प्रेम: एक निःस्वार्थ उपहार
प्रिय स्वयं को सदा,
प्रिय के ही लिए संवारता है।
उसकी ही बस प्रसन्नता खातिर,
खुद को हर पल सिद्ध करता है।
ये कैसा अनूठा प्रयास है?
ये कैसा दिव्य एहसास है?
प्रिय का प्रेम पर पूर्ण अधिकार है,
यही दावा उसका… बार-बार है।
प्रिय! प्रेम के इस गहरे रहस्य को,
क्या समझ पाता है कोई? या—
अनंत रहस्यों के गहरे सागर में,
खुद को डूबा पाता है कोई?
वह पूर्णतः स्वतंत्र है,
प्रिय को अपना प्रेम देने को।
पर शायद उसे अधिकार नहीं,
प्रेम की एक बूंद भी… पाने को।
प्रेम तो बस एक उपहार है,
जो केवल दिया जा सकता है।
और अनंत काल तक प्रतीक्षा कर सकता है—
सहर्ष स्वीकारे जाने को।