर जी का जन्म २१ जून,१९१२ को उत्तरप्रदेश के जिला मुज़फ़्फ़रनगर स्थित मीरापुर में हुआ था। इन्हें इनके एक अन्य नाम ‘विष्णु दयाल’ से भी जाना जाता है। इनके पिता का नाम दुर्गा प्रसाद था, जो धार्मिक विचारधारा वाले व्यक्तित्व के धनी थे। प्रभाकर जी की माता महादेवी पढ़ी-लिखी महिला थीं, जिन्होंने अपने समय में पर्दा प्रथा का घोर विरोध किया था। तथा उनकी पत्नी का नाम सुशीला था। विष्णु प्रभाकर की प्रारंभिक शिक्षा मीरापुर में हुई थी। उन्होंने १९२९ में चंदूलाल एंग्लो-वैदिक हाई स्कूल, हिसार से मैट्रिक की परीक्षा पास की। इसके उपरांत नौकरी करते हुए पंजाब विश्वविद्यालय से ‘भूषण’, ‘प्राज्ञ’, ‘विशारद’ और ‘प्रभाकर’ आदि की हिंदी-संस्कृत परीक्षाएँ भी उत्तीर्ण कीं। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से ही बी.ए. की डिग्री भी प्राप्त की थी।

प्रभाकर जी के घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। यही कारण था कि उन्हें काफ़ी कठिनाइयों और समस्याओं का सामना करना पड़ा था। वे अपनी शिक्षा भली प्रकार से प्राप्त नहीं कर पाये थे। अपनी घर की परेशानियों और ज़िम्मेदारियों के बोझ से उन्होंने स्वयं को मज़बूत बना लिया। उन्होंने चतुर्थ श्रेणी की एक सरकारी नौकरी प्राप्त की। इस नौकरी के जरिए पारिश्रमिक रूप में उन्हें मात्र १८ रुपये प्रतिमाह का वेतन प्राप्त होता था। विष्णु प्रभाकर जी ने जो डिग्रियाँ और उच्च शिक्षा प्राप्त की, तथा अपने घर-परिवार की ज़िम्मेदारियों को पूरी तरह निभाया, वह उनके अथक प्रयासों का ही परिणाम था।

तूलिका…

प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी महात्मा गाँधी जी के जीवन आदर्शों से प्रेम के कारण प्रभाकर जी का रुझान कांग्रेस की तरफ़ हो गया। वे आज़ादी के दौर में बजते राजनीतिक बिगुल में उनकी लेखनी का भी एक उद्देश्य बन गया था, जो आज़ादी के लिए संघर्षरत थी। अपने लेखन के दौर में वे प्रेमचंद, यशपाल और अज्ञेय जैसे महारथियों के सहयात्री भी रहे, किन्तु रचना के क्षेत्र में उनकी अपनी एक अलग पहचान बन चुकी थी। १९३१ में ‘हिन्दी मिलाप’ में पहली कहानी दीवाली के दिन छपने के साथ ही उनके लेखन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह जीवनपर्यंत निरंतर चलता रहा। नाथूराम शर्मा प्रेम के कहने से वे शरतचन्द्र की जीवनी ‘आवारा मसीहा’ लिखने के लिए प्रेरित हुए, जिसके लिए वे शरतचन्द्र को जानने के लिये लगभग सभी स्रोतों और जगहों तक गए। उन्होंने बांग्ला भाषा भी सीखी और जब यह जीवनी छपी, तो साहित्य में विष्णु जी की धूम मच गयी। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य सभी विधाओं में प्रचुर साहित्य लिखने के बावजूद ‘आवारा मसीहा’ उनकी पहचान का पर्याय बन गयी। इसके बाद में ‘अर्द्धनारीश्वर’ पर उन्हें बेशक साहित्य अकादमी पुरस्कार हिन्दी प्राप्त हुआ, लेकिन ‘आवारा मसीहा’ ने साहित्य में उनकी एक अलग ही पहचान पुख्ता कर दी।

विष्णु प्रभाकर जी ने अपना पहला नाटक ‘हत्या के बाद’ लिखा और हिसार में एक नाटक मंडली के साथ भी कार्यरत हो गये। इसके पश्चात् प्रभाकर जी ने लेखन को ही अपनी जीविका बना लिया। आज़ादी के बाद वे नई दिल्ली आ गये और सितम्बर १९५५ में आकाशवाणी में नाट्यनिर्देशक नियुक्त हो गये, जहाँ उन्होंने १९५७ तक अपनी सेवाएँ प्रदान की थीं। इसके बाद वे तब सुर्खियों में आए, जब राष्ट्रपति भवन में दुर्व्यवहार के विरोधस्वरूप उन्होंने ‘पद्मभूषण’ की उपाधि वापस करने की घोषणा कर दी। विष्णु प्रभाकर जी आकाशवाणी, दूरदर्शन, पत्र-पत्रिकाओं तथा प्रकाशन संबंधी मीडिया के विविध क्षेत्रों में पर्याप्त लोकप्रिय रहे। देश-विदेश की अनेक यात्राएँ करने वाले विष्णुजी जीवनपर्यंत पूर्णकालिक मसिजीवी रचनाकार के रूप में साहित्य की साधना में लिप्त रहे थे।

कृतियाँ…

कहानी संग्रह – संघर्ष के बाद, धरती अब भी घूम रही है, मेरा वतन, खिलौने, आदि और अन्त, एक आसमान के नीचे, अधूरी कहानी, कौन जीता कौन हारा, तपोवन की कहानियाँ, पाप का घड़ा, मोती किसके।

बाल कथा संग्रह – क्षमादान गजनन्दन लाल के कारनामे, घमंड का फल, दो मित्र, सुनो कहानी, हीरे की पहचान।

उपन्यास – ढलती रात, स्वप्नमयी, अर्द्धनारीश्वर, धरती अब भी घूम रही है, पाप का घड़ा, होरी, कोई तो, निशिकान्त, तट के बंधन, स्वराज्य की कहानी।

आत्मकथा – क्षमादान और पंखहीन नाम से उनकी आत्मकथा 3 भागों में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हो चुकी है। और पंछी उड़ गया, मुक्त गगन में।

नाटक – सत्ता के आर-पार, हत्या के बाद, नवप्रभात, डॉक्टर, प्रकाश और परछाइयाँ, बारह एकांकी, अब और नही, टूट्ते परिवेश, गान्धार की भिक्षुणी और अशोक।

जीवनी – आवारा मसीहा, अमर शहीद भगत सिंह।

यात्रा वृत्तांत – ज्योतिपुन्ज हिमालय, जमुना गंगा के नैहर में, हँसते निर्झर दहकती भट्ठी।

संस्मरण – हमसफर मिलते रहे।

कविता संग्रह – चलता चला जाऊंगा (एकमात्र कविता संग्रह)।

विष्णु प्रभाकर जी की प्रमुख रचना आवारा मसीहा सर्वाधिक चर्चित जीवनी है। इस जीवनी रचना के लिए इन्हें ‘पाब्लो नेरूदा सम्मान’, ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ जैसे कई विदेशी पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। इनका लिखा प्रसिद्ध नाटक सत्ता के आर-पार पर उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा ‘मूर्ति देवी पुरस्कार’ प्रदान किया गया हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा प्रभाकर जी को ‘शलाका सम्मान’ भी मिल चुका है। ‘पद्म भूषण’ पुरस्कार भी मिला, किंतु राष्ट्रपति भवन में दुर्व्यवहार के विरोधस्वरूप उन्होंने ‘पद्म भूषण’ की उपाधि वापस करने घोषणा कर दी।

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